छत्तीसगढ़

“पत्थर” जिसे जलाने या रगड़ने से अभी भी आती है हड्डियों की महक….! 

वरिष्ठ पत्रकार शंकर पांडे की कलम से....{किश्त 147}

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छत्तीसगढ़ के कांकेर जिला मुख्यालय से 80 किमी दूर ग्राम खडगांव के रक्षाहड़ा पहाड़ी में पत्थर पाया जाता है। पहाड़ियों के ऊंचाई से गिरती खूबसूरत पतली धार वाले झरने के बीच में यहां पत्थर है, देखने में बिल्कुल सामान्य लगता है। पर इस पत्थर को जलाया जाता है या रगड़ा (घर्षण) जाता है तो हड्डियों जैसी महक आती है।कहा जाता है इस जंगल में राम ने वनवास काल में राक्षस का वध किया था, उसी राक्षस की हड्डियां आज पत्थर बन चुकी है,जिसे जलाने ये घिसने से हड्डियों की खुश्बू आती है।छत्तीसगढ़ में भगवान श्रीराम ने वनवास काल का बड़ा समय बिताया था।कई जगहों पर आज भी राम के वहां जाने का प्रमाण मिलता है ऐसे ही कांकेर के जंगलों का पत्थर भी राम के वहां जाने की गवाही देता है।इन पत्थरों से आज भी हड्डियों की खुशबू आती है,श्रीराम अपने 14 साल के वनवास में दंडकारण्य के जंगलों के यात्रा के दौरान कांकेर के जंगलोँ में एक दानव का वध किया था,आज भी उसका अवशेष कांकेर जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर ग्राम खडगांव के रक्शाहाड़ा पहाड़ी पर मौजूद है। रक्शाहाड़ा पहाड़ी नाम है लेकिन इसका हिंदी में नाम रक्षकों की हड्डियां है। रक्शाहाड़ा की पहाड़ी में पतली सी धार के रूप में बहते हुये झरने के बीच एक ऐसा पत्थर पाया जाता है जिसको रगड़ने से या आग लगाने से हड्डियों की खुशबू आती है। हड्डी की तरह महकने वाले पत्थर के पीछे का रहस्य क्या है…? वहाँ चर्चा होती है कि कभी “अंतागढ़ क्षेत्र में विशाला काय दानव हुआ करता था, जिसने इस क्षेत्र में दूर-दूर तक के जीवों को हवा से ही खींच कर खा जाता था..? इसलिए इस क्षेत्र में जीवों का वास नहीं होता था, तंग आकर ग्रामीण भागने लगे थे। बस्तर आए राम को पता चला तो उन्होंने राक्षस को निंद्रा अवस्था में ही रावघाट के पहाड़ पर चढ़कर तीर चलाए थे। विशालकाय आदमखोर दानव को मारने के बाद वो फिर से जिंदा न हो इसलिये उसके शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे।सालों पहले यह पत्थर नहीं पूरी तरह हड्डी के रूप में दिखता था, जिसे काटने या तोड़ने पर खून की महक भी आती थी,कभी तो खून भी निकलता था। ग्रामीणों की मानें तो इस पत्थर को लेकर शोधकर्ताओं ने शोध भी किया है,पर आज तक सच्चाई सामने नहीं आई है।बताया जाता है कि यहां के ग्रामीण इस जंगल में बहुत कम आते हैं,क्योंकि पहाड़ी घने जंगलों से घिरी है,बड़ी -बड़ी चट्टान हैं,अलावा छोटे नाले होने के कारण बहुत कम ग्रामीण यहां आते हैं।पहाड़ी के नीचे के हिस्से में भी कई तरह के हड्डियों वाले पत्थर हैं, जिन तक पहुंच पाना संभव नहीं है।लेकिन कई ग्रामीण वहां तक पहुंचे हैं कहीं न कहीं शोधकर्ताओं के लिए पत्थर,आश्चर्य में डालने वाला है।लेकिन यहां के पत्थर साक्षात प्रमाण हैँ कभी राम यहां आये थे…!


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