छत्तीसगढ़

ऋतुराज “बसंत” में नव-कोपलों की सुंदरता एवं फूल-मंजरियों से सजी सारी प्रकृति

(शिक्षक मेवालाल ,बंजी की कलम से)

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ऋतुराज "बसंत" में नव-कोपलों की सुंदरता एवं फूल-मंजरियों से सजी सारी प्रकृति

ऋतुओं के सरताज ऋतुराज “बसंत” की महिमा अनुपम एवं निराली है। शिशिर ऋतु के पश्चात् माघ मास के शुक्ल पंचमी तिथि अर्थात बसंत पंचमी की तिथि से चैत्र मास के रंग पंचमी तक के मध्य का समय बसंत ऋतु कहलाती है। इस स्वर्णिम कालखंड में प्रकृति की रचना में काफी परिवर्तन होते हैं, प्रकृति अपनी सौंदर्य की निराली छटा बिखेरती है।
ठंड का असर कम होते ही मामूली गर्मी का एहसास होने लगता है, वृक्षों और लताओं से पत्तों का झड़ना, महुआ और पलाश जैसे पेड़ों के कूचों में पंखुड़ियों का विकास होना, फलों का राजा कहे जाने वाले आम के वृक्ष में मौर आने के साथ मंजरियां अपनी मादक गंध बिखेरती हुई सूक्ष्म चिपचिपी रज कणों का त्याग करती हैं जिसे सूक्ष्म पतिंगे रसपान करने को इर्द-गिर्द झूमते रहते हैं। जहां आम्र डालियों पर यदा-कदा कोयल के आवागमन की गतिविधी भी शुरू हो जाती है। धवई और बिरहुल जैसे पौधों में लदे फूलों के साथ-साथ सेमल जैसे गगनचुंबी ऊंचे पेड़ों की फूलों पर मंडराते भौंरों की गुंजार व नन्ही चिड़िया (फुलचुहिया) इस डाल से उस डाल पर लपकते हुए फूलों में चुबुक मारते हुए दृश्य की शोभा देखते ही बनती है।
छत्तीसगढ़ के राजकीय वृक्ष कहे जाने वाली सरई की रुगबुगी फुल की सुंदरता और मदहोश कर देने वाली महक पथिकों को अनिर्वाच्य आनंद प्रदान करता है। साल वनों के बीच से गुजरने वालों का मन प्रसन्नता से शराबोर हो जाता है।
दहकते अंगारों की तरह चहुं ओर काले-काले पंखुड़ियां पर शुक के चोंच की तरह लाल-लाल टेशू के फूल प्रकृति के यौवनाग्नि की ज्वाला को दर्शाती नजर आती है।
वृक्ष, वनस्पति, लताएं गर्भकाल में संचरित होने को उद्वेलित रहते हैं। प्रकृति की इस अनंत खुशी में आनंदित होकर कई महीनो से गूंगे बहरे की तरह खोई हुई मधुर आवाज वाले कोयल के कंठ से भी कुहू-कुहू की मधुर आवाज पुनर्जीवित हो जाती है।
सारी प्रकृति में नवीनता ही नवीनता दिखाई देने लगती है। कोंपलों से नव कोमल पल्लवों का शनै: शनै: विकास होना प्रारंभ हो जाता है। मानो, मां वात्सल्यमयी करुणा से प्रेमातुर हो अपने आंचल के पल्लू से बच्चों को कोमल वस्त्रों से ढकना चाह रही हो।
व्यस्तता से निवृत्त होकर, प्रकृति के करीब जाकर खाली मन से प्राकृतिक रचना को एक झलक झांकिये तो सही, गदगद होकर भाव विभोर हो जाएंगे।
ईश्वर की ऐसी सुन्दर सृष्टि की रचना को देखकर अंतरात्मा में प्रसन्नता और परम् सुख की अनुभूति होती है। हम परमात्मा को अपने अंतर्मन से प्रसन्न होकर धन्यवाद ज्ञापित करते हैं।


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