छत्तीसगढ़पर्यटन

आध्यात्मिक चेतना एवं शक्ति का केंद्र जगन्नाथ मंदिर चिरमिरी (पोंड़ी)

वैष्णव समुदाय के  जगन्नाथ पुरी के मंदिर की चारों धाम में से एक धाम की मान्यता होने के कारण अन्य मंदिरों की अपेक्षा विशिष्ट स्थान है. आज भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में पूरे विश्व से लाखों की संख्या में श्रद्धालु रथ खींचने के लिए आते हैं भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्धि एवं मान्यता के कारण इस मंदिर के अंश लेकर छोटे-छोटे स्वरूप जगन्नाथ मंदिर के देश के कई हिस्सों में बनाए गए हैं उनमें से चिरमिरी मार्ग के पोंड़ी स्थान पर कोयले की अकूत संपदा की वृताकार चिरमिरी की पहाड़ियों के बीच एक पहाड़ी पर यह जगन्नाथ मंदिर बना हुआ है इस मंदिर में  भगवान जगन्नाथ अर्थात भगवान कृष्ण उनके बड़े भाई बलभद्र एवं बहन सुभद्रा की मूर्ति है. पहले वह भील सरदार विश्वासु के आराध्य देव नील माधव के रूप में पूजे जाते थे, बाद में संत रामानंद एवं चैतन्य महाप्रभु के सत्संग के प्रभाव ने इस क्षेत्र को भगवान कृष्ण के रंग में रंग दिया और इस मंदिर के उपासकों एवं श्रद्धालुओं की श्रद्धा ने इसे विशिष्ट वर्तमान स्वरूप प्रदान किया. ( पर्यावरण व धरोहर चिंतक वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव की कलम से)

Ghoomata Darpan

आध्यात्मिक चेतना एवं शक्ति का केंद्र जगन्नाथ मंदिर चिरमिरी (पोंड़ी)

(आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र –  13)

पराशक्ति ईश्वर ने पृथ्वी पर प्राकृतिक संपदाओं के साथ-साथ जीव जंतु और मानव को जन्म दिया है किंतु प्रकृति जहां माता बनाकर पोषण का कार्य करती रही है वही अपनी रौद्र रूप दिखाकर मनुष्य  सहित जीव जंतुओं को अपनी शक्ति का एहसास कराती रही है.  जहां कहीं प्रकृति के रहस्यों को मानव जान नहीं पाया, वहां से एक अदृश्य शक्ति ने जन्म लिया जो ईश्वर के नाम से जाना गया. मनुष्य के असीम ज्ञान की सीमा जहां समाप्त होती है जहां वह प्रकृति से भयभीत होता है जहां उसे आगे अंधकार दिखाई देता है तब ईश्वर की भावनात्मक मान्यता जन्म लेती है. समय और काल के अनुसार ईश्वर को एक मार्गदर्शक शक्ति का ऐसा प्रकाश पुंज माना गया है , जो  हमारे बीच हमारी तरह हमारे जीवन के अच्छे बुरे समय में साथी बनकर साथ दे. विपरीत परिस्थितियों में हमारा मार्गदर्शन करें. इसलिए हमने समय के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, महेश की भावनात्मक आस्था एवं कल्पना को हमने राम, कृष्ण, हनुमान, दुर्गा काली  जैसे विभिन्न रूपों में पथ प्रदर्शन के लिए ईश्वरीय अंश के रूप में स्वीकार किया. इन्हीं शक्तिपुंज को अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रकृति के किसी स्थान विशेष पर स्थापित कर आराधना स्थल अर्थात मंदिर बनाएं फिर वह शिव मंदिर, राम मंदिर, कृष्ण मंदिर सहित अलग-अलग मतावलंबियों तथा सनातनी परंपरा के अनुसार  राम मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, गुरुवई मंदिर, बद्रीनाथ, केदारनाथ मंदिर के नाम से जाने गए.

