छत्तीसगढ़पर्यटन

कालीदास का मेघदूत, यक्ष, मेघ का यात्रा मार्ग और छत्तीसगढ़ की रामगिरी

वरिष्ठ पत्रकार शंकर पांडे की कलम से...{ किश्त 143}

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छत्तीसगढ़ की रामगिरी गुफा,कवि कुलगुरु काली दास से भी सम्बंधित मानी जाती है।उनके मेघदूत का यक्ष इसी गुफा में निर्वासित था, जहाँ से उसने अपनी प्रियतमा को प्रेम सन्देश दिया था। यहां के अप्रतिम सौन्दर्य और जलकुंड का का उल्लेख कालिदास के मेघदूत में मिलता है। मेघदूत संस्कृत साहित्य की अनुपम रचना है। महाकवि काली दास का कथानक काल्पनिक है। एक वर्ष के लिये शापग्रस्त और महिमाओं से वंचित एक यक्ष, रामगिरी में रहकर आषाढ़ के घने काले मेघोँ (बादलों) को देखकर अलकानगरी में रहनेवाली अपनी प्रियतमा, पत्नी को मेघोँ के माध्यम से अपनी विरहव्यथा और कुशलता का सन्देश भेजता है। वैसे कथानक काल्पनिक है पर मेघ को जिस मार्ग से अल का नगरी जाने का निवेदन करता है, वह वास्तविक है। रामगिरी को लेकर कई चर्चा हैँ पर मेघदूत में मेघ के जिस मार्ग का उल्लेख मिलता है, उससे तो यही लगता है कि सरगुजा का रामगिरी पर्वत वह स्थान हो सकता है। मेघदूत विश्व की एकमात्र रचना है जिसमें यक्ष को काव्य का नायक बनाया गया है। यक्ष, मेघ से अनुरोध करता है कि रामगिरी से पहले मालभूमि के ऊपर से कृषि शस्यों की मधूरगंध ग्रहण करते पश्चिम की और जाकर फिर उत्तर की ओर बढेगा वहाँ उसे आम्रकूट (अमरकंटक के आम्रकुंज) मिलेगा। यहीं से यक्ष, अमरकंटक में प्रवेश करता है,यहां मित्र अतिथि के रूप में आश्रय प्राप्त करके नर्मदानदी को पार कर आगे बढ़ने को कहता है। उसके बाद मंडला जिले के वनचर बंधुओँ के कुंजों के ऊपर सहस्रधारा से नर्मदा नदी को पार करने कहता है। उसे पार करने के पश्चात् विंध्य पर्वत दिखाई देगा। जहाँ के ढाल में वर्षा काल में पर्वतों से गिरती जलधाराएं चांदी सी चमकती प्रतीत होंगी। यक्ष, मेघ को यह मनोरम दृश्य देख कर नर्मदा का जल पीकर आगे बढ़ने कहता है,यक्ष, यहां अरण्यओं में कदम्ब पुष्प,भूकंदलियों अर्जुन के विशाल वृक्ष, मृग, हथियों, मोरों के नृत्य और चातकों को देखकर नहीं रुकने का अनुरोध करता है। काली दास के मेघदूत के श्लोक क्रमांक 11 ओर 23 में मानसरोवर जाने वाले मार्ग में हंसों का उल्लेख है वह संभवत: साइबेरियन सारस होगा जो बड़ी ऊंचाई से लम्बे समय तक उड सकते हैं। कालीदास का नायक यक्ष, मेघ को विंध्याचल के उत्तरी किनारे से विदिशा मार्ग की ओर जाने का अनुरोध करता है। राह में यमुना की अनेक सहायक नदियों का भी उल्लेख किया गया है। दशाणँ नाम संभवत: घसान नदी का पूर्व नाम है। दशाणँ नदी पार करके यक्ष विदिशा पहुंचेगा, यक्ष यहीं मेघ को निम्न पार्वतीय क्षेत्र में उतरने को कहता है, वहाँ वेत्रवती (बेतवा) का जल पीकर संलग्न पहाड़ियों में विश्राम की सलाह देता है। वेत्रवती पार करने के बाद वननदी (पार्वती) का जिक्र आता है।