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उम्मीद मुलाकात की सूरज से है मुझे…. जलता रहा हूँ इसलिए रसिक तमाम रात

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भारतेन्दु साहित्य समिति ने स्व. रामप्यारे रसिक को दी                         भावभीनी श्रद्धांजलि

अम्बिकापुर। सरगुजा । भारतेंदु साहित्य कला समिति सरगुजा द्वारा दिनांक 04 अगस्त- 2023 को सरगुजांचल में साहित्य का अलख जगाने वाले वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार स्व.रामप्यारे रसिक की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन स्थानीय भारतेन्दु भवन में किया गया। इस अवसर पर उपस्थित साहित्यकारों एवं प्रबुद्धजनों ने स्व. रामप्यारे की तस्वीर पर पुष्पांजलि देकर उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। आयोजन के आरंभ में उनके सुपुत्र प्रकाश कश्यप ने उनका जीवन परिचय देते हुए उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। इस मौके पर प्रबुद्ध विचारक एवं सेवानिवृत्त प्राचार्य बबनजी पाण्डेय ने रसिकजी के साहित्यिक अवदानों को याद करते हुए कहा कि ये उनसे शासकीय सेवा में सरगुजा आने पर सन् 1967 से परिचित हुए किन्तु भारतेन्दु साहित्य समिति के पूर्व अध्यक्ष स्व. जे. एन. मिश्र के सानिध्य से उन्हें रसिकजी और उनके साहित्य को करीब से जानने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि. रसिक जी का रचना संसार विशाल है। वे अत्यन्त व्यवहारकुशल, बेबाक एवं निर्भीक लेखक थे। अपने स्थायी स्तंभ नगर कल्लोल के माध्यम से उन्होंने जनता को जागरूक और सचेत करने का स्तुत्य कार्य किया है। उनके कई शेर कण्ठस्थ होने की बात कहते हुए उनका एक शेर सुनाया- दरियादिली तो देखिए सय्याद की रसिक जब पर नहीं रहे तो आसमान दे दिया नगरपालिक निगम अम्बिकापुर के एम.आई.सी. सदस्य एवं प्रदेश कांग्रेस महामंत्री द्वितेन्द्र मिश्र ने कहा कि रसिकजी साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन करते थे लेकिन व्यंग्य विधा के माहिर थे। वे जिस पर व्यंग्य कसते थे वह अपने आपको सौभाग्यशाली समझता था। यह उनका समाज में स्थापित सम्मान और विलक्षण प्रतिभा का प्रतीक है। प्रगतिशील लेखक एवं प्रबुद्ध विचारक प्रभुनारायण वर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि रामप्यारे रसिक के निधन से सरगुजा में साहित्य एवं पत्रकारिता का एक युग समाप्त हो गया जिसकी पूर्ति संभव नहीं है । तटस्थ रह कर समसामयिक विषयों का तार्किक एवं तथ्यपरक विश्लेषण करते थे। उन्होंने कहा कि स्व. रामप्यारे रसिक के पास एक पत्रकार की पैनी दृष्टि होने के साथ ही एक साहित्यकार का सरल हृदय भी था। वे अपने सरल, सुबोध रचनाओं के माध्यम से जन-जन के हृदय में निवास करते हैं भारतेन्दु साहित्य समिति की अध्यक्ष श्रीमती नीलिमा मिश्र ने श्रद्धाजलि देते हुए कहा कि रसिकजी की हिन्दी सरगुजिहा -छत्तीसगढ़ी और भोजपुरी में छपी कुल 13 पुस्तकें इस बात का द्योतक है कि वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी होने के साथ ही एक उच्चकोटि के साहित्यकार थे। समाजसेविका सुश्री वन्दना दत्ता ने अपने संस्मरण में रसिकजी को बड़े भाई की तरह याद करते हुए कहा कि सरगुजा के उभरते गायक कलाकारों और नवोदित साहित्यकारों को रसिकजी ने हमेशा प्रोत्साहित किया । वे आकाशवाणी अम्बिकापुर के एव्हड गीतकार थे। उनकी सरगुजिहा रामायण को संगीतबद्ध कर आकाशवाणी से प्रसारित किया गया तथा आज भी उनके देशभक्ति गीत, भजन, गजल आदि गाये बजाये जा रहे हैं। इस मौके पर सुश्री वंदना दत्ता ने सुमधुर स्वर में उनके हिन्दी, सरगुजिहा और भोजपुरी गीतों की प्रस्तुति दी। वरिष्ठ साहित्यकार बी डी यादव ने रसिक जी के नगर कललोल जैसी रचनाओं में निहित व्यंग्य पर प्रकाश डाला।
इस अवसर पर स्व रामप्यारे रसिक की रचनाओं को गाकर स्वरांजलि संगीत महाविद्यालय की ओर से संगीतमयी श्रद्धांजलि देते हुए सर्वप्रथम गायक प्रेमानन्द पातर ने सरस्वती वंदना और निर्गुण भजन चदरिया दिन-दिन फाटल जाये. समय सुनार रतन तन मोरा छिन छिन काटल जाये एवं गजल सो जा मेरे नादां दिल बेदर्द जमाना है, कांटों की बस्ती में वामन को बचाना है। की मनमोहक प्रस्तुति दी। शहर की उभरती हुई नन्हीं गायिक कु शताक्षी वर्मा ने भजन चूनर मोरी रंगवा दो पिया जी कवि मोहरलाल राही ने सरगुजिहा रचना समय हवे बलवान रे भाई और तो ला देखे बिना संगी, टपकी टपकी चुये लोर, श्रीमती पूनम दुबे वीणा ने गजल मुद्दतों के बाद अब मकाम आया है प्रसिद्ध गायक अजनि सिन्हा ने प्रगति गीत रोशनी का पता पूछते मत रहो, खुद दीया बन अंधेरे में जलने लगी। खुद-ब-खुद लोग पीछे चले आयेंगे बन के खुद का मसीहा जो ढलने लगो सुना कर सबको भावविभोर कर दिया । स्वरांजलि के संस्थापक एवं संगीतज्ञ विवेक मिश्र ने भजन अपना राम को मना ले अपना श्याम को मना ले जाकर संगीतमय श्रद्धांजलि सभा को संपन्न किया । अन्त में सभागार में उपस्थितजनों ने दो मिनट का मौन धारण स्वर्गीय आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना कर अपनी संवेदनायें व्यक्त की। इस अवसर पर जे.पी. श्रीवास्तव, अम्हाशंकर सिंह, आर. डी. मिश्र. गीता दुबे, डॉ. सुधीर राम पाठक, श्रीमती संध्या सिंह, श्रीमती मंजू पाठक, श्रीमती चन्दा कश्यप, अमरनाथ कश्यप, अरुण कश्यप, अशोक सोनकर, श्रीमती सुनिता कश्यप, श्रीमती आशा उमेश पाण्डेय, श्रीमती अर्चना पाठक, श्रीमती ममता कश्यप, जूली, मिली. सुनिल रवानी, अनूपचंद कश्यप, कु.हनी, वेद, दिनेश विश्वकर्मा, मुन्द्रिका, विपिन कश्यप सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित थे।कार्यक्रम का संचालन श्रीमती मीना वर्मा ने किया ।

 


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