बीरेन्द्र श्रीवास्तव की कलम से ...पर्यावरण एवं पर्यटन अंक - 46 : केवई नदी तट पर....... " सिलहरा की प्राचीन गुफाओं के बोलते पत्थर"
Praveen Nishee Sun, Feb 22, 2026
सल्तनत की दास्ताने, दफ्न है इन पत्थरों में
पास जाकर तुम पुकारो, बोलने लगती है ये... आध्यात्मिक पन्नों में इतिहास की ऐसी कई कहानियां छिपी है जो हमारे आदिकाल की जानकारी देती हैं इन कहानियों पर पर सहसा विश्वास करना संभव नहीं होता लेकिन सत्यता से मुंह मोड़ा नहीं जा सकता। हिंदू ज्योतिष एवं पौराणिक ग्रंथों के अनुसार समय और कालखंड की जानकारी में त्रेता युग में भगवान राम का पृथ्वी पर आगमन हुआ था। यह वह समय था जब मनुष्य की औसत ऊंचाई लगभग 21 फीट एवं मानव की औसत उम्र 10000 वर्ष कही जाती थी। इसी प्रकार द्वापर युग में मानव की औसत आयु 1000 वर्ष एवं ऊंचाई लगभग 11 फुट हुआ करती थी जो समय के साथ घटती जाती थी। इसी गणना के अनुसार पांडव सेना के भीम को 16 हाथियों के बराबर ताकतवर माना जाता था। वर्तमान छत्तीसगढ़ भी 25 वर्ष पहले तक इसी मध्य प्रदेश का हिस्सा था। रामबन गमन मार्ग के शोधकर्ता डा. मन्नू लाल यदु के अनुसार रामायण काल में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के सोन नदी का यह क्षेत्र आदिकाल में डाडौर राज्य का हिस्सा था। इस क्षेत्र में रावण के साढ़ू असुर राज शंबरासुर का राज्य था और जिसकी राजधानी वर्तमान सामरी पाट रही है। जिसकी सीमाएं यहां से प्रारंभ होकर झारखंड तक फैली हुई थी। सोन नदी के तट पर गिरिब्रज स्थित पर असुर राज शंबरासुर से युद्ध करते हुए अयोध्या पति राजा दशरथ घायल हुए थे और उनकी सारथी कैकई उन्हें बचा कर ले गई थी। इसी तरह द्वापर युग में भी अपनी प्राकृतिक वन संपदा की खूबसूरती के लिए यह क्षेत्र हमेशा से चर्चित रहा है, यहां पांडवों ने अपने वनवास के 12 वर्ष बिताने के बाद अंतिम एक वर्ष अज्ञातवास का समय यहां के राजा विराट की सेवा में बिताए थे। पांडव भीम राज परिवार के रसोईया एवं अर्जुन नृत्य सीखाने का कार्य करते थे। हां यह वही क्षेत्र है जहां पांचाली के सम्मान की रक्षा करते हुए भीम ने कीचक का वध किया था। यहां के जंगल, पहाड़ों एवं चट्टानों में भी पांडव काल की जुड़ी गाथाओं की अलग-अलग लोक कथाएं तथा पत्थरों पर चित्रांकन दिखाई पड़ता है। ऐसी मान्यताओं की लोकोक्ति और इतिहास से सजे पत्थरों के चित्रांकन केवई नदी के तट पर बनी सिलहरा की गुफाओं में विद्यमान हैं। इन पत्थरों की गुफाओं के पास जाकर यदि आप बात करना चाहेंगे, तब यह पाषाण की मूर्तियां और उत्कीर्ण कर लिखी प्राचीन इबारतें एक एक कर अपनी कहानी स्वयं कहने लगते हैं।
राजा विराट की नगरी शहडोल (मध्य प्रदेश) से विभाजित नए जिले अनूपपुर मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित कोयलांचल क्षेत्र कोतमा के भालूमाड़ा कोयला खदान के पास सिलहरा की गुफाएं केवई नदी के तट पर अपनी अलग पहचान लिए हुए स्थित है। केवई नदी का गहरा पानी अपने हरे रंग के साथ अपनी गहराई का एहसास कराता है। रेलवे स्टेशन कोतमा से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इन गुफाओं के भीतर कलाकार की प्रतिबद्धता के साथ-साथ समय काल की गाथाएं अंकित है। यहां पत्थरों को काटकर बनाए गए अलग-अलग गुफाओं को तत्कालीन समय के अनुसार अलग-अलग कार्यों के लिए बनाया गया प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि