पर्यटन

पहाड़ों से उतरती हसदो नदी का अप्रतिभ सौंदर्य- अमृत धारा जलप्रपात

हसदो नदी का अप्रतिभ सौंदर्य अमृतधारा जलप्रपात पृथ्वी और प्रकृति का विशाल आंचल जाने क्या-क्या जादूई करतब और दृश्य पैदा करती है. भारत देश के विशाल आंगन में कहीं हरियाली भरे घास के मैदान दिखाई पड़ते हैं और कहीं आपसी प्रतिस्पर्धा में नित्य नए ऊंचे होते हुए पेड़ों की लंबी श्रृंखला अलग-अलग नाम से अपनी पहचान बनाती है. कान्हा राष्ट्रीय उद्यान खुले घास के मैदान के प्राकृतिक सौंदर्य की पहचान बनाती है, वहीं साल वनों के सतपुड़ा के जंगल अपनी अलग पहचान के लिए कहीं-कहीं इतने ऊंचे हो गए जहां नीचे से पेड़ की ऊंचाई देखने में आपकी टोपी नीचे गिर जाएगी.

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पहाड़ों से उतरती हसदो नदी का अप्रतिभ सौंदर्य- अमृत धारा जलप्रपात
साल (सरई) के जंगलों और पहाड़ों की गोद में पशु पक्षी जहां धमा-चौकड़ी करते शोर मचाते हैं वही इन्हीं पहाड़ों के बीच से छम छम करती एक नदी की धार बहकर आपके सामने खड़ी हो जाती है, और मनमोहक पहाड़ों और जंगलों की छवि के बीच से गुजरते हुए एक छोटी जलधारा बाहर निकाल कर एक हिरनी के बच्चे की भांति कुलांचे भरती आगे बढ़ती जाती है. नदियों के लिए किसी रास्ते की जरूरत नहीं पड़ती वह तो अपना रास्ता खुद बनाती है. मनमौजी नदी को जहां मन हुआ घूम जाती है, पेड़ों और पहाड़ों के बीच अपनी लंबी यात्रा तय करते हुए जाने कब पहाड़ों के नीचे कूद जाती है पता ही नहीं चलता. अपनी जलधारा की करोड़ों बूंदो को उछालकर आगे की यात्रा के लिए नीचे थोड़ा सुस्ता कर अपनी थकान मिटाकर फिर धीरे-धीरे आगे चलने लगती है. नदी की इस छलांग पर ऐसा प्रतीत होता है कि सावन भादो की बरसात में रास्ते में बने गड्ढे मे भरे हुए पानी में अपने छोटे-छोटे जूते पहनकर एक नन्ही बालिका ने छलांग लगाई हो और कीचड़ भरी पानी की बूंदों ने बिटिया के मुखड़े पर खुशियों के रंग भर दिए हो.
जी हां भगवान राम के वनवास काल में ऋषि मुनियों के सिद्धि और तपस्या के लिए चर्चित दंडकारण्य का कोरिया अंचल देवभूमि कहलाता था. आज भी उनकी तपस्थली के कण–कण में उनके स्मृतियां विराजमान है. कोरिया से निकलकर निर्मित नए जिले “मने्न्द्रगढ़- चिरमिरी- भरतपुर” के आंचल में हसदो नदी का अमृतधारा जलप्रपात नदियों के सौंदर्य की ऐसी ही एक प्राकृतिक कृति है जिसे अपलक देखते रहने के बाद भी आपका मन नहीं भरता. अवाक होकर उसकी सुंदरता को व्यक्त करने के लिए कोई शब्द नहीं मिलते.
बैकुंठपुर से सोनहत रामगढ़ जाने के मार्ग में दक्षिण दिशा में फैली मेंड्रा की पहाड़ियों से उतरकर जमीन में भूमिगत मार्ग से आगे बढ़कर एक महुआ के पेड़ के नीचे खुली जड़ों के बीच छोटी धार के रूप में बहती हुई ढोढ़ी का निर्माण करती है. आसपास के गांव के लोगों में अपने दैनिक उपयोग के लिए इसे लड़कियों से बांध दिया गया है ताकि अगल-बगल के नाले का कचरा इसमें ना जा सके. आप सोच रहे होंगे कि ढोड़ी का पानी पीने और निस्तार के लिए गांव वाले कैसे उपयोग करते होंगे. ग्रामीण जनजीवन की अपनी अलग परिभाषा होती है जिसमें प्रकृति से प्राप्त वस्तुओं से जीवन जीने की कला सिखाई जाती है. नदिया भी इस प्रकृति का एक हिस्सा बनकर आगे चलती है. जिसमें मानव और पशु- पक्षी अपने जीवन के लिए साधन एकत्र करते हैं . इसी महुआ के पेड़ के जड़ों से निकलकर आगे बढ़ती हसदो नदी से सहयात्री बनकर कई छोटे-छोटे नाले इसमें विलीन हो जाते हैं और हसदो नदी के पाट को विशालता का दर्जा प्रदान करते हैं .आसपास फलते फूलते सघन वन “आगे बढ़ो- आगे बढ़ो हसदो” का उद्घोष करके अपने पत्तों के हिलोरों से उठती हुई आवाज देकर हंसदो नदी का मनोबल बढ़ाती है .
