छत्तीसगढ़

राजकुमारी इंदिरा की याद में बना एशिया का इकलौता संगीत एवं कला विवि…

वरिष्ठ पत्रकार शंकर पांडे की कलम से, ... ....{किश्त134}

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आजादी से पूर्व खैरागढ एक रियासत थी। यहां की राजकुमारी इंदिरा की स्मृति में खैरागढ का इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, एशिया महाद्वीप काअकेला ऐसा विश्वविद्यालय है,जो कला,संगीत को समर्पित है, इंदिरा की याद में इसका उद्घाटन इन्दिरा गांधी द्वारा स्‍वयं खैरागढ़ आकर किया गया था। इंदिरा कला,संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना, खैरागढ़ रियासत की राज कुमारी इंदिरा की याद में की गई थी। राजकुमारी की मौत 4 साल की उम्र में ही पालतू कुत्ते के काटने से हो गई थी। उन्हें संगीत का बड़ा शौक था। बेटी की यादें को अमर करने राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह, रानी पद्मावती ने विश्वविद्यालय के लिए अपना राजमहल दानकर दिया था। अभी भी विश्व विद्यालय उसी महल में ही चलता है। वहां गूंजने वाले संगीत के स्वर आज भी राजकुमारी इंदिरा की याद दिलाते हैं। एशिया के इस पहले संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना के पीछे खैरागढ़ रियासत का दर्द छुपा है। राजकुमारी का जन्म 25 दिसम्बर 1936 को हुआ था। 10 अप्रैल 1940 को उनकी मौत हो गई थी। 4 साल की उम्र में बेटी के गुजर जाने के बाद राजा- रानी डिप्रेस्ड रहने लगे थे। डिप्रेशन से बाहर आने संगीत का सहारा लिया औरअपनी बेटी की याद में उनके जन्म दिन पर 25 दिसम्बर,1944 को इंदिरा संगीत विद्यालय की स्थापना की। शिक्षाविदों,शासन ने इसे व्यापक रूप देने के लिए इसे अकादमी का रूप दे दिया। संस्था13 अक्टूबर, 1956 तक इंदिरा संगीत अकादमी के रूप में चलती रही।इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय ने रविशंकर (सितार), रुखमणी देवी अरुणंदले (नृत्य)अलाउद्दी नखां (सितार), लता मंगेश्कर (गायन), एमएस सुब्बलक्ष्मी (कर्नाटक संगीत ), पपुल जयकर इत्यादि को डाक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया है। इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, कला एवं संगीत को समर्पित एक ऐसा शैक्षणिक केन्द्र है, हर आने वाले के मन में अनूठी छाप छोड़ने में सफल रहता है। राजकुमारी को संगीत का शौक था,राजकुमारी की बाल्यकाल में ही असमय मृत्‍यु के बाद राजा साहब और रानी साहिबा ने स्‍वर्गवासी राजकुमारी के शौक को शिक्षा का रूप देकर अमर कर दिया। प्रारंभ में इन्दिरा संगीत महाविद्यालय के नाम से इस संस्‍था का प्रारंभ महज़ दो कमरों के एक भवन में किया गया जिसमें 4-6 विद्यार्थी एवं तीन गुरु हुआ करते थे इस संस्‍था के बढ़ते प्रभाव, लगातार छात्रों की वृद्धि से रानी साहिबा ने इसे अकादमी में बदलने का निर्णय लिया यह संस्‍था इन्दिरा संगीत अकादमी के नाम से जानी जाने लगी,साथ ही बड़े भवन की भी व्‍यवस्‍था की गई जिसमें कमरों की संख्‍या ज्‍यादा थी,समय के साथ धीरे धीरे संगीत के इस मंदिर का प्रभाव और बढ़ता गया। इसी बीच राजा साहब व रानी साहिबा मध्‍यप्रदेश राज्‍य के मंत्री बनाये गये तब उन्‍होंने विश्‍वविद्यालय के रूप में स्‍थापित किये जाने का प्रस्‍ताव तब के सीएम पं.रविशंकर शुक्‍ल के समक्ष रखा जिसे उन्‍होंने स्‍वीकार कर लिया, समस्‍त औपचारिकताओं के बाद राजकुमारी इन्दिरा के जन्‍म दिवस 14 अक्‍टूबर 1956 को इन्दिरा कला संगीत विश्‍वविद्यालय की विधिवत् स्‍थापना कर दी गई इसका उद्घाटन इन्दिरा गांधी द्वारा स्‍वयं खैरागढ़ आकर किया गया और विश्‍वविद्यालय के प्रथम कुलपति कृष्णक नारायण रातन्जनकर नियुक्त किये गये, ललित कला के क्षेत्र में यह एक अनोखा प्रयास था इस विश्‍वविद्यालय हेतु राजा साहब व रानी साहिबा ने महल “कमल विलास” दान कर दिया.यह विश्‍व विद्यालय आज भी इसी भवन से संचालित हो रहा है यहां ललित कलाओं के अंतर्गत गायन,वादन,नृत्‍य, नाट्य तथा दृश्‍य कलाओं की विधिवत शिक्षा दी जाती है,इनके अतिरिक्‍त हिन्‍दी साहित्‍य,अंग्रेजी साहित्‍य,संस्‍कृत साहित्‍य विषय भी उपलब्‍ध है।यहाँ आनेवाले छात्रों में भारत के प्रदेशों के अतिरिक्‍त अन्‍य देशों श्रीलंका, थाईलैण्‍ड, अफगानिस्‍तान आदि से भी छात्र बड़ी संख्‍या में संगीत की शिक्षा ग्रहण करने प्रति वर्ष आते हैं।


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