छत्तीसगढ़

हसदो नदी पर बना ईंट का पुराना रेलवे पुल ( एशिया की श्रेष्ठ अमूल्य धरोहर )

(पर्यटन अंक- 8 )

Ghoomata Darpan

हसदो नदी पर बना ईंट का पुराना रेलवे पुल ( एशिया की श्रेष्ठ अमूल्य धरोहर )
रेलवे ब्रिज की तत्कालीन तकनीक एवं इंजीनियरिंग का विशिष्ट उदाहरण ईंट का पुराना रेल्वे पुल आज सन् 1924 के आगमन के साथ अपने निर्माण वर्ष के 99 वर्ष पूर्ण करते हुए धरोहर बनने की कगार पर है. धरोहर विशेषज्ञों के अनुसार कोई भी मानव या मशीनीकृत संरचना 100 वर्ष पूर्ण करने के बाद धरोहर की सूची में शामिल हो जाती है. मनेन्द्रगढ़ एवं चिरमिरी के सीने में दबे कोयले की समाप्ति के साथ आज हमारे आर्थिक स्रोत समाप्त हो रहे हैं किंतु इस ब्रिज ने हमें उस आर्थिक स्रोतों के समाप्ति पर एक मरहम का काम करते हुए एशिया के श्रेष्ठ ईंट पूल होने का स्थान बनाते हुए इस मिट्टी को नाम और शोहरत प्रदान की है. धन्य है यह मनेन्द्रगढ़ की मिट्टी जिस पर हम निवास करते हैं.

हसदो नदी पर बना ईंट का पुराना रेलवे पुल ( एशिया की श्रेष्ठ अमूल्य धरोहर ) हसदो नदी पर बना ईंट का पुराना रेलवे पुल ( एशिया की श्रेष्ठ अमूल्य धरोहर )
(11 स्तंभ पर बना ईंट का पुल,तात्कालिक शिल्प कलाकार एक अद्भुत उदाहरण है ईंट का बना यह पुल आज एशिया मैं सर्वश्रेष्ठ पुल कहलाता है)

आजादी पूर्व के भारत के नक्शे में कई राज्य अलग-अलग हिस्सों में बटे हुए थे. जहां राजा अपने अपने राज्य में अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यवसायिक, विकास के साथ अपनी कानून एवं व्यवस्था संभालते थे. ब्रिटिश शासन काल में कार्य एवं प्रशासनिक व्यवस्था के लिए इस क्षेत्र का संचालन सी पी बरार प्रांत के अंतर्गत किया जाता था जिसका मुख्यालय आजादी के बाद भी महाराष्ट्र नागपुर था. इसके अंतर्गत मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं महाराष्ट्र का क्षेत्र शामिल था. वर्तमान मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं विरार का यह भाग सतपुड़ा एवं अजंता की पहाड़ियों से परिपूर्ण था. यहां ताप्ती, पूर्णा, वर्धा, और वेनगंगा जैसे नदियों का बहाव था. यह क्षेत्र पहले हैदराबाद के निजाम के कब्जे में था जो 5 नवंबर 1902 को एक समझौते के तहत अंग्रेजों को दे दिया गया.