आध्यात्मिक चेतना एवं शक्ति का केंद्र जगन्नाथ मंदिर चिरमिरी (पोंड़ी) मंदिरों के निर्माण का बहुत पुराना इतिहास है अब तक प्राप्त जानकारी में हिंदू धर्म के अंतर्गत आने वाले  जैन धर्म के ज्यादा पुराने मंदिरों के इतिहास मिलते हैं.  गुप्त काल में चौथी से छठवीं शताब्दी में मंदिरों के निर्माण का उत्तरोत्तर विकास हुआ. सातवीं शताब्दी आते तक सनातनी आर्य संस्कृति के कई नामचीन मंदिर बनने प्रारंभ हो चुके थे. सातवीं शताब्दी का बोधगया मंदिर, गुप्तकालीन निर्माण शैली का उत्तम प्रतिनिधित्व करता करता मंदिर है.  इसी तरह 11वीं शताब्दी का खजुराहो मंदिर एवं 13वीं शताब्दी का कोणार्क मंदिर विश्व विख्यात मंदिरों की श्रेणी में गिने जाते हैं.

आध्यात्मिक चेतना एवं शक्ति का केंद्र जगन्नाथ मंदिर चिरमिरी (पोंड़ी)
प्राचीन भारत के इतिहास में कलिंग देश का प्रमाण मिलता है जो विस्तार के साथ काफी बड़े  क्षेत्र मे फैला था.  तीसरी शताब्दी में कलिंग युद्ध के बाद यह क्षेत्र मौर्य नियंत्रण में चला गया.  बाद में इस पर क्षत्रीय राजवंशों का शासन रहा जिन्हें बाद में कलिंग अधिपति कहा गया. इन्हीं राजवंशों में दसवीं शताब्दी में गंगवंश का शासन 1078 से 1148 तक कलिंग राजा अनंतवर्मन चोडगंगदेव ने जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया था, किंतु इसे पूरा करने में 1197 ई. में उड़ीसा शासक अनंग भीमदेव का इस मंदिर को वर्तमान स्वरूप देने में विशेष योगदान रहा.  भारत के चार धाम की मान्यता में उत्तराखंड के बद्रीनाथ, कर्नाटक में श्रृंगेरी, गुजरात में द्वारिका एवं उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी का महत्व है.  महाभारत के साथ-साथ ब्रह्म पुराण एवं स्कंद पुराण में भी  पुरी के जगन्नाथ मंदिर का विवरण मिलता है जो सनातन धर्म के इस मंदिर के पुरातन एवं विशेषता का प्रतीक है।

आध्यात्मिक चेतना एवं शक्ति का केंद्र जगन्नाथ मंदिर चिरमिरी (पोंड़ी)

किवदंतियों के अनुसार पुरी का जगन्नाथ मंदिर राजा इंद्रद्युम्न  द्वारा हजारों वर्ष पूर्व बनवाया गया था और मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के लिए वह ब्रह्मा जी को बुलाने स्वर्ग लोक चले गए .जब तक वह लौट कर आए तब तक समय परिवर्तन हो चुका था मंदिर समुद्र की रेत मे दब चुका था और  पृथ्वी पर दूसरा भील  राजा गाल माधव प्राण प्रतिष्ठा की तैयारी में जुटा था.  भील राजा गाल माधव के द्वारा अपने घोड़े पर सवारी करके जाते समय उसके घोड़े के नाल  से जब मंदिर का ऊपरी हिस्सा टकराया तब उसने रेत  के नीचे दबे मंदिर को बाहर निकाला,  लेकिन राजा इंद्रद्युम्न ने जब कहा कि यह मंदिर मेरा बनवाया हुआ है ऐसी स्थिति में गाल माधव और राजा इंद्रदेव के बीच मंदिर बनवाने की बात पर बहस हो गई गालमाधव ने कहा आप प्रमाण दें तब  ऐसी स्थिति में वहीं पर स्थित पुराने तालाब में एक कछुए ने निकालकर यह जानकारी दी कि यह मंदिर वास्तव में राजा इंद्रद्युम्न का बनवाया हुआ है. ऐसी स्थिति में ब्रह्मा जी ने स्वयं राजा इंद्रद्युम्न के इस मंदिर में भगवान विष्णु की जगन्नाथ जी के रूप में स्थापना की . इस कारण  भी मंदिर की मर्यादा बढ़ गई. मंदिर के शीर्ष पर धोड़े की नाल का चुम्बक आज भी लगा हुआ है. यही कारण है कि हवाई जहाज और पक्षी मंदिर के उपर से पार नहीं करते हैं. आस्था का कोई रूप नहीं होता और आस्था के बल पर ही मंदिरों के निर्माण होते हैं.