अमृत धारा तक पहुंचने के लिए मनेन्द्रगढ़ से राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 43 के रास्ते कटनी- गुमला मार्ग पर 22 किलोमीटर आगे लाई नागपुर ग्राम से बाईं ओर मुड़कर आगे चलना होगा. अंबिकापुर या चिरमिरी से आने की स्थिति में नागपुर लाई आपके बीच रास्ते में मनेन्द्रगढ़ से 22 किलोमीटर पहले दाहिनी और घूमना होगा. जंगलों और गांव के बीच से पक्की सड़क द्वारा 8 किलोमीटर आगे ऊंची नीची पहाड़ी मार्ग से आगे बढ़ने पर सड़क किनारे साल, लाख, कुल्लू, टेसू, आंवला और कई वनौषधियों के मिश्रित वनों के बीच से गुजर कर आप अमृतधारा जलप्रपात पहुंचेंगे. यहाँ पर हसदो नदी का 15 – 20 का चौड़ा पाट अपने पूरे जलधारा के साथ पत्थरों को काटती हुई 90 फीट की ऊंचाई से नीचे गिरती नदी की छलांग वहां पहुंचने पर आपको वाह। कहने के लिए बाध्य कर देती है. चौड़ी धारा में बहता पानी का सौंदर्य पत्थरों से नीचे गिरते ही दुगना हो जाता है. मन इतना खुश हो जाता है कि लगता है हाथों में जलप्रपात को समेट लें, लेकिन इतने विशाल नदी की धार को केवल आंखों की पलकों में या कमरे में कैद किया जा सकता है. किवदंतियों में यह कहा जाता है कि हसदो नदी को भोलेबाबा का आशीर्वाद प्राप्त है इसलिए यह नदी बारहोमास बहती है. इसके 400 फीट नीचे एक विशाल शिवलिंग स्थित है और हसदो उनका जलाभिषेक करती है. यही कारण है कि यह धरती पुण्य और प्रतापों की धरती है. इन्हीं किवदंतियों से आगे यदि पौराणिक तथ्यों को मानें तो बालमीक रामायण के अरण्य कांड में यह बात छनकर आती है कि यहां भगवान राम ने अपने वनवासी जीवन काल में ऋषि मुनियों से आशीर्वाद एवं उनके तप एवं पराक्रम से प्राप्त सिद्धियो को प्राप्त करने के लिए मुनियों के आश्रम पहुंचे थे, जिसमें से अमृत धारा जलप्रपात के तट पर उन्होंने वामन ऋषि से आशीर्वाद प्राप्त किया था और इसके बाद उन्होंने अपनी आगे की यात्रा पूर्ण की थी. हसदो अपनी सहायक नदियाँ गेज (बैकुंठपुर) और हसिया मनेन्द्रगढ़ के साथ आगे बढ़ती हुई अपना विस्तार पाती है आगे जाकर हसदो महानदी में मिलकर बांगो बांध का निर्माण करती है, जो छत्तीसगढ़ के बिजली उत्पादन की मुख्य बांगो बांध की मुख्य नदियों में से एक है. कोरबा में पहुंचकर छत्तीसगढ़ के विद्युत सूर्य के नाम से जानी जाती है.
हसदो नदी के इस अमृतधारा जलप्रपात को छत्तीसगढ़ पर्यटन परिपथ में भी शामिल किया गया है गांव और जंगलों के बीच पक्की रोड से यहां तक पहुंचाने की व्यवस्था राज्य शासन द्वारा की गई है. आप यहां पहुंचकर विश्राम कर सकते हैं. जिला पंचायत विभाग द्वारा यहां कई कॉटेज उपलब्ध कराए गए हैं, जो पर्यटकों को रूकने एवं रात्रि विश्राम के लिए भी उपलब्ध कराए जाते हैं. वन विभाग का एक बेहतर रेस्ट हाउस भी यहां उपलब्ध है. जो वन विभाग के सहयोग से प्राप्त किया जा सकता है. रात्रि पड़ाव हेतु यहां बिजली की पर्याप्त व्यवस्था है. सोलर लाइट लैंप से जलप्रपात का दूधिया सौंदर्य का रात्रि में भी आप आनंद ले सकते हैं. रेस्ट हाउस की बाउंड्री के अंदर बनी दर्शक दीर्घा पर कुर्सी लगाकर भी आप इस प्राकृतिक नजारे को आंखों मे समेट सकते हैं. काफी व्यवस्थाओं के बावजूद एक अच्छे भोजनालय की कमी आज भी इस पर्यटन स्थल पर चांद में दाग की तरह प्रतीत होता है. इस दिशा में शासकीय और गैस गैर शासकीय संसथानों का प्रयास इसे और अच्छे पर्यटक पर्यटन स्थल के रूप में आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत है.


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