हसदो नदी पर बना ईंट का पुराना रेलवे पुल ( एशिया की श्रेष्ठ अमूल्य धरोहर )
19वीं सदी के विकास के दौर में जब भाप इंजन का प्रयोग प्रारंभ किया गया. उस समय विशाल भारत को जोड़ने के लिए भाप इंजन चलित रेल व्यवस्था का प्रारंभ किया गया. रेल आवागमन के साथ-साथ माल ढुलाई का एक सशक्त साधन बनकर उभरा. उस समय सड़क व्यवस्था बहुत अच्छी नहीं होने के कारण रेल व्यवस्था पर हमारी आत्मनिर्भरता ज्यादा थी, इसलिए ब्रिटिश शासन द्वारा रेल परिवहन को बढ़ावा दिया जा रहा था लेकिन रेल लाइन के विस्तार के लिए आवश्यक सामग्री में रेल की पटरियां बिछाने के लिए साल की लकड़ी के ठोस स्लीपर तथा भाप इंजन के संचालन के लिए पानी एवं कोयले की आवश्यकता थी जो उमरिया सहित इसके मध्य भारत के वर्तमान सी आई सी जोन में उपलब्ध था. सी आई सी के अंतर्गत उमरिया, चिरमिरी एवं मनेन्द्रगढ़ की कोयला खदान शामिल थी. हालांकि बिहार एवं बंगाल के क्षेत्र में कोयला पहले से ही निकाला जा रहा था किंतु कुकिंग कॉल की बजाय रेल इंजन के लिए नाम कुकिंग कोल की आवश्यकता थी जो इस क्षेत्र में पाया जाता था इसलिए पूर्व कोरिया स्टेट में नानकोकिंग कोल की संभावनाओं को देखते हुए ब्रिटिश सरकार द्वारा रेल लाइन के विस्तार की रूपरेखा तय की गई ताकि निर्बाध गति से यहां से कोयला एवं साल स्लीपर देश के अलग-अलग क्षेत्र में भेजे जा सके. चिरमिरी में तत्कालीन कोरिया स्टेट के राजा श्री रामानुज प्रताप सिंह देव ने 1923 में कोयला उत्खनन के लिए पहली बार स्वीकृति प्रदान की थी और छोटे स्तर पर यहां कोयले का उत्पादन प्रारंभ हो चुका था लेकिन व्यावसायिक उत्पादन के लिए रेल एवं परिवहन व्यवस्था नहीं थी इसी परिवहन को ध्यान में रखते हुए रेल विभाग ने बंगाल – नागपुर की रेल लाइन के अनूपपुर से आगे चिरमिरी तक जोड़ने एवं विस्तार की कार्य योजना बनाई गई किंतु मनेन्द्रगढ़ की हसदो नदी की बाधा सामने पड़ी जिसमें एक मजबूत पुल के निर्माण के बिना आगे रेल ले जाना संभव नहीं था. ब्रिटिश कालीन रेल इंजीनियरों की तकनीकी विशेषज्ञ टीम ने इसे एक चैलेंज के रूप में स्वीकार किया और विशिष्ट निर्णय के तहत ईट एवं पत्थरों से पुल निर्माण का निर्णय लिया गया.
तत्कालीन समय में जर्मन की तकनीक ज्यादा प्रभावी मानी जा रही थी. ऐसी स्थिति में ब्रिटिश इंजीनियरों ने जर्मन इंजीनियरों के सहयोग से इसे बनाने का संकल्प लिया. जानकारी के अनुसार 1925 में रुस से पत्थरों एवं ईंत को जोड़ने के लिए बाइंडिंग मटेरियल अर्थात सीमेंट मंगाई गई एवं बिना लोहे के उपयोग के इस ईंट के ब्रिज को बनाने के लिए जर्मन इंजीनियरों की इंजीनियरिंग तकनीक का प्रयोग किया गया. इस स्टोन ब्रिज का निर्माण कार्य दो वर्षों तक चला . 1925 से लेकर 1927 तक इस पुल का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो गया. इस बीच नदी के दोनों ओर रेल लाइन बिछाने का कार्य चलता रहा. 1928 में कारीमाटी अर्थात मनेन्द्रगढ़ तक रेलवे लाइन बिछाई जा चुकी थी. ऐसी स्थिति में कारीमाटी पुराने नाम के बदले एक नए नाम की आवश्यकता हुई और कोरिया स्टेट के राजा रामानुज प्रताप सिंह देव से अनुरोध करने पर उन्होंने अपने पुत्र राजकुमार मनेन्द्रसिंह देव के नाम पर कारी माटी नगर के स्थान पर इस नए रेलवे स्टेशन का नाम मनेन्द्रगढ़ रखने की स्वीकृति प्रदान की.