वैष्णव समुदाय के  जगन्नाथ पुरी के मंदिर की चारों धाम में से एक धाम की मान्यता होने के कारण अन्य मंदिरों की अपेक्षा विशिष्ट स्थान है. आज भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में पूरे विश्व से लाखों की संख्या में श्रद्धालु रथ खींचने के लिए आते हैं भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्धि एवं मान्यता के कारण इस मंदिर के अंश लेकर छोटे-छोटे स्वरूप जगन्नाथ मंदिर के देश के कई हिस्सों में बनाए गए हैं उनमें से चिरमिरी मार्ग के पोंड़ी स्थान पर कोयले की अकूत संपदा की वृताकार चिरमिरी की पहाड़ियों के बीच एक पहाड़ी पर यह जगन्नाथ मंदिर बना हुआ है इस मंदिर में  भगवान जगन्नाथ अर्थात भगवान कृष्ण उनके बड़े भाई बलभद्र एवं बहन सुभद्रा की मूर्ति है. पहले वह भील सरदार विश्वासु के आराध्य देव नील माधव के रूप में पूजे जाते थे, बाद में संत रामानंद एवं चैतन्य महाप्रभु के सत्संग के प्रभाव ने इस क्षेत्र को भगवान कृष्ण के रंग में रंग दिया और इस मंदिर के उपासकों एवं श्रद्धालुओं की श्रद्धा ने इसे विशिष्ट वर्तमान स्वरूप प्रदान किया।

 

आध्यात्मिक चिंतकों का मानना है कि कोई भी बड़ा मंदिर या संत आश्रम ईश्वर द्वारा सुनिश्चित पूर्व शक्ति स्थल पर ही बनते हैं जहां कभी संत महात्माओं द्वारा विशाल यज्ञ वेदी से या भूमि पर  तपस्या  कर शक्ति स्थल बनाया गया हो.  इन्हीं मान्यताओं के अनुसार चिरमिरी (पोंड़ी)  पहाड़ी का यह स्थल सन्यासी भगवान राम के दंडकारण की देवभूमि का हिस्सा रहने के कारण किसी संत महात्मा की तपस्वी स्थली अवश्य रही होगी, क्योंकि यह अंचल कई ऋषि मुनियों के आश्रमों से परिपूर्ण था. यही कारण है कि कल्पतरु महाराज ने इस मंदिर के निर्माण हेतु  चिरमिरी की इस पहाड़ी स्थल का चयन किया और  इसके निर्माण तक आजीवन इसी शक्तिपीठ केंद्र पर भगवान जगन्नाथ की साधना और तप करते-करते विष्णु लोक को चले गए.

