छत्तीसगढ़

तारीख हजारों साल में बस इतनी ही बदली है, तब दौर था पत्थर का अब लोग हैं पत्थर के

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तारीख हजारों साल में बस इतनी ही बदली है, तब दौर था पत्थर का अब लोग हैं पत्थर के

एक जमाना था जब पेड़ों को देखकर लोग कहते थे यह हमारे दादा के जमाने का पेड़ है।कभी-कभी बड़े बुजुर्ग भी चर्चा करते है कि इस सड़क का पहले यह नाम था,यहां ऐतिहासिक घटनाएं घटी थी पर अतीत की यादें समय के साथ इतिहास के पन्नों में सिमटती चली जा रही है। आज भी जरूरी है कि नगर पालिका से महानगर की ओर बढ़ते रायपुर शहर को राजधानी के अनुरूप ढालने के लिए कुछ पुरानी स्मृतियों को सहेजा जाए। नहीं तो ‘एम जी रोड’ महात्मा गांधी के नाम पर तथा ‘माल रोड’ मदन मोहन मालवीय के नाम पर है इसकी जानकारी भावी पीढ़ी को कौन देगा…?छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी अब कुछ सड़कों के नामकरण बदलाव के लिए मांग उठ सकती है। अभी भी जीई रोड (ग्रेट इस्टर्न रोड) एडवर्ड रोड,बैरन बाजार आदि का नाम अंग्रेजों के जमाने से चल रहा है। आजादी के तत्काल बाद ही कंपनी गार्डन को मोतीबाग का नाम दे दिया गया वहीं लेडी तालाब को पाटकर शास्त्री बाजार स्थापित किया गया है।देश की राजधानी दिल्ली में लुटियन जोन जहां केन्द्र सरकार के मंत्रियों से लेकर बड़े अधिकारियों के घर और दफ्तर मौजूद है। इसी लुटियन जोन में देश की संसद और राष्ट्रपति भवन मौजूद है। इसी लुटियन जोन में बनी एक शानदार सड़क का नाम था ‘औरंगजेब रोड’,पर इस सड़क का नाम एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया जाता है। उसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी कुछ इसी तरह की मांग उठे तो कोई आश्चर्य नहीं।आजादी के पहले मोतीबाग को कंपनी गार्डन कहा जाता था पर देश की आजादी मिलते ही उसे मोतीलाल नेहरू के नाम पर मोतीबाग कर दिया गया।वहीं वर्तमान माल रोड कभी अंग्रेजों के समय वेन्सले रोड नाम से जाना जाता था पर इसका नामकरण मदन मोहन मालवीय के नाम पर कर दिया गया बाद में धीरे-धीरे यह मालरोड के नाम से जाना जाता है।वैसे नगर निगम में मदन मोहन मालवीय के नाम पर सड़क का नामकरण का तो अब रिकार्ड भी नहीं है।सदर बाजार से गोलबाजार जाने वाली सड़क को आज भी एडवर्ड रोड कहा जाता है इसका नामकरण भी अंग्रेजों के जमाने में हुआ था।सदर से गोलबाजार की तरफ जाने वाली यह सड़क चूड़ी लाईन,पेटी लाईन तथा मालवीय रोड को जोड़ती है।चूंकि सड़क अधिक लंबी नहीं है इसलिए इसका अभी तक पुराना नाम ही चर्चा में है।मराठा शासन काल में नागपुर सम्बलपुर तक ग्रेट ईस्टर्न रोड का निर्माण कराया गया था। यूरोपीय इंजीनियरों की सहायता से इसे पूरा किया गया तब से अभी तक जीई रोड चर्चा में है। वैसे कभी ‘लारी’ स्कूल के नाम से पहचान बनाने वाली शाला आजकल माधवराव सप्रे शाला के नाम से जानी जाती है।1911 में स्थापित सेण्ट पाल्स,1907 में अमेरिकन इनांडोलिकल इंटरनेशनल मिशन द्वारा स्थापित सालेम कन्या शाला आज भी इसी नाम से जानी जाती है।कंकाली पारा में स्थित आनंद समाज पुस्तकालय सबसे पुराना है। इसकी स्थापना 1908 में की गई थी।1875 में नांदगांव रियासत के तत्कालीन शासक स्व. महंत घासी दास द्वारा संग्रहालय (अजायब घर) की स्थापना की गई थी।डीके अस्पताल, मेकाहारा 700 बिस्तर अस्पताल के नाम पर चर्चा में है।1936में डीके अस्पताल की शुरुवात की गई थी तब इसका नाम सिल्वर जुबली अस्पताल थाऔर 56 बिस्तर हुआ करते थे।बाद में तरेंंगा के दाऊ कल्याण सिंह ने दान दिया और डी.के. अस्पताल के नाम से चर्चित रहा। आजकल यह सुपर अस्पताल कहलाता है।अभी भी बैरन बाजार (ब्रायरन के नाम से) स्थापित है। 1897-78 में लंदन के मिशन टू लीपर्स ने पंडरीतराई में कुष्ठधाम की स्थापना की थी।सवाल यह उठ रहा है कि आजादी के इतने सालों बाद में किसी प्रतिनिधि का ध्यान इस ओर कैसे नहीं गया…?कलेक्टर कार्यालय के पास स्थित टाऊनहाल का इतिहास काफी पुराना है। 12 अगस्त 1890 में तत्कालीन कमिश्नर ए एल एच प्रेशर ने शुभारंभ किया था इसका नामकरण बाद में वंदेमातरम हाल कर दिया गया है पर अभी भी यह बोलचाल में टाऊनहाल के नाम से ही चर्चित है।हैदराबाद की तर्ज पर ही मालवीय रोड स्थित रविभवन के मुख्य द्वारा पर एक चार मिनार स्थापित है। 1877 में जब महारानी विक्टोरिया रायपुर आई तब उन्हें यह उपहार स्वरूप दिया गया था।पहले द्वार के पीछे खाली मैदान में मेले -बाजार लगते थे। बाद में रविभवन के निर्माण के कारण ‘कैंसर ए हिन्द’ नाम का यह दरवाजा अपनी सुंदरता खो रहा है इसका उचित रखरखाव नहीं होने से यह भविष्य में धरासायी भी हो सकता है।

