छत्तीसगढ़

इनकी भाषा अद्भुत है जो कई विधाओं का सम्मिश्रण है जो कभी गुदगुदाती है तो कभी तीखे व्यंग्य करती है भाषा एकदम नए तरह की है ‌

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मनेन्द्रगढ़। एमसीबी। इनकी भाषा अद्भुत है जो कई विधाओं का सम्मिश्रण है जो कभी गुदगुदाती है तो कभी तीखे व्यंग्य करती है भाषा एकदम नए तरह की है ‌

इनकी भाषा अद्भुत है जो कई विधाओं का सम्मिश्रण है जो कभी गुदगुदाती है तो कभी तीखे व्यंग्य करती है भाषा एकदम नए तरह की है ‌
विगत दिनों हसदेव हाउस लेदरी में कोरिया साहित्य व कला मंच मनेन्द्रगढ़ द्वारा आयोजित उत्तराखंड के लेखक ललित मोहन रयाल के समान में आयोजित कार्यक्रम में श्री रयाल के कृतित्व पर चर्चा करते हुए समीक्षक डा रामकिंकर पाण्डेय ने कहा कि श्री रयाल नए नए प्रयोग करनेवाले लेखक हैं इनका लेखन पाठक को सीधे लेखन के समय में ले जाने में समर्थ है जो किसी फिल्म की तरह हमें उस समय में ले जाता है इससे बड़ी बात यह है कि लेखक ने आधुनिकता के साथ साथ संस्कृति और संस्कारों का साथ नहीं छोड़ा है जो पूरे लेखन में अपनी छाप छोड़ता है संस्मरणों की किताब “खड़कमाफी की स्मृतियों से” हमें बीते समय में ले जाती है जहां लेखक के विद्यार्थी जीवन एवं जीवन संघर्ष को देखने का अवसर मिलता है इस किताब में वर्णित उक्तियां भी गुदगुदाती हैं जैसे दण्ड विधान में पारंगत शिक्षकों का अलग ही सम्मान था,जिस विद्यालय में दण्ड विधान कमजोर होता था उसे निम्न श्रेणी का माना जाता था

इनकी भाषा अद्भुत है जो कई विधाओं का सम्मिश्रण है जो कभी गुदगुदाती है तो कभी तीखे व्यंग्य करती है भाषा एकदम नए तरह की है ‌
इसी तारतम्य में संस्था की वरिष्ठ साहित्यकार अनामिका चक्रवर्ती ने कहा कि ललित जी के लेखन में सरल और सहजता होने के बावजूद उसमें एक उसकी विशिष्टता उसे एक नए रूप में पेश करती है।
उनके लेखन की विशेषता यही है की जीवन के रोजमर्रा की बातें और घटनाएं जो हमारे जीवन पर एक गहरा असर करती है और उन्हें एक दिशा देने में अपनी मजबूत भूमिका निभाती है वह किसी धरोहर की तरह उनकी पुस्तकों में विराजमान है।
और पाठक जब भी उनकी पुस्तकों से गुजरेंगे और उस धरोहर को करीब पाएंगे तब वे जीवन के उन दृश्यों में उन घटनाओं में उन परिवेश में प्रवेश करेंगे जहां से उनकी एक पीढ़ी निकल कर आई है वह खुद निकल कर आए हैं और उनकी आने वाली पीढ़ी को उस गुजरे हुए वक्त से जीवन के समीकरण को समझने के सूत्र मिलेंगे।
उनकी पुस्तक बातों ही बातों में बड़ी से बड़ी बात को समझनाने की क्षमता रखती है।
वहां हंसाते हंसाते जीवन की बड़ी सीख दे जाती है जीवन के संघर्ष का सुंदर परिणाम दिखा जाती है।
ललित जी के साथ दो मुलाकात हुई और दोनों ही मुलाकातों में इतनी कम उम्र में प्रशासनिक सेवा देते हुए अपनी दायित्व को निभाते हुए लेखन की एक अलग ही दुनिया बसाने में और बनाने में उनका जो व्यक्तित्व दिखा वह बहुत ही प्रशंसनीय एवं सराहनीय है।
उनकी मनुष्यता और उनकी संवेदनशीलता बड़े अधिकारी और एक सफल साहित्यकार होने के साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर चलती है और उनकी यात्रा में उनके गांव की मिट्टी की खुशबू पहाड़ों की ठंडी हवा का अनुभव कराती है।

उनकी हाल ही में आई किताबों के लिए बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं एवं आने वाली किताबों के लिए अग्रिम शुभकामनाएं
इसी तारतम्य में संस्था के संस्थापक सदस्य मृत्युन्जय सोनी ने कहा कि श्री रयाल जी के लेखन और विचारों, व्यवहार में कोई अन्तर नहीं है और यही सच्चे साहित्यकार की पहचान है वे अपने लेखन की ही तरह सहज,सरल हैं जबकि ज्यादातर लेखकों के लेखन और व्यवहार, विचारों में जमीन आसमान का अंतर होता है श्री सोनी ने कहा कि श्री रयाल जी प्रशासनिक सेवा में उच्च पद पर आसीन होकर भी सरल,सहज साहित्य रच रहे हैं यही उनकी समाज व साहित्य के प्रति प्रतिबद्धता है
इस अवसर पर नगर की उभरती हुई चित्रकार कुमारी शीतल मरकाम द्वारा श्री रयाल जी का बनाया हुआ चित्र भेंट किया गया जिसकी प्रशंसा श्री रयाल जी ने भी की
इस अवसर पर रामकिंकर पाण्डेय, अनामिका चक्रवर्ती, वीरांगना श्रीवास्तव, इशिता सिंह, मृत्युन्जय सोनी व उमाशंकर उपस्थित रहे


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