आध्यात्मिक चेतना एवं शक्ति का केंद्र जगन्नाथ मंदिर चिरमिरी (पोंड़ी)
कल्पतरु महाराज की जानकारी देते हुए जगन्नाथ मंदिर के कमेटी अध्यक्ष नारायण नायक ने बताया कि इसी समाज के बीच से जब कोई ईश्वरी आस्था के विराट सानिध्य के समीप पहुंच जाता है तब वह अपनी आभाशक्ति का विस्तार कर सन्यासी हो जाता है. कल्पतरु महाराज भी उन्ही दिव्य शक्तियों में से एक थे,  जो कोयले की इसी काली मिट्टी में पैदा हुए कल्पतरु महाराज का बचपन का नाम वंशानिधि था. उनके पिता भगवान नायक सोनामनी कालरी में कार्यरत थे. उड़ीसा संस्कृति का यह परिवार अपने घर में बच्चों को उड़ीसा के मंदिरों एवं पूजा पाठ की जानकारी दिया करते थे, इसलिए बालक वंशानिधि चिरमिरी में पढ़ाई लिखाई करते-करते बी ए पास करने के बाद ईश्वर से ऐसी लगन लगी कि घर द्वार छोड़कर संत हो गए और जगन्नाथ मंदिर में गुरुओं के सानिध्य में रहकर भगवान जगन्नाथ की सेवा अर्चना करने लगे.
आध्यात्मिक चेतना एवं शक्ति का केंद्र जगन्नाथ मंदिर चिरमिरी (पोंड़ी)

किसी भी मंदिर निर्माण की सोच और परंपरा की गहराइयों में हजारों लाखों जनमानस की भावना  एवं मानसिक चेतना, सामाजिक, आर्थिक , सेवा भक्ति शामिल होती है, तब जाकर एक विशाल मंदिर अपना स्वरूप ग्रहण कर पाता है.  ऐसी परिस्थितियों में आध्यात्मिक संतों के विचार अक्षरशः सत्य प्रतीत होते हैं कि श्रेष्ठ कार्यों को करने के लिए प्रेरणा ईश्वर से ही मिलती है और उनकी मर्जी के बिना वह पूरा नहीं हो सकता. .इसके लिए  माध्यम का चयन भी उनके द्वारा ही किया जाता है, इसी विचार के तहत भगवान जगन्नाथ ने समाज सेवी  भास्कर नाहक  को माध्यम बनाया उन्होंने एक जगन्नाथ मंदिर चिरमिरी मे बनाने की इच्छा अपने मित्र सीताराम को बताई और यह सिलसिला आगे बढ़कर मंदिर निर्माण का आधार बना.

