छत्तीसगढ़

राष्ट्रीय राजमार्ग 43 का जमद्वारी घाट और हसदो नदी का मनोरम किनारा

पर्यावरण व धरोहर चिंतक वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव, पर्यटन एवं पिकनिक केंद्र - 15

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जीवन की आपाधापी में व्यस्त जीवन के बीच कभी-कभी मानसिक शांति की आवश्यकता महसूस होती है ऐसा लगता है कि कोई ऐसी जगह चलें जो रोजमर्रा के तनाव से कुछ समय के लिए हमें दूर रखे. इसी चाहत मे हम निकल पड़ते हैं प्रकृति के गोद में किसी ऐसी जगह को तलाशने , जो हमें और हमारे परिवार को शांति और खुशियां प्रदान करे. जंगल, नदी, पहाड़ के बीच कुछ इसी तरह के सुकून के पलों को समेटे पर्यटन एवं पिकनिक स्थान का नाम है —
राष्ट्रीय राजमार्ग 43 का जमद्वारी घाट और हसदो नदी का मनोरम किनारा
जी हां आप भी मेरी तरह सोच रहे हैं कि इस मार्ग के इस ऊंचे-नीचे घाट का नाम जमद्वारी घाट क्यों पड़ा. पुराने समय में यह हसदो नदी इसी पहाड़ी के किनारे किनारे चलती थीक्योंकि पहाड़ी को काटकर पार करने का साहस केवल नदियों मे होता है. हसदो ने डूमर पहाड़ी को काटकर अपना रास्ता बनाया और वह अपने किनारे किसी भी व्यक्ति को चलने की अनुमति नहीं देती थी. ऐसी स्थिति में बंगाल के अकाल के बाद जब बंगाल को छत्तीसगढ़ से जोड़ने का विचार आया तब स्टेट राज्य मार्ग क्रमांक 14 के द्वारा इसे जोड़ा गया और जोड़ने के इसी कार्य में पहाड़ों के नीचे किनारे किनारे पत्थरों को काट कर इस मार्ग का निर्माण किया गया. पहाड़ी का यह रास्ता इतना कठिन था कि आए दिन इस मार्ग से नीचे गिरने वाले पत्थर से कई यात्रियों की मौत तक हो गई जिसने इसे जमद्वारी घाट का नाम दिया.

राष्ट्रीय राजमार्ग 43 का जमद्वारी घाट और हसदो नदी का मनोरम किनारा
हमारे सौरमंडल में नौ ग्रहों की उपस्थिति के बीच पृथ्वी का अपना एक अलग स्थान है क्योंकि हजारों जीव जंतुओं के साथ मानव का की उत्पत्ति इसी गृह में उपलब्ध है मानव को प्राकृतिक हरियाली से भरे जंगल पहाड़ और नदियों का विशाल आंचल हमें हमेशा से आकर्षित करता रहा है. नदिया इसका श्रृंगार है जिसे जीवनदायिनी माता का दर्जा दिया गया है. टेढ़ी-मेढ़ी ढलानों पर बहती जलधारा अपने आकर्षक रूप से कई जगह मनमोहक दृश्य उत्पन्न करती है कहीं कहीं पर पत्थरों की ऊंचाई पर पहुंचकर नीचे गिरती हुई जलप्रपात का निर्माण करती है और कहीं समतल जमीन पर छोटे ढलान की ओर धीरे-धीरे मध्यम गति से आगे बढ़ती जाती है. जंगल पहाड़ के बीच रास्ता बनाती हुई यही नदियां पत्थरों को तोड़कर अपने आसपास लंबे रेतीले मैदान का निर्माण करती है . इन्हीं रेत पर जाते हुए ठंड मे सूरज की गुनगुनी धूप का आनंद का एहसास इतना आनंददायक होता है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.