स्वामी विवेकानंद और
रायपुर में रहवास…..

तारीख हजारों साल में बस इतनी ही बदली है, तब दौर था पत्थर का अब लोग हैं पत्थर के

स्वामी विवेकानंद ने बालक नरेन्द्र के रूप में वर्ष 1877 में कुछ माह का समय रायपुर में ही गुजारा था। पिता,माता तथाअपने परिजनों के साथ स्वामी जी ने घर पर ही अध्ययन किया था। स्व. आत्मानंद के एक लेख के मुताबिक जब जबलपुर से बैलागाड़ी से बालक नरेन्द्र रायपुर आ रहे थे तब करीब 15 दिन का समय लगा था।रास्ते मेंदोनों किनारों पर पत्तों और फूलों से लदे हरे वनवृक्ष थे। उन्नत शिखर विंध्याचल में दोनों ओर पहाड़ कीचोटियां आकाश को चूमती खड़ी थी,फल-फूल से लगी वृक्षों की लताएं पर्वत को अपूर्व शोभा प्रदान कर रही थी।मधुर कलरव करते रंग-बिरंगे पक्षी घूम रहे थे। कभी आहार की खोज में धरती पर उतर रहे थे। कुछ ऐसे ही दृश्य स्वामी जी के पटल में अंकित हो गया संभवत: यह पहली भावा नुभूति थी।बहरहाल अभी भी बूढ़ापारा बिजली आफिस के सामने मेघ मार्केट के करीब वह भवन सुरक्षित है जहां स्वामी जी अपने परिवार के साथ कुछ समय रहे थे। वह कमरा अभी भी बंद रखा गया है। भवन को स्मारक बनाने की योजना भी बनी हैं।वैसे 2023 में स्वामी विवेकानंद के रायपुर आगमन के 146साल पूरे हो जाएंगे । वैसे स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट तथा बूढ़ातालाब में स्वामीजी की मूर्ति स्थापना कर उनका छग से संबंध दर्शाने का प्रयास तो हुआ ही है।

छ्ग की राजनीति में
वंशवाद जारी है….