नदी के कटाव के कारण यह पहाड़ियां निर्मित हुई होगी या पहाड़ी के बीच ढलान एवं दरार को अपना रास्ता बनाते हुए केवई नदी ने अपना रास्ता खुद तय किया होगा। पहाड़ी नदियां होने के कारण इन नदियों का बहाव अचानक काफी ऊंचा हो जाता है इसे ध्यान में रखते हुए कलाकार ने यहां की गुफाओं की ऊंचाई 05 फुट से 15 फीट तक रखी है। इसी प्रकार ऊपर से नीचे तक आने जाने के सुरक्षित सीढ़ीदार मार्ग बनाए गए हैं ताकि इन गुफाओं तक पहुंचने में तत्कालीन समय के राजाओं और निवासियों को कोई परेशानी ना हो।
विंध्याचल एवं मैकल पर्वत श्रेणियां की तराई में बनी यह कृत्रिम गुफाएं पाषाण शिल्प की वह कलाकृतियां है जो खुद अपनी कहानी अपनी जुबानी बयान करती है। अपने समय काल एवं इतिहास को समेटे तत्कालीन समय की बोली, भाषा एवं लिपि के जाने अनजाने तथ्यों को समेटे यह गुफाएं हजारों साल पुराने राजाओं और उनकी राज्य सीमाओं की मूक गवाह है। इन पत्थरों से बात करते-करते आप उनके हजारों साल के इतिहास से परिचित हो जाते हैं। यहां पहुंचते ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण जबलपुर मण्डल, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, द्वारा "सिलहरा की अभिलेख युक्त गुफाएं" का बोर्ड आपका स्वागत करता है। इस बोर्ड में इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया है ताकि शरारती तत्वों द्वारा इसे नष्ट होने से बचाया जा सके, लेकिन इसके रखरखाव या जानकारी के लिए कोई समुचित व्यवस्था यहां दिखाई नहीं पड़ती। यही पास बने शिव मंदिर के पुजारी जी से कुछ जानकारी मिलती है जो इसे पांडव कालीन गुफा कहकर इति श्री कर लेते हैं। यहां बैठे कुछ ग्रामीण जन अपनी अपनी जानकारी के अनुसार इसे पांडव कालीन गुफा और उनके अज्ञातवास में रहने का स्थान बताते हैं। यहां बैठे कुछ साधु संत पर्यटकों को तिलक चंदन लगाकर भगवान भोले शंकर का सिलहरा धाम बताते हैं। ग्रामीणों की धार्मिक आस्था को झकझोरते हूए कुछ दान धर्म का धन एकत्र कर अपने परिवार की आजीविका चलाते हैं। कुछ हद तक इन गुफाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी इनके द्वारा निभाई जाती है, देर शाम तक इनकी उपस्थिति इन स्थानों को अनैतिक कृत्यों का अड्डा बनने से रोकती हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की वेबसाइट में अनूपपुर जिले की संरक्षित स्मारकों की सूची में सिलहरा की अभिलेख युक्त गुफाओं का उल्लेख है किंतु इसका प्रचलित नाम शिव लहरा का उल्लेख नहीं मिलता। भारत सरकार के गजट अधिसूचना 1952 में इन गुफाओं को प्रथम शती का माना गया है और 09 मई 1953 के गजट में इसे ग्राम दारसागर के निकट बताया गया है जो वर्तमान में ग्राम पंचायत का मुख्यालय है। शिवलहरा एवं शिवलहरी, सिलहरा के ही अपभ्रंश शब्द हैं। समय-समय पर कई खोजी शोध पत्रों में इसकी जानकारी दी गई है लेकिन यह सब आधी अधूरी होने के कारण इन शैल गुफाओं की पूरी भावना व्यक्त करने में असमर्थ रहे है। बुजुर्गों एवं पुरखों से लेकर आज तक सामान्य ग्रामीणों के बीच मात्र पांडव गुफा के नाम से पहचान बनाने वाली यह गुफाएं अब धीरे-धीरे प्रदेश से बाहर देश-विदेश के पर्यटकों को भी आकर्षित करने में सफल रही है। पुरातत्व संरक्षण विभाग के प्रचार प्रसार से जिज्ञासु पर्यटक एवं शोधार्थियों के आगमन भी अब धीरे-धीरे पर्यटकों की संख्या में निरंतर वृद्धि कर रहे