आध्यात्मिक चेतना एवं शक्ति का केंद्र जगन्नाथ मंदिर चिरमिरी (पोंड़ी)
चिरमिरी के विद्वान साहित्यकार एवं श्रमिक नेता श्री भागवत प्रसाद दुबे से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस मंदिर निर्माण की आस्था-भावना  इतनी तेजी से फैली कि कई प्रमुख हस्तियों  ने इस मंदिर निर्माण के लिए आगे बढ़कर अपना सहयोग प्रदान किया.  जिसमें मलय बेहरा, हरी बंधु रेड्डी, कीर्तन मंडल, इत्यादि का नाम प्रमुखता से जुड़ता चला गया.  1925 से प्रारंभ  चिरमिरी कालरी का क्षेत्र  1972-73 तक अपने विस्तार के साथ  कोयला उत्पादन की बड़ी औद्योगिक इकाई बन चुकी थी. देश के विकास में रेल के लिए कोयला उत्पादन का यह  चिरमिरी क्षेत्र और देशभर की अन्य कोयला खदानें प्राइवेट खदानो से आगे बढ़कर सुरक्षित खदान  प्रणाली के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी द्वारा 30 जनवरी 1973  में कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया. अब  श्रमिकों के जीवन स्तर एवं आर्थिक समृद्धि ने पंख फैलाना शुरू किया. इस समय तक अपनी रोजी रोटी के लिए देश भर के अलग अलग जाति सम्प्रदाय के लोग देश के  अलग अलग हिस्से से  आकर बस चुके थे.  गोरखपुर, बिहार, बंगाल उड़ीसा छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश से आए लोगों का यह समूह यहाँ  एक छोटे भारत का प्रतीक कब बन गया यह लोगों को पता भी नहीं चला.   इस छोटे भारत में प्राइवेट खदानों के समय से ही कार्यरत उड़ीसा श्रमिकों का करीब 4000 श्रमिकों की उपस्थिति किसी भी कार्य को संपन्न  करने का ऊंचा मनोबल रखती थी. इसी मनोबल को सोनामनी में उत्कल समाज के  भास्कर  नाहक जी ने महसूस किया और अपने पड़ोसी उड़िया स्कूल के संचालक सीताराम जी से चर्चा कर चिरमिरी में जगन्नाथ मंदिर निर्माण के विचार से परिचित कराया. सीताराम जी को यह विचार पसंद आया और फिर इसकी चर्चा उन्होंने अपने फूल (मित्र)  एच के  मिश्रा  से किया और मुख्य रूप से तीन लोगों का यह विचार एक विशाल मंदिर  निर्माण की आधारशिला बन गई.
मंदिर निर्माण की कठिनाइयों का पहाड़ भी निर्माण स्थल के पहाड़ की ऊंचाइयों से अभी कम नहीं था. लाखों करोड़ों रुपए की लागत का खर्च सामने था. फिर भी हिम्मत करके मंदिर निर्माण हेतु जनवरी 1983 में आज्ञा मांगने मंदिर निर्माण समिति के लोग निकल पड़े पुरी की ओर.  पुरी के गजपति महाराज  से मिलकर उन्होंने राजवंश से आज्ञा प्राप्त की और पुरी मंदिर से आज्ञा माला लेकर मंदिर निर्माण समिति चिताझोर पौड़ी में मंदिर के झंडे में बांधकर मंदिर बनाने का काम प्रारंभ किया. लेकिन  मजदूरों के सहयोग के अलावा कोई किरण नजर नहीं आ रही थी.   ऐसे समय में “जहां चाह वहां राह” की युक्ति को चरितार्थ करते हुए ईश्वर ने कोयला खान के अधिकारियों को इस और आकर्षित किया और फिर क्या था. तत्कालीन उपक्षेत्रीय प्रबंधक शेख साहब  द्वारा डोजर  मशीन उपलब्ध कराई गई और श्रमदान द्वारा  इस पहाड़ी को समतल करने और  पहुंच मार्ग बनाने का कार्य संपन्न होने लगा.  लेकिन वर्ष 1984 तक  नींव भरने के बाद आठ वर्ष 1992  तक  मंदिर निर्माण का कार्य आर्थिक अभाव के कारण बंद हो गया .भगवान जगन्नाथ की कृपा से सभी धर्म के श्रद्धालु कोयला  कामगारों ने अपने वेतन से एक-एक दिन का वेतन दान कर इस मंदिर के निर्माण में पुनः सहयोग देना प्रारंभ किया और परिश्रम रंग दिखाने लगी. वेतन दान का यह सिलसिला कई बार चलता रहा. साथ ही मंदिर की भक्ति और आस्था के वशीभूत कई अधिकारियों व्यापारियों एवं भक्तों के सहयोग से यह मंदिर 14 वर्षों की कठिन तपस्या से वर्ष   2006 में पूर्ण हुआ. 01 अप्रैल 2006 को भगवान जगन्नाथ की प्राण प्रतिष्ठा के बाद श्रम श्रद्धा और आस्था का यह विशाल मंदिर आज हमारे सामने है . इस मंदिर की बनावट में उड़ीसा के शिल्प का उपयोग किया गया है जो मूल पुरी मंदिर से लिया गया है.
भगवान जगन्नाथ  पुरी का प्रतिरूप पोंड़ी  का यह जगन्नाथ मंदिर आध्यात्मिक चेतना का वह केंद्र स्थल है जहां आपको ईश्वर की शरण में जाकर शांति का अनुभव होता है . प्रकृति की गोद में जंगल के बीच पहाड़ी पर बना यह मंदिर आपको अपनी ओर आकर्षित  करता है, वहीं जगन्नाथ मंदिर का इतिहास का यह आध्यात्मिक पन्ना आपको आत्मिक शांति भी प्रदान करता है.  यह मंदिर  आपके परिवार और। बच्चों की आगामी पीढ़ी  को भारतीय अध्यात्म के उन पन्नों से परिचित कराता है जो हमारी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है.
मंदिर  निर्माण के वास्तु शिल्पी स्वर्गीय रंगनाथ महाराणा एवं उसके पुत्र राजेश महाराणा का कौशल आज मंदिर के हर दीवार पर उकेरी गई प्रतिमाओं में प्रदर्शित होता है.  ऐसा लगता है कि यह मूर्तियां अभी बोल पड़ेगी. गंजाम जिले के मथुरा ग्राम का यह शिल्पी आज दुनिया में नहीं है लेकिन इस मंदिर के शिल्प रूप में वह आज भी हमारे बीच मौजूद है. .वर्तमान में  कठिन परिश्रम एवं कुशल तकनीक से तीन भागों में बना पोंड़ी जगन्नाथ मंदिर , नाट्य मंडप, आड़प मंडप,  एवं गृह पाट (गर्भ गृह)  की संरचना के साथ ऊपरी दीवारों और गुंबज के भीतर की गई नक्काशी में स्वर्गीय रंगनाथ महाराणा एवं उनके पुत्र का परिश्रम एवं शिल्प दिखाई पड़ता है.