तारीख हजारों साल में बस इतनी ही बदली है, तब दौर था पत्थर का अब लोग हैं पत्थर के

छत्तीसगढ़ में राजनीति में बंशवाद भी बदस्तूर जारी रहा। पं. रविशंकर शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल, विद्या चरण शुक्ल, भगवतीचरण शुक्ल, अमितेष शुक्ल राजनीतिक वंशवाद के उदाहरण हैँ।राघवेन्द्र राव, अशोक राव परिवार की वाणीराव,खैरागढ़ के राजा वीरेन्द्र बहादूर सिंह,पत्नी पदमावती देवी,शिवेन्द्र बहादूर सिंह,गीतादेवी, रश्मि देवी,देवव्रत सिंह,पूर्व मुख्यमंत्री नरेशचंद सिंह, पुत्री कमला देवी सिंह, पुष्पादेवी सिंह,सरायपाली के कुमार वीरेन्द्र बहादूर सिंह,भाई महेन्द्र बहादूर सिंह ,पुखराज सिंह,देवेन्द्र बहादुर सिंह,जयदेव सतपथी,लक्ष्मण सतपथी, राजा सुरेन्द्र बहादूर सिंह पुत्री उर्वशी सिंह, विसाहुदास महंत,डॉ. चरणदास महंत, दिलीप सिंह जूदेव,प्रबल प्रताप सिंह जूदेव,बहु संयोगिता जूदेव,युद्धवीर सिंह, शिवलाल मेहता,पत्नी कलावती मेहता, कुमारी देवी चौबे पुत्र प्रदीप चौबे, रविन्द्र चौबे,बलीराम कश्यप पुत्र दिनेश कश्यप, केदार कश्यप,लखीराम अग्रवाल पुत्र अमर अग्रवाल,मोतीलाल वोरा पुत्र अरूण वोरा, झुमुक लाल भेड़िया भतीजा डोमेन्द्र भेड़िया,बहु अनिला भेड़िया,पुन्नुलाल मोहले पुत्र विक्रम मोहिले,मिनीमाता, के दत्तक पुत्र विजय गुरू पोता रूद्र गुरू,अरविंद नेताम,पत्नी छबीला नेता,भाई शिव नेताम, मनकुराम सोढ़ी पुत्र शंकर सोढ़ी,भवानी लाल वर्मा, पुत्र नोवल वर्मा,श्रीमती शशिप्रभा देवी पुत्र योगीराज सिंह,बीआर यादव,पुत्र नरेन्द्र यादव, रमेश बैस,भाई श्याम बैस आदि कई उदाहरण है।छत्तीसगढ़ में जीरमघाटी में नक्सली हमले में शहीद महेन्द्र कर्मा की पत्नी देवती कर्मा,पुत्र छविंद्र कर्मा,उदय मुदलियार की पत्नी अलका मुदलियार,पुत्र और नंद कुमार पटेल के पुत्र उमेश पटेल राजनीति में हैं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पत्नी डॉ. रेणु जोगी लगातार विधायक बनती आ रही है उनके पुत्र अमित जोगी भी विधायक बन चुके हैं। बहु ऋचा भी फिर से चुनाव लड़ रही है। मनहरण लाल पांडे की पुत्री हर्षिता पांडे,भी चुनाव लड़ चुकी हैं तो पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह के पुत्र अभिषेक सिंह भी लोस सदस्य बन चुके हैं तो भांजे भी इस बार चुनाव समर में हैं।कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में अभी भी वंशवाद की राजनीति का क्रम बदस्तूर जारी है।

जोगी और जूदेव परिवार
में फिर मुकाबला…

तारीख हजारों साल में बस इतनी ही बदली है, तब दौर था पत्थर का अब लोग हैं पत्थर के

छ्ग में अजीत जोगी और दिलीप सिंह जूदेव परिवार के बीच की राजनीतिक प्रतिद्वंदिता अभी भी बरकरार है। हालांकि दोनों परिवारों के मुखिया अजीत जोगी और दिलीप सिंह जूदेव क़ा निधन हो चुका है।दरअसल छ्ग के पहले सीएम अजीत जोगी के कार्यकाल में ही रिश्वत लेते एक विडियो जारी होने के बाद जूदेव को अटल मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था।”पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा से कम भी नहीं” इस वीडियो के लिये जूदेव परिवार जोगी परिवार पर आरोप लगाता रहा है? वैसे इस वीडियो के वायरल होने के बाद दिलीप सिँह जूदेव का एक तरह से राजनीतिक़ पराभाव ही हुआ था। खैर बाद में 2009के बिलासपुर लोकसभा चुनाव में दिलीप सिंह जूदेव ने करीब 20 हजार मतों से डॉ रेणु अजीत जोगी को पराजित किया था।अब फिर कोटा विस से लगातार कांग्रेस और जोगी कांग्रेस से विजयी होती रही डॉ रेणु जोगी के मुकाबले में भाजपा ने जूदेव के बेटे प्रबल प्रताप सिँह जूदेव को मैदान में उतरा है,वैसे कांग्रेस के अटल श्रीवास्तव भी चुनाव समर में उतरा है….देखना है जूदेव -जोगी परिवार में किसकी फ़तह होती है…?या कोई और यहां से विजयी होता है।

और अब बस…

0अजीत जोगी की पत्नी और मौजूदा विधायक रेणु जोगीcतथा उनकी बहू ऋचा जोगी चुनाव समर में है।
0अजातशत्रु बृजमोहन अग्रवाल का मुकाबला इस बार महंत राम सुंदरदास से हो रहा है।
0 पूर्व आईएएस ओपी चौधरी और नीलकंठ टेकाम राजनीति में अपना भाग्य आजमा रहे हैं।


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घूमता दर्पण, कोयलांचल में 1993 से विश्वसनीयता के लिए प्रसिद्ध अखबार है, सोशल मीडिया के जमाने मे आपको तेज, सटीक व निष्पक्ष न्यूज पहुचाने के लिए इस वेबसाईट का प्रारंभ किया गया है । संस्थापक संपादक प्रवीण निशी का पत्रकारिता मे तीन दशक का अनुभव है। छत्तीसगढ़ की ग्राउन्ड रिपोर्टिंग तथा देश-दुनिया की तमाम खबरों के विश्लेषण के लिए आज ही देखे घूमता दर्पण

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