छत्तीसगढ़

बदलते पर्यावरण से टूटता समाज का आभा मंडल  “जैसा खाओ अन्न,  वैसा रहे मन”,,,,

पर्यावरण व धरोहर चिंतक,वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव

Ghoomata Darpan

बदलते पर्यावरण से टूटता समाज का आभा मंडल  "जैसा खाओ अन्न,  वैसा रहे मन",,,,

जी हाँ कहावतें और सूक्तियां हमारे  आदि पुरुष ऋषि मुनियों के गहन चिंतन मनन एवं लंबे अनुभव और शोध से बनती है.  दो पंक्तियों में कही गई चिन्ता को यदि वर्तमान परिप्रेक्ष में देखा जाए तब हम महसूस करते हैं कि हमारे आसपास समाज में लोगों की सहनशीलता कम हो रही है.  इतना ही नहीं लोगों के बीच उग्रता, और क्रोध बढ़ रहा है यही उग्रता बदलते समय में तनाव का कारण भी बनती है जो कभी-कभी  कुछ लोगो  को आत्महत्या जैसे घटनाओं की ओर ढकेल देती है.  इन सब का परिणाम सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर भी अलग-अलग रूपों में हमें दिखाई पड़ता है. इसका प्रभाव हम अपने पारिवारिक संबंधों में भी महसूस करते हैं.  कभी-कभी बड़े बुजुर्ग या दूसरे लोग यह भी कहकर इति श्री कर लेते हैं कि माता-पिता ने अपने बच्चों को सही पारिवरिश नहीं की है उन्हें  पारिवारिक संस्कार की शिक्षा नहीं दी है.

बदलते पर्यावरण से टूटता समाज का आभा मंडल  "जैसा खाओ अन्न,  वैसा रहे मन",,,,

समाज के इस आभा मंडल के बदलाव को हम यह कहकर नजरअंदाज कर देते  हैं कि यह सब समय का बदलाव है लेकिन यह शत्  प्रतिशत सच  नहीं है.  शांति एवं गहन विचार के साथ जब आप स्वयं इस चिंतन में शामिल होते हैं और इसकी गहराइयों में जाएंगे तब आपको महसूस होगा कि इसकी जड़े कहीं और फैली हुई है, जिसमें शामिल है आपकी रसोई. घर का यही हिस्सा हमेशा से धर की धुरी रहा  है जिसके चारों ओर पूरा परिवार घूमता है लेकिन बदलते हुए समय में हमने इसे उपेक्षित कर दिया है . सच यह है कि आपके स्वस्थ रहने से आपका परिवार, समाज, देश स्वस्थ होता है  जिससे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है. दूसरे शब्दों में सरल भाषा में यह कहना उचित होगा कि आपके अस्वस्थ होने पर आपका परिवार परेशानियों में घिरने लगता है.  परिवार के दैनिक कार्यों के साथ-साथ आपकी आय के साधन  नौकरी, व्यवसाय एवं सामाजिक ढांचा डगमगाने लगता है.  घर के किसी सदस्य या एक बच्चे की बीमारी भी हमारे जीवन के  सामाजिक ढांचे को आघात पहुंचाती है वहीं पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित करती है.  लंबे समय की बीमारी पारिवारिक संबंधों में भी तनाव पैदा करने लगती है जिसका असर देर- सबेर हमारे सामाजिक जीवन पर भी दिखाई देने लगता है.