राष्ट्रीय राजमार्ग 43 का जमद्वारी घाट और हसदो नदी का मनोरम किनारा
जाते हुए बसंत और आती हुई फागुन के आगमन की दस्तक में टेसू आम और महुआ की सुगंध के बीच फैली हल्की-फुल्की ठंड के बीच नदियों के किनारे फैले रेत पर आंखें मूंद कर कुछ क्षण बिताने का खुला आमंत्रण देती है. नवीन एम सी बी जिले की हस्दो नदी का सड़क किनारे फैला चौड़ा पाट. जी हां डूमर पहाड़ के किनारे किनारे चलती सड़क किनारे की ऊँची नीची घाटिया एवं उतार-चढ़ाव की यात्रा एक यादगार रोमांचक यात्रा का एहसास कराती है. इसी सड़क के किनारे किनारे जमद्वारी घाट के ढलान के साथ हस्दो नदी मध्यम गति से आगे बढ़ती है. राष्ट्रीय राजमार्ग 43 कटनी — गुमला मार्ग के साथ चलते हुए जमद्वारी घाट के किनारे कई जीप, कार, मोटरसाइकिल सड़क किनारे या जंगल के भीतरी किनारो पर खड़े मिल जाएंगे. यह गाड़ियां उन्ही पर्यटकों की है जो गुनगुनी धूप का आनंद लेने हेतु परिवार सहित यहां पहुंचते हैं. मनेन्द्रगढ़ मुख्यालय से लगभग 16 किलोमीटर आगे से लेकर 22 किलोमीटर तक लगभग 6 किलोमीटर लंबी हसदो नदी का किनारा और इसका चौड़ा पाट सड़क से चलते चलते भी हमें आकर्षित करता है. लगभग 30 से 40 मीटर चौड़े पाट से भरपूर हसदो नदी जब धीरे-धीरे आगे चलती किसी पहाड़ी के किनारे घूम जाती है वहां इसकी चौड़ाई और ज्यादा हो जाती है. शांत जलधारा के बीच कभी-कभी ऐसा भ्रम होता है कि पानी यहां रुक गया है और उस पर पड़ने वाली सूर्य की किरणें छोटे-छोटे इंद्रधनुष बनाती हुई दिखाई पड़ती है. लेकिन नदी की बहती जलधारा जो ऊपर से तो स्थिर दिखाई देती है लेकिन यही जलधारा नीचे पूरी गति के साथ आगे बढ़ती हुई अपनी आगामी यात्रा तय करती है. इसीलिए नदियों की जलधारा को प्रगति और उत्थान का प्रतीक माना गया है. नदी का जल धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए जाने कितने किलोमीटर की यात्रा यूं ही तय कर लेती है.
नदियाँ हमेशा अपने निश्चित स्थान से निकलकर लंबी यात्रा के बाद अपने गंतव्य तक पहुंचती है यही कारण है कि प्राचीन काल में लोग अपनी लंबी दूरी की यात्रा इन्हीं नदियों के किनारे किनारे चलती पगडंडियों के सहारे तय करते थे. क्यों दंतियों के अनुसार भगवान राम ने त्रेता युग में छत्तीसगढ़ में दंडकारण में प्रवेश के साथ अपनी यात्रा इसी हस्दो नदी के किनारे किनारे चलते हुए अमृतधारा जलप्रपात के पास बने वाम ऋषि के आश्रम तक पहुंचे थे. यहाँ उन्होंने वाम ऋषि के आश्रम में भोजन प्रसाद ग्रहण किया था और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर आगे की यात्रा प्रारंभ की थी . अमृत धारा जलप्रपात से आगे चलते हसदो नदी सड़क किनारे किनारे चलती हुई इसी राष्ट्रीय राजमार्ग 43 को मलियागिरी चंदनवन लाई नागपुर के पास पार करती है. जहां एक छोटा बांध बनाकर चिरमिरी पेयजल योजना के अंतर्गत पानी प्रदत्त किया जा रहा है. पुल के ऊपर खड़े होकर भरे हुए बांध का पानी एक अलग दृश्य उत्पन्न करता है जो कुछ देर उतर कर इस प्राकृतिक दृश्य को कैमरे में बांध लेने के लिए हमें उत्प्रेरित करता है.
हृदय रोग की आयुर्वेदिक दवा का स्रोत अर्जुन वृक्ष पेड़ों की कई किलोमीटर तक फैली श्रृंखला की शुद्ध हवा के साथ-साथ सड़क के दूसरी ओर फैले श्वेत चंदन का रोपण का मनोरम दृश्य कुछ देर रुक कर इसे आंखों में भर लेने हेतु बाध्य करता है. वही पहाड़ की तराई में बहती हसदो नदी का पानी एक ठंडा वातावरण वर्ष पर यहां बनाए रखना है इसी का प्रभाव है कि यहां चंदन के जंगल दिन प्रतिदिन और ज्यादा बढ़ रहे हैं.

राष्ट्रीय राजमार्ग 43 का जमद्वारी घाट और हसदो नदी का मनोरम किनारा
छत्तीसगढ़ वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा ग्राम लाई में वन रोपनी के पहले बहती हसदो नदी के किनारे का यह पर्यटन स्थल हमें वन भोज के आयोजन एवं नदी किनारे की रेत पर सूर्य की गुनगुनी धूप तथा बच्चों के उछल कूद के बीच पानी में खेलने हेतु बुलाता है. आप भी अपने मित्रों और परिवार सहित नए परिवेश में गीत संगीत के आनंद के साथ एक बार इस पर्यटन स्थल पर जरूर पहुंचे. यहां पर बिताए गए यादगार पल आपको और आपके परिवार को जीवन भर याद रहेंगे.राष्ट्रीय राजमार्ग 43 का जमद्वारी घाट और हसदो नदी का मनोरम किनारा
प्राकृतिक सुंदरता और वन औषधि पेड़ों की श्रृंखला का क्रम पर्यटकों की बढ़नी संख्या के बीच एक बार उपयोगी प्लास्टिक बर्तनों का उपयोग एक नई चिंता पैदा कर रहा है. विगत दिनों पर्यामित्र सतीश द्विवेदी के साथ संबोधन पर्यावरण संरक्षण मंच के पर्यावरण चिंतकों के दल ने यह महसूस किया कि गर्मी के दिनों में रेत में दबे प्लास्टिक पन्नी से धीरे-धीरे गैस के उठते बुलबुले देखकर चिंतित हुए. और यह महसूस किया गया कि हम प्रकृति के दिए गए इस उपहार को धीरे-धीरे अपने आनंद और उन्माद के द्वारा नष्ट कर रहे हैं. आवश्यकता है कि हम इस प्राकृतिक उपहार को नष्ट होने से बचाए. हम उम्मीद करते हैं की खुशियों की इस अकूत प्राकृतिक संपदा को प्लास्टिक उपयोग से नष्ट होने की चिंता में आप भी हमारे साथ होंगे और प्लास्टिक जहर से इसे बचाने के लिए प्लास्टिक का उपयोग बंद कर वैकल्पिक मिट्टी के या धातु के बर्तनों का उपयोग करेंगे. आपका यह सहयोग इस पर्यटन स्थल को आने वाली पीढ़ी के लिए भी स्वच्छ एवं खूबसूरत पर्यटन के लिए बनाए रखेगी . इस बार की पर्यटन यात्रा में आपका भरपूर सहयोग इसे और खूबसूरती प्रदान करेगा .
ब स इतना ही अगली बार फिर चलेंगे कहीं और खूबसूरत पर्यटन के लिए ।


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