बंगाल – नागपुर रेलवे की अनूपपुर चिरमिरी रेल लाइन के मनेन्द्रगढ़ में ईंट से बने इस पुल की लंबाई 219.4 मीटर अर्थात 720 फीट, चौड़ाई 7.01 मी अर्थात 23 फीट, एवं ऊंचाई 34.44 मीटर अर्थात 113 फीट है. पुलों के निर्माण में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि उस पुल के नीचे बहने वाली नदी का एच एफ एल उच्चतम बहाव की ऊंचाई कितनी है जोउस समय लगभग 80 से 90 फीट तक था. यही कारण है कि उस ऊंचाई को पत्थरों से एवं उसके ऊपर के ब्रिज को ईंट से जोड़ा गया. 11 पत्थरों के स्तंभ पर निर्मित यह पुल अपनी चौड़ाई में पूरी ट्रेन को समा लेने की क्षमता रखता था. इसके आवागमन के बीच में जगह-जगह चौड़ाई में फेंसिंग करके स्थान छोड़े गए हैं जो अचानक ट्रेन आ जाने की स्थिति में मरम्मत करने वाली मजदूरों के एवं कर्मचारियोंको किनारे सुरक्षित खड़े रखने के लिए बनाए गए हैं.
रेलवे ब्रिज की तत्कालीन तकनीक एवं इंजीनियरिंग का सरताज यह विशिष्ट पुल आज सन 1924 के आगमन के साथ अपने निर्माण वर्ष के 99 वर्ष पूर्ण करते हुए धरोहर बनने की कगार पर है. धरोहर विशेषज्ञों के अनुसार कोई भी मानव या मशीनीकृत संरचना 100 वर्ष पूर्ण कर लेने के बाद धरोहर की सूची में शामिल हो जाती है. मनेन्द्रगढ़ एवं चिरमिरी के सीने में दबे कोयले की समाप्ति के इस दौर में जब इस अंचल के आर्थिक स्रोत सुख रहे हैं ऐसे समय पर हमें संतोष होता है कि हमारे क्षेत्र के इसी कोयल ने देश भर के रेलवे के पहिए को गति देकर राष्ट्रीय विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है. इसके बदले इस अंचल को ज्यादा कुछ मिला तो नहीं लेकिन हमें खुशी है की आज एशिया का अद्वितीय श्रेष्ठ तकनीक का यह ब्रिज हमारी अमूल्य धरोहर बनकर मनेन्द्रगढ़ की भूमि पर स्थित है. और मनेन्द्रगढ़ के निवासी होने के नाते हम इस मिट्टी पर गर्व करते हैं.
रेलवे प्रशासन के अधिकारियों से हमारा अनुरोध है कि इस दिन प्रतिदिन क्षरण होते हुए इस ब्रिज को संरक्षित करने के प्रयास किया जायें, ताकि पर्यटकों के लिए रेलवे की यह अमूल्य धरोहर वर्षों तक पर्यटकों के लिए खुली रहे और आने वाले पर्यटक तत्कालीन वास्तु शिल्प की एक अमूल्य धरोहर से साक्षात्कार कर सकें. इस दिशा मे भी प्रयास किया जाये कि लोहे से बने नवनिर्मित ब्रिज के नीचे से यदि अंडर ब्रिज बनाकर दो पहिया वाहन एवं पैदल यात्रियौं के सुरक्षित आवागमन का रास्ता दिया जा सके. इस सुविधा से पर्यटक दूसरी ओर जाकर फोटोग्राफी कर सकेंगे एवं समीपस्थ ग्राम परसगढ़ी के ग्राम्यांचलों के जीवन शैली एवं संस्कृति को समझ सकेंगे.

हसदो नदी पर बना ईंट का पुराना रेलवे पुल ( एशिया की श्रेष्ठ अमूल्य धरोहर )

रेल्वे पुल के क्षतिग्रस्त हुए हिस्से में रिपेयरिंग के लिए लगा लोहा

हसदो नदी पर बना ईंट का पुराना रेलवे पुल ( एशिया की श्रेष्ठ अमूल्य धरोहर )

 


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