किसी भी देश का आधार समाज होता है वही समाज जो एक समान आचार विचार के लोगों का समूह होता है और जिससे यह देश बनता है जब तक इस समूह का प्रत्येक व्यक्ति आर्थिक एवं सामाजिक रूप से प्रसन्न रहेगा तब तक देश के विकास  की गति आगे बढ़ती रहेगी,  लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति की कमजोरी देश को कमजोर बनाने की एक कड़ी साबित होने लगती है,  जो एक-एक घर से जुड़कर पूरे राष्ट्रीय विकास को बाधित करने वाली  मजबूत सांकल बन जाती है .
प्रत्येक देश के विकास का ढांचा बनाने  मे एक- एक परिवार की अहम् भूमिका होती है  और प्रत्येक परिवार के विकास की कड़ी अपने घर की रसोई से प्रारंभ होती है.  ऋषि मुनियों के चिंतन,मनन और अनुभव ने  रसोई को औषधि का वह भंडार बताया है,  जहां से परिवार के हर सदस्य को शरीर के विकास के लिए आवश्यक तत्व प्राप्त होते हैं . प्रतिकूल परिस्थितियों में आपके शरीर की छोटी-छोटी व्याधियों को दूर करने की क्षमता इसी रसोई में होती है.

बदलते पर्यावरण से टूटता समाज का आभा मंडल  "जैसा खाओ अन्न,  वैसा रहे मन",,,,
चिंता का विषय है कि हमारे घर की रसोई को आज  कई सामाजिक दबाव झेलना पड़ रहा है. जैसे अच्छी। आय के लिए घर परिवार के सदस्यों पर बढ़ता काम का बोझ एवं स्वयं के लिए समय ना निकाल पाना. रसोई के महत्व को नकारना भी एक बहुत बड़ा कारण है. जबकि सत्यता यह है कि इसी  रसोई से ही हमें स्वस्थ जीवन मिलता है जो हमारे शारीरिक मानसिक एवं सामाजिक विकास को गति प्रदान करता है. कभी कभी  चर्चा के दौरान किसी स्वस्थ बुजुर्ग को देखकर जब आप उनसे स्वस्थ रहने का राज पूछे तब वह यही कहते हैं कि पुराने जमाने का दूध घी और रोटी का असर है आजकल के  बड़ा पाव और  स्लाइस ब्रेड का नहीं.  उनकी बातों को हम हँस कर टाल देते हैं, लेकिन बुजुर्गों की टिप्पणी पर यदि हम गंभीरता से विचार करें तब उनके दिनचर्या में इसी रसोई का महत्व दिखाई देता है.  जिसमें भूख के अनुसार भोजन बनाने की परंपरागत विधियाँ जिसमें चावल रोटी सब्जी के साथ घी अचार की थाली में मोटे अनाज के पकवान की विशेष सामग्री, सुगंधित मसाले के पोषक तत्वों से युक्त भोजन बनाया जाना और पालथी मोड़कर  बैठकर खाना हमारी दिनचर्या में शामिल था.  इसी शुद्ध स्वास्थ्यवर्धक थाली के सामने बैठकर हम महसूस करते हैं कि पारिवारिक स्नेह, दुलार एवं मनुहार भरे आमंत्रण के साथ एक रोटी और  ले लेने का आग्रह हमें स्वस्थ रखने के लिए भरपूर पोषण तत्वों के साथ-साथ मानसिक रूप से भी चैतन्यता प्रदान करता है.

बदलते पर्यावरण से टूटता समाज का आभा मंडल  "जैसा खाओ अन्न,  वैसा रहे मन",,,,

पश्चिम की यूरोपीय संस्कृति को विकास का पर्याय मान लेने की हमारी सोच आज हमारी  रसायनशाला रसोई को औद्योगिक इकाई और होटलों में तब्दील कर दिया है, इसी होटलों पर हमारी निर्भरता हमारे स्वास्थ्य को तिल तिल करके तोड़ रही है और हम इसे महसूस भी नहीं कर पा रहे हैं.  युवावस्था का शरीर जब तक ताकतवर होता है,  कम पोषक तत्वों के अभाव में भी चलने की कोशिश करता है किंतु यही शरीर  समय से पहले कई रोगों के ऐसे चक्रव्यूह में फंसने लगता है जिससे बाहर निकलना असंभव हो जाता है.  इसका असर हमारे परिवार के सदस्यों के मानसिक एवं आर्थिक स्थिति पर भी दिखाई पड़ने लगता है. इसकी चपेट में मध्यम वर्गीय परिवार एवं निम्न वर्ग परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित होता है जिसका अंत पारिवारिक ढांचे का टूटना या आर्थिक रूप से परिवार का बिखर जाना होता है.