हैं। हजारों वर्षों से केवई नदी के तट पर बनी यह गुफाएं और इन गुफाओं में शिवलिंग तथा बजरंगबली की प्रतिमा आसपास के ग्रामीणों के लिए एक पुरातात्विक आस्था स्थल बनाने में सफल रही है। जो शिवरात्रि पर्व के अवसर पर आयोजित दो दिवसीय मेले में हजारों श्रद्धालुओं के जन सैलाब के रूप में दिखाई देता है। श्रद्धालुओं का अपनी अपनी आस्था के अनुसार भगवान भोले शंकर का आशीर्वाद लेना आज ग्रामीणों की दिनचर्या में शामिल हो गया है। अमरकंटक में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. हीरा सिंह गोंड ने अपनी शोध प्रबंध में कई पक्षो की गहन व्याख्या की है। प्रोफेसर आलोक श्रोत्रिय की पुस्तक *"शिव लहरा की गुफाओं का रहस्य" में यहां की शैल चित्र लिपि की व्याख्या और हिंदी रूपांतर यहां की गुफाओं के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पक्ष को गंभीरता के साथ चित्रित करने में सफल रहे हैं। जिसमें मानव निर्मित इन गुफाओं को शैव संप्रदाय का आराधना स्थल और संत महात्माओं का आश्रय स्थल बताया गया है। इसी आस्था के कारण इन्ही गुफाओं के ऊपरी भाग के पूर्व दिशा में लगभग 50 मीटर दूर एक शिव मंदिर का निर्माण कर दिया गया है। जिसे " शिव शिवा आश्रम शिवकंटक धाम शिवलहरा" का नाम दिया गया है। कहते हैं कि यहां पर एक महिला शिव भक्त, "भक्तिन बाई" कई वर्षों से एक झोपड़ी बनाकर इन्ही गुफाओं में स्थित शिवलिंग एवं देवी देवताओं का पूजा पाठ करती थी। आज भी भक्तिन बाई की कुटिया यहां अपने भग्नावशेषों सहित स्थित है जो टूट चुकी है किंतु किसी कलाकार ने उनकी मूर्ति बनाकर झूले में बिठा दी है जो उनकी शिव साधना की याद दिलाती है।
केवई नदी के तट पर पहुंचते ही बलुआ पत्थरों की चट्टाने नदी के दोनों तरफ दिखाई पड़ती है। नदी की धारा के बांई तरफ पूर्व दिशा में लगातार गुफाओं की तीन श्रृंखला दिखाई पड़ती है, जो दक्षिण से उत्तर की ओर स्थित है। यह अपनी लंबाई में लगभग 100 मीटर के हिस्से में फैली हुई है। पत्थरों की बनी इन गुफाओं को जानने के लिए तीन भागों में विभाजित करना आवश्यक होगा। प्रथम वह गुफाएं जो जमीन से 02 फुट की ऊंचाई पर छोटी गुफाएं हैं। जिसमें साधु सन्यासी के चित्रांकन किए गए हैं। इसी से आगे गुफा क्रमांक 2 है जो 30 फोटो ऊंचाई पर बनी हुई है यह गुफा काफी क्षतिग्रस्त हो चुकी है जिसका प्रवेश द्वार लगभग साढ़े पांच फुट उंचा है। यहां पहुंचने के रास्ते में चट्टानों पर पशु पक्षियों के उकेरे गए चित्र दिखाई पड़ते हैं। ब्रिटिश काल में इस गुफा को चेरी गोदड़ी गुफा का नाम दिया गया था। इस गुफा से नीचे उतरकर आगे कई छोटी-छोटी गुफाएं लगभग 05 फुट ऊंचाई पर बनी हुई है। जो यहां रहने वाले साधु संतों के बैठकर शिव उपासना एवं ध्यान करने के लिए बनाई गई प्रतीत होती है।
इन गुफाओं से आगे बढ़ने पर उत्तर दिशा में जमीन की सतह से लगभग 15 फीट की ऊंचाई पर प्रारंभ में पांच स्तंभ सहित कुल सोलह स्तंभ पर टिकी गुफाएं आपको आकर्षित करती हैं। पत्थरों को काटकर वर्तमान भवन निर्माण तकनीक बीम एवं कालम की संरचना पत्थरों को काटकर बनाई गई है। कुछ स्थानों पर यह स्तंभ क्षतिग्रस्त हो गए हैं जिनमें ऊपरी हिस्सा टूट जाने के कारण ईंट से इसे जोड़कर संवारने और ऊपरी छत को मजबूती देने का प्रयास किया गया है। ऊंचाई पर चढ़ते हुए एक स्वास्तिक का निशान बाहरी दीवार पर दिखाई पड़ता है जिसके ऊपर ब्राह्मी लिपि