यक्ष कहता है कि वननदी पार करने के बाद निर्विघ्या नदी (नेबूज) सिंधु नदी (काली सिंघ) को पार करके क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित उज्जैन पहुंचोगे, मेघ दूत में महाकवि कालिदास का विशेष प्रेम झलकता है। सन्देशवाहक मेघ से कहते हैं कि उज्जयनी में तुम्हें वृद्धाेँ से उड़यन वासवदत्ता की कथा सुनने को मिलेगी, सारस के कलरव, क्षिप्रा नदी की ठंडी हवा का आनंद लेकर, क्षिप्रा का जल पीकर तुम महाकाल के दर्शन कर सांध्य पूजा के अवसर पर मधुर गर्जनाकर आराधना करना। वहाँ के ऊँचे भवन, भव्य वास्तुत गवाक्ष से झाँकती स्त्रियों व नर्ताकियोँ के कटाक्ष तुम्हारा मन मोह लेंगे, वहाँ अभि सारिकाओं को अपने तड़ित प्रवाह से मार्गदर्शन देनाऔर खंडिता नायिकाओं के आंसू पोछना…। उज्जयनी और क्षिप्रा पार करने के बाद गंभीरा नदी मिलेगी जिसके संगम में देवडूंगरी पहाड़ी मिलेगी। देवगिरि की इस पहाड़ी में शिखनँदन स्कन्ध का मंदिर है जो देवताओं के सेनापति हैं। मेघ से उन पर झर-झर शीतल जल, पुष्प बारसाकर पूजा अभिषेक करने का भी आदेश देता है। फिर मेघ को चम्बल (चर्मवणति) नदी का जल पीकर रति देव कीराजधानी दशपुर (मंदसौर) पहुंचने कहता है,वहाँ रतिदेव की कीर्ति कथा सुनाई देगी। वहाँ से मेघ उत्तर की ओर मुड़ने पर पर्णाशा (बनाश) नदी को पारकर ब्रम्हावर्त जाने को कहता है। मनु के सरस्वती और द्वादुति नदी के बीच के भाग को ब्रम्हावर्त बताया गया है। सरस्वती नदी का जल पीकर कुरुक्षेत्र के ऊपर से उड़ते हुए यमुना को पारकर गंगा किनारे कनखल (हरिहार) पहुँचने कहता है। यहीं पर कौरव पांडव का महायुद्ध हुआ था। कालीदास का यक्ष, मेघ को कनखल के बाद गंगा के उदगम गौमुख, गंगौत्री की ओर प्रस्थान करने का आदेश देता है, वहाँ से पशुपतिनाथ के पद चिन्होँ की पूजा, उपहार और प्रदक्षिणा कर पुष्प अर्पित कर आगे बढ़ने की सलाह देता है। फिर गंगा का जल पीकर कौचरंध्र से होकर हिमालय पार करने कहता है। कौचरंध्र, हिमालय की नीति और माणादर्रा है। इन्हीं के निचले क्षेत्र से हिमालय पार करने कहकर यक्ष, मेघ से सीधे कैलाश पर्वत और मानसरोवर पहुंचने कहता है। कैलाश के उतूँग शिखर तुम्हारा स्वागत करेंगे और इसी पर्वत की उपत्यका में स्थित अलका नगरी के सौन्दर्य का अवलोकन करना। वैसे कैलाश पर्वत, मानसरोवर तिब्बत में है और अभी चीन के अधिकार क्षेत्र में है। इस तरह कालीदास के यक्ष ने मेघ के माध्यम से अपनी प्रिया को विरहावस्था में संदेश देने में सफल रहा। वैसे अलकानगरी एक काल्पनिक नगर है। काली दास के मेघदूत के नायक यक्ष की यात्रा छत्तीसगढ़ से ही शुरू होती है ऐसा दावा तो नहीं किया जा सकता है पर यात्रा की कल्पना यहीं से की गई है यह तो कहा ही जा सकता है….?


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