पोंड़ी का यह  जगन्नाथ मंदिर पुरी के जगन्नाथ पुरी मंदिर  का अंश होने के कारण इस मंदिर की पूजा पद्धति पुरी के अनुसार ही संचालित होती है, जिसमें वर्ष भर के सभी पूजन उनके निर्देशानुसार संपन्न कराए जाते हैं.  आश्चर्य होता है कि इतने बड़े मंदिर का  व्यवस्था खर्च आखिर आता कहां से  होगा.  जी हां आपकी तरह सैकड़ो श्रद्धालुओं के  सहयोग  से लाखों का खर्च वर्तमान में संपन्न होता है. आप भी अपना सहयोग देकर इस मंदिर के सुबह-शाम के भोग प्रसाद एवं मंदिर की व्यवस्था में सहभागी बन सकते हैं.  आपको ज्ञात होगा कि  जगन्नाथ पुरी के भोग प्रसाद को खरीद कर ग्रहण करने से ही पुण्य की प्राप्ति होती है, इसीलिए श्रद्धालुओं हेतु आंशिक  सहयोग देकर  मंदिर में भोग प्रसाद की व्यवस्था का प्रावधान है, जो समिति अध्यक्ष नारायण  को फोन – 70 00683024  – पर चर्चा कर अपने मित्रों एवं परिवार जनों के लिए भोग प्रसाद की व्यवस्था मंदिर परिसर मे कर सकते हैं.  मंदिर व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए आप भोग भंडारा या भोग प्रसाद ग्रहण करने के लिए एक दिन पूर्व सूचना एवं भुगतान देकर इसके सहभागी बन सकते हैं.

चिरमिरी पहाड़ी पर तीन भाग में 105 फीट उँचे  इस मंदिर का ध्वज हमेशा हमें हमारे देश की पहचान  हमारी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों  के प्रति आस्था एवं  उपासना का संदेश युगों युगों तक आगामी पीढ़ी को भी देता रहेगा. जगत का पालन करने वाले भगवान जगन्नाथ के शक्ति  स्थल के लहराते ध्वज की  आध्यात्मिक आस्था अपना संदेश वायु मार्ग से भी हमारे घरों के बीच पहुंचाती रहे, यही कामना है.
जय जगन्नाथ


Ghoomata Darpan

Ghoomata Darpan

घूमता दर्पण, कोयलांचल में 1993 से विश्वसनीयता के लिए प्रसिद्ध अखबार है, सोशल मीडिया के जमाने मे आपको तेज, सटीक व निष्पक्ष न्यूज पहुचाने के लिए इस वेबसाईट का प्रारंभ किया गया है । संस्थापक संपादक प्रवीण निशी का पत्रकारिता मे तीन दशक का अनुभव है। छत्तीसगढ़ की ग्राउन्ड रिपोर्टिंग तथा देश-दुनिया की तमाम खबरों के विश्लेषण के लिए आज ही देखे घूमता दर्पण

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button