छत्तीसगढ़

“संघ” की स्थापना में बिलासपुर में जन्मे डॉ मुंजे प्रमुख सूत्रधार

वरिष्ठ पत्रकार शंकर पांडे की कलम से..{किश्त 150}

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डॉ केशवराव बलिराव पंत हेडगेवार ने 27 सितंबर,19 25 को संघ (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ)की स्थापना की थी, हिंदूराष्ट्र की परिकल्पना साकार करने ही विजया दशमी के दिन संघ की नींव रखी थी, शुरू में संघ को राजनीति से दूर सामाजिक, धार्मिक,गतिविधियों तक सीमित रखा, हेडगेवार का मानना था कि संघ की प्राथमिकता हिंदुओं को ताकत वर समूह के तौर पर विकसित करना है। ये अकेले उनके दिमाग की उपज नहीं थी, सूत्रधार थे डॉ बाल कृष्ण शिवराम मुंजे…। डॉ मुंजे का जन्म 1872 में सीपी एंड बरार (वर्तमान छत्तीसगढ़) के बिलासपुर में एक ऋग्वेदी ब्राम्हण परिवार में हुआ था। सन 1898 में मुंबई में ग्रांट मेडिकल कॉलेज से डिग्री ली,बॉम्बे नगर निगम में चिकित्सा अधिकारी के रूप में काम करने लगे, सैन्य जीवन में गहरी रुचि के चलते सेना में कमीशन अधिकारी बन गए, सेना की मेडिकल विंग में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में बोअर युद्ध में हिस्सा भी लिया। शुरू में तब कांग्रेस से जुड़े रहे पर गांधी की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति से असहमत होने के चलते डॉ. मुंजे,बाद में कांग्रेस से अलग होकर हिंदू महासभा में चले गये, जल्द ही उनकी गिनती हिंदू महासभा के बड़े नेताओं में होने लगी। 1930-31 के गोलमेज सम्मेलनों में वे हिंदूमहासभा के प्रतिनिधि के रूप में गए थे। इतालवी लेखिका मार्जिया कोसालेरी के मुताबिक मुंजे,गोलमेज सम्मेलन के बाद फरवरी से मार्च 1931 तक यूरोप का दौरा किया।15 मार्च से 24 मार्च तक इटली में भी रुके थे,डॉ मुंजे 1927-28 में अखिल भारत हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे।आरएसएस के गठन में इनका बड़ा हाथ रहा ।

डॉ मुंजे और डॉ हेडगेवार
का साथ-साथ होना ….

मुंजे और हेडगेवार की उम्र में करीब 17 साल का फर्क था।बड़े होने पर वे हेडगेवार के मार्गदर्शक रहे, हेडगेवार पर उनका प्रभाव भी बहुत था।माना जाता है,1910 में मूंजे ने ही हेडगेवार को मैट्रिक के बाद मेडिकल की पढ़ाई के लिए कोलकाता भेजा था।मेडिकल पढ़ाई के बाद हेडगेवार भी शुरुआती दिनों में कांग्रेस में शामिल हुए थे।1921 के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया।एक साल जेल में रहे,बाद में गांधी के खिलाफत आंदोलन को समर्थन देने के चलते उनका भी कांग्रेस से मन खिन्न हो गया। 1923 में सांप्रदायिक दंगों ने पूरी तरह उग्र हिंदुत्व की ओर ढकेल दिया।

संघ की ड्रेस मुंजे के
दिमाग की उपज…

हेडगेवार, मुंजे के संपर्क में शुरू से थे ही, साथ ही बाल गंगाधर तिलक, विनायक दामोदर सावरकर का भी बड़ा प्रभाव था इसलिये हिंदूराष्ट्र की परिकल्पना को साकार करने के लिए संघ की नींव रखी,वो चाहते थे कि कांग्रेस के अधिवेशन में संघ के सदस्य दूर से ही पह चान में आएं। अनुशासित भी दिखें, इसलिये ही संघ सदस्यों के लिए खाक़ी शर्ट, खाक़ी निकर,खाक़ी टोपी, लम्बे मोज़े,जूतों का ड्रेस कोड, तैयार किया था। ये ड्रेस कोड, मुंजे की देन थी, डॉ मुंजे हिंदू महासभा के नेता थे। मुसोलिनी से मिल चुके थे उनकी सेना से प्रभा वित थे।इसका असर हेडगे वार की यूनिफ़ार्म में नज़र आया । डॉ मुंजे मानते थे, हिंदुओं का सैन्यकरण जरुरी है !इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने यूरोप का दौरा किया था इटली में फासीवाद के संस्थापक बेनितो मुसोलिनी से विशेष तौर पर प्रभावित थे।मुसोलिनी से मिलकर लौटने के बाद हेडगेवार से मिलकर स्वंय सेवकों के लिए मिलिट्री ट्रेनिंग अनि वार्य कर दी थी, कोसालेरी के मुताबिक,डॉ मुंजे इटली के जिन फासीवादी संस्‍था नों में गए,उनकी प्रशिक्षण पद्घति,राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्रशिक्षण पद्घति लगभग एक जैसी है। हेड गेवार ने जो भी अनुशासन संघ में लागू किये वे डॉ मुंजे की देन थे।इतालवी विद्वान मर्जिया केसोलारी कहती थीं -मुंजे पर फासीवादी संगठन की गहरी छाप कि पुष्टि उनकी डायरी करती है। डायरी के अंश इस बात को सजीवता से सामने लाते हैँ कि फासीवाद का विचार हिंदुओं को एकजुट करने की परिकल्पना को साकार करता है। मुंजे ने लिखा है- “भारत और विशेष रूप से हिंदू भारत को हिंदुत्व सेना के पुनुरुद्धार के लिए किसी ऐसे संस्थान की जरूरत है। नागपुर स्थित डॉ. हेडगेवार के निर्देशन में चल रहा संस्थान ‘आरएसएस’ ऐसा है,हालांकि इसे स्वतंत्र रूप से स्थापित किया गया है, अब अपना पूरा जीवन महाराष्ट्र और अन्य प्रांतों में डॉ. हेडगेवार के संस्थान के विकास,विस्तार में लगा दूंगा। डॉ मुंजे ने मुसोलिनी से कहा “हर एक महत्वाकांक्षी, विकासशील राष्ट्र को सैन्य पुनर्जागरण के लिए ऐसे फासीवादी संग ठनों की जरूरत है। 1934 में मुंजे सेंट्रल हिंदू मिलिट्री एजुकेशन सोसाइटी की शुरुआत की। इसका उद्देश्य मातृभूमि की रक्षा के लिए युवा हिंदुओं को सैन्य  प्रशिक्षण देना और ‘सनातन धर्म’ की शिक्षा देना था। साथ ही, निजी और राष्ट्रीय सुरक्षा की कला में युवाओं को माहिर बनाना था।इसमें कहा गया है कि प्रशिक्षण का मकसद जीत हासिल करने के लिए किसी भी हद तक अपने विरोधियों को खत्म करना है। बहरहाल बालकृष्ण शिवराम मुंजे का निधन 3 मार्च 1948 में हुआ था।


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