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दिन- प्रतिदिन बदलते पर्यावरण एवं जैव विविधता का दुष्प्रभाव हमारी रसोई पर भी पड़ रहा है. हर गरीब अमीर के जीवन को बचाए रखने के लिए आवश्यक रसोई में पकने वाले चावल दाल रोटी सब्जी के पोषक तत्वों में कमी की खबर ने अब  हमारी नींद उड़ा दी है. आज देश में जो अनाज हम रसोई में उपयोग कर रहे हैं उसकी पौष्टिकता आधी रह गई है. अर्थात पोषक तत्वों की कमी दर्ज की गई है  भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित शोध में बताया गया है कि धान ,गेहूं में बढ़ते रासायनिक खाद के प्रयोग के कारण लगभग 45% पोषक तत्वों की कमी आई है, वहीं विषाक्त  तत्वों में वृद्धि हुई है . हरित क्रांति के व्यापक प्रचार प्रसार ने हमें तात्कालिक रूप से अन्न के भंडारों में संपन्न बना दिया है लेकिन पोषक तत्वों के साथ-साथ हमारे भोजन में विषाक्त आर्सेनिक एवं अल्युमिनियम की मात्रा बढ़ी है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध हो रही है.  ऐसी स्थिति में पर्याप्त मात्रा में भोजन के बाद भी हमारे  शरीर को केवल आधे पोषक तत्व मिल रहे हैं जो कुपोषण को बढ़ावा दे रहे हैं.

भारतवर्ष दुनिया के सबसे ज्यादा कुपोषित देशो की श्रेणी में प्रथम स्थान पर है. अंतरराष्ट्रीय खाद एवं कृषि संगठन ने खाद्य सुरक्षा और पोषण के क्षेत्रीय अवलोकन में पाया है कि 2021 में 74% भारतीय कम आमदनी की वजह से स्वस्थ आहार लेने में असमर्थ रहे हैं. देश की संसद में भी माननीय प्रधानमंत्री द्वारा स्वीकार किया गया है कि 80 करोड लोगों को निशुल्क राशन वितरण खाद्य सुरक्षा के तहत दिया जा रहा है जिससे देश मे कोई भी परिवार भूखा नही सोए . यह आंकड़े अब यह सोचने को विवश कर रहे  हैं कि अब  देश की कृषि नीतियां सहित अनुसंधान एवं फसल प्रजनन के अनुसंधान पर सरकारों  को फसलों के पोषक तत्वों मे हो रही कमी जैसे पक्षों पर  ज्यादा ध्यान देना होगा. ऑर्गनिक खेती  से की गई पैदावार के खाद्यान्न को बेहतर कीमत पर खरीदने का प्रयास भारत सरकार को करना होगा. एनपीके  जैसे रासायनिक खाद से खराब होती मिट्टी, दूषित जल हमारे खाद्य पदार्थों को प्रभावित कर रहे हैं.  अतः एफ सी ओ  कानून 1985 के कारण यूरिया एवं एनपीके खाद में भारी अनुदान देकर किसानों के खेतों में पहुंचाने जैसे निर्णय पर एक बार  पुनर्विचार होना आवश्यक है. आज खेतों की मिट्टी में सूक्ष्म खनिज तत्वों की कमी विश्व की चिंता बढ़ा रही है.  इसी सूक्ष्म पोषक तत्वों में आयरन , जिंक की कमी से गैर संक्रमित बीमारियां जिसमें एनीमिया, शुगर, ब्लड प्रेशर, स्वांस रोग, हृदय रोग जैसी बीमारियों के बढ़ने की संभावनाएं बढ़  गई  है.  जैव विविधता एवं पेड़ पौधों द्वारा तैयार विटामिन सी और  बी  हमारे शरीर को रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, ब्रेन स्ट्रोक होने से रोकने जैसे कार्य करती है.  वही सूक्ष्म तत्व आयरन जिंक कॉपर जैसे कार्बनिक एवं  अकार्बनिक तत्व पौधे मिट्टी या पानी में मौजूद खनिज पोषक तत्वों से ग्रहण करते हैं जो हमारी रसोई के बने भोजन के माध्यम से हमारे शरीर में पहुंचते हैं और  हमें स्वस्थ  एवं निरोगी रखने के लिए प्रभावकारी होते हैं .

