छत्तीसगढ़

कलचुरी राजवंश ने छ्ग से मुम्बई के एलीफेण्टा तक राज किया था…

वरिष्ठ पत्रकार शंकर पांडे की कलम से...{किश्त 149 }

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छत्तीसगढ़ को आदिवासी बाहुल्य,पिछड़ा बाहुल्य क्षेत्र मानने को लेकर विवाद है, कभी यहां आदिवासी राजाओं का वर्चस्व था,करीब 500 साल पूर्व तक छग में हैहयवंशी (कलचुरी) राजवंश काबिज था, मुम्बई के ‘एलीफेण्टा केव’ से लेकर सम्बलपुर(ओड़िसा) तक इनका राज था।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण,यूनेस्को के अनुसार, एलीफेंटा भी प्राचीन काल में बसा था। गुफा मंदिरों का निर्माण भी 5वीं और 6वीं शताब्दी के बीच किया गया था, विद्वान आमतौर पर मंदिरों के पूरा होने को 6वीं शताब्दी की दूसरी तिमाही, गुप्त साम्राज्य युग में कलात्मक विकास की अवधि की निरंतरता के रूप में मानते हैं। विद्वान, गुफा मंदिरों के निर्माण का श्रेय कलचुरिवंश के राजा कृष्णराज को देते हैं,इसका काल छठीँ शताब्दी के मध्य का है,एक हिंदू कलचुरी राजा द्वारा निर्मित मुख्य रूप से शिवस्मारक है,जो मुद्रा शास्त्रीय साक्ष्यों, शिला लेखों, निर्माणशैली, अजंता गुफाओं सहित अन्यदक्कन गुफा मंदिरों की ही बेहतर डेटिंग पर आधारित है…? चार्ल्स कॉलिन्स की मानें तो एलीफेंटा गुफाओं के महत्व को प्राचीन और प्रारंभिक मध्ययुगीन हिंदू साहित्य के साथ-साथ उप महाद्वीप के बौद्ध, हिंदू और जैन गुफा मंदिरों के अध्ययन करने से बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। ऐतिहासिक एली फेंटा कलाकृति रुद्र और बाद में शिव पर वैदिक ग्रंथों,महा काव्यों, पुराणों और 5वीं शताब्दी में रचित हिंदूधर्म के पाशुपत शैव साहित्य संग्रह में पाने वाली पौराणिक कथाओं अवधारणाओं और आध्यात्मिक विचारों से ही प्रेरित थी। पैनल उन विचारों और कहानियों को प्रति बिंबित करते हैं जो लगभग 525 ईस्वी तक भारत के कलाकारों, गुफा वास्तुकारों के बीच व्यापक रूप से स्वीकृत और प्रसिद्ध थे। ग्रंथों में पौराणिक कथाओं में काफी भिन्नता है, बाद के प्रक्षेपों द्वारा इसे बहुत विकृत कर दिया गया है, एलीफेंटा गुफा पैनल 6 वीं शताब्दी में सबसे महत्वपूर्ण कथा संस्करण का प्रतिनिधित्व करते हैं,कलाकृति अपने उदारवाद,प्रवाह और गति के माध्यम से पहली सहस्राब्दी ईस्वी के मध्य में हिंदू संस्कृति पर वैदिक और उत्तर-वैदिक धार्मिक विचारों के प्रभाव को व्यक्त करती हैं।छठी शताब्दी में गुफाओं के बनने पर एलीफेंटा,घारापुरी (गुफाओं का गांव) के रूप में लोकप्रिय हो गया यह नाम आज भी मराठी में उपयोग किया जाता है। यह गुजरात सल्तनत का हिस्सा बन गया, इसे 1534 में पुर्तगाली व्यापारियों को सौंप दिया।पुर्तगालियों ने हाथी की इस विशाल चट्टान-कट पत्थर की मूर्ति के लिए इस द्वीप का नाम “एलीफेंटा द्वीप”ही रखा जिसका उपयोग डॉकिंग के लिए किया था उनकी नावें और इसे मुंबई के पास के अन्य द्वीपों से अलग करने के लिए एक मील का पत्थर है। हाथी की मूर्ति को इंग्लैंड भेजने के प्रयासों में क्षतिग्रस्त कर दिया गया था,1864 में विक्टोरिया गार्डन ले जाया गया था,1914 में कैडेल और हेवेट द्वारा इसे फिर से जोड़ा गया था,और मुंबई में जीजामाता उद्यान में स्थित है।सन 1939 तक ओड़िसा का बड़ा हिस्सा छग में ही शामिल था। वैसे 1818 में तीसरे मराठा युद्ध मेंअंग्रेजों ने मराठों को हटा ओड़िसा सहित पूरा छत्तीसगढ़अपने अधीन कर लिया था। छग का 70% हिस्सा सामंतवाद से घिरा रहा। छग के नक्शे में उपर से अंबिकापुर, जशपुर, कोरिया, सरगुजा, धरमजयगढ़, रायगढ़, सारंगढ़, सक्ती, कवर्धा, डोगरगढ़, खैरागढ़, राजनांदगांव तथा नीचे से दंतेवाड़ा, बस्तर कांकेर, जगदलपुर आदि क्षेत्रों का लगभग दो तिहाई क्षेत्रों पर राजवंश काबिज रहा। छत्तीसगढ़ में 14 राजा थे, कवर्धा, खैरागढ़, राजनांदगांव, सक्ति, छुईखदान, सारंगढ़, रायगढ़, जशपुर, धरमजयगढ़, कोरिया, सरगुजा, चॉगबखार,  बस्तर, कांकेर के राजाओं का पहले वर्चस्व था,देश की आजादी के बाद राजनीति में भी इन क्षेत्रों के कुछ पूर्व राजाओं का महत्वपूर्ण स्थान रहा। राजाओं में अधिकतर गोंड राजा थे। राजाओं के अपने कोर्ट (न्यायालय), पुलिस भी थी। इनके पोलिटिकल एजेण्ट रायपुर में होते थे, छग में राजाओं के अलावा जमींदार अधिक थे। इनका काम राजस्व इकट्ठा करना होता था। बदले में कमीशन मिलता था। बस्तर, कांकेर, जशपुर, धरमजयगढ़, सरगुजा, कोरिया,चॉगबखार के राजा ‘ठाकुर’ थे, राजनांदगांव, छुईखदान के राजा ‘महंत’ थे। खैरागढ़ सक्ती, सारंगढ़, रायगढ़, कवर्धा के राजा ‘गोंड’ थे। छत्तीसगढ़ में गोंड को मूल निवासी माना जाता है पर इनके छग आने को भी लेकर भी कई चर्चाएं है कुछ की मान्यता है कि ‘गोंड’ तमिलनाडु सेआये थे इसके पीछे तर्क यह है कि गोंड़ी भाषा की एक से 10 तक गिनती तमिल में है। कुछ लोगों का कहना है कि गोंड राजा ‘गढचिरौली’ से आये थे।गढचिरौली पहले ‘चांदा’ था, फिर चंदपुर कहलाया और गढ़चिरौली हो गया है। लोगों की मान्यता है कि गोड गोदावरी नदी से उत्तर की ओर चले, नागपुर से भोपाल तक पहुंचे, शाखा इंद्रावती होकर उड़ीसा और छत्तीसगढ़ चली आई थी।


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