एक व्यक्ति और परिवार की पृष्ठभूमि हमारी जीवन शैली और पर्यावरण जैसे जोखिम कुछ गैर संचारी रोगों को बढ़ाने में सहायक होते हैं.  28 लाख लोग अधिक वजन होने के कारण मृत्यु का कारण बनते हैं वही  उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) के कारण 75 लाख लोगों की मृत्यु हो जा रही है .  असंतुलित भोजन एवं भोजन में प्राप्त संतुलित खनिज एवं पोषण तत्वों की कमी हमारी आज की चिंता के साथ भविष्य की चिंता में शामिल होना चाहिए.  क्योंकि  2047 के हमारे आजादी के शताब्दी वर्ष के विकास की संभावनाओं पर  ये आंकड़े ग्रहण लगाने की तैयारी में है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है कि गैर संक्रमित रोग के कारण 410 लाख लोगों को मौत होती है जो सभी मौतों की लगभग  74% है. अक्सर वृद्धावस्था में यह बीमारियां ज्यादा प्रभाव डालती है पर चिंताजनक बात यह  है कि  विश्व में 170  लाख मौतें  70  वर्ष से कम उम्र के लोगों में हो रही  है .  इसमें निम्न एवं मध्य वर्ग के 86% लोग प्रभावित होते हैं.  वायु प्रदूषण का भी इस बदलते पर्यावरण में बहुत बड़ा प्रभाव दिखाई पड़ रहा है. वैश्विक स्तर पर  67 लाख  मौत इसी वायु प्रदूषण के कारण  होती है जिसमें 57 लाख  मौत गैर संचारी मृत्यु के कारण होती है .
गरीबी का गैर संचारी बीमारियों से गहरा संबंध है तेज विकास से कम आय वाले देशों में गरीबी उन्मूलन में यह  बहुत बड़ी बाधा है स्वस्थ देखभाल से जुड़ी घरेलू लागत में वृद्धि के कारण कमजोर एवं सामाजिक रूप से वंचित लोग उच्च सामाजिक पदों पर बैठे व्यक्ति की तुलना में अधिक बीमार होते हैं और जल्दी मर जाते हैं.  जिसमें अस्वास्थ कारक आहार और स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी सीमित पहुंच आज सबसे बड़ा कारण है .  गैर संचारित बीमारियों के उपचार में अधिक लागत और लंबी तथा खर्चीली होने के कारण गरीबोँ की कम आय के कारण ज्यादा प्रभावित करती है. और लाखों लोगों को गरीबी में धकेल देती है जो  हमारे देश के विकास को अवरुद्ध कर देती है. आने वाले समय में  वैश्विक विकास 2030 के एजेंडा एवं हमारे देश के शताब्दी  विकास वर्ष  2047 के विकास चरण में पहुंचने में यह बहुत बड़ा खतरा और चुनौती भी है. जिससे निपटने में हम सभी को अपने रसोई के माध्यम से अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी पड़ेगी ।


Ghoomata Darpan

Ghoomata Darpan

घूमता दर्पण, कोयलांचल में 1993 से विश्वसनीयता के लिए प्रसिद्ध अखबार है, सोशल मीडिया के जमाने मे आपको तेज, सटीक व निष्पक्ष न्यूज पहुचाने के लिए इस वेबसाईट का प्रारंभ किया गया है । संस्थापक संपादक प्रवीण निशी का पत्रकारिता मे तीन दशक का अनुभव है। छत्तीसगढ़ की ग्राउन्ड रिपोर्टिंग तथा देश-दुनिया की तमाम खबरों के विश्लेषण के लिए आज ही देखे घूमता दर्पण

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button