मैं पांच पंक्तियों उत्कीर्ण कर लिखी गई है। पाली भाषा में लिखी इन पंक्तियों का अर्थ सामिदते राज करयंतम्हि, सिवानंदि पंतिकेन, शिवदत्त नतिकेन, शिवमित पुतेन, बछेन मोगलि पुतेन, मूलदेवेन आराम च वन रोपापिता है। इसका अर्थ स्वामी दत्त के राज के दौरान शिवानंदी के परनाती, शिवदत्त के नाती एवं शिवमित के पुत्र वत्स गोत्र वाले मोगली के पुत्र मूल देव के द्वारा यह आराम बगीचा और वन का रोपण करवाया गया। शिलालेख के यह वाक्य गुफाओं को बनाने वाले राजा एवं कलाकार के सहयोग को प्रदर्शित करता है। इसके अनुसार यह गुफाएं एवं शिलालेख लगभग 2000 वर्ष पुरानी प्रतीत होती है। इन गुफाओं के भीतर अलग-अलग कई खंड में गुफाएं बनी हुई है जहां पर शिवलिंग, हनुमान जी एवं देवियों की मूर्तियां उकेरी गई है। देवी प्रतिमा के संबंध में यह जानकारी मिलती है कि यह मूर्तियां 11वीं सती की है जिनमें से कुछ मूर्तियां टूट चुकी है। बाहर की पूर्वी दीवारों पर यश जैसे विशाल आकृतियां उकेरी गई है। अंदर की गुफाओं में ढाई फीट चौड़े एवं लगभग 8 फुट लंबे पत्थर की संरचना बनाई गई है, जो संभवत विश्राम के लिए उपयोग किए जाते थे। अलग-अलग शोध प्रबंध में बड़ी गुफा को दुर्वासा गुफा, तथा देवी मंदिरों की गुफाओ सीतामढ़ी गुफा का नाम दिया गया है।अलग-अलग स्थान पर प्राप्त शैल चित्र ब्राह्मी लिपि के साथ कई स्थानों पर शंख लिपि में भी उत्कीर्ण किए गए हैं। ब्राह्मी लिपि पढ़ी जा सकती है किंतु शंख लिपि अब तक किसी भी विद्वान द्वारा पढ़ी नहीं जा सकी है इसलिए पत्थरों पर उत्कीर्ण शंख लिपि के बारे में कोई प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
समय काल और राजाओं के आधिपत्य में फलने फूलने वाले इस तरह के कलाकार और उनकी कलाकृतियां तथा गुफाएं पत्थरों पर उकेरकर लिखे गए पंक्तियों से ही जानी जा सकती हैं। यदि हम इसे महसूस करें तब हम यह कह सकते हैं कि कलाकार द्वारा उकेरी गई पंक्तियां इन पत्थरों की वह आवाज है जो हमें बोलकर कुछ बताना चाहती है।
आसपास के जंगल कट जाने के कारण अब यहां नदी पहाड़ उदास दिखाई देते हैं। इन सबके बीच श्रद्धालुओं द्वारा लगाए गए आम और पीपल के वृक्ष कुछ उम्मीद जगाते हैं। हजारों वर्षों की इन गुफाओं के आसपास पेड़ों की जड़े घुसकर लगातार इन्हें तोड़ने का प्रयास कर रही है। अनैतिक मानवीय गतिविधियां भी इन गुफाओं के वास्तविक स्वरूप को नष्ट कर रहे हैं। हजारों वर्षों की ऐतिहासिक इन गुफाओं के संरक्षण पर यदि ध्यान नहीं दिया गया तब आगे आने वाली पीढ़ियां यहां के विध्वंस अवशेषों को दिखाकर केवल यह कह सकेंगी कि यहां कभी हजारों वर्ष पुरानी सिलहरा की गुफाएं हुआ करती थी। आसपास क्षेत्र में जिला प्रशासन से अनुमति लेकर ग्राम पंचायत दारसागर भी एक सुंदर बगीचे का निर्माण और संरक्षण की दिशा में कुछ कार्य कर सकती है जो आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करने और कुछ देर ठहरकर प्राकृतिक जल के बहाव तथा ठंडी बयार का आनंद लेने की सुविधा दे सकेगे। राष्ट्रीय स्तर की धरोहरों के संरक्षण की दिशा में जिला प्रशासन की अनदेखी पर्यटकों के साथ साथ पर्यावरण और जैव विविधता चिंतकों को निराश कर रही है।
16 (सोलह) स्तंभों पर बनी सिलहरा की गुफाएं अपने निर्माण के समय काल को अभिव्यक्त करने के लिए तात्कालिक शंख लिपि तथा ब्राम्ही लिपि में लिखी पाली भाषा में कुछ कहने का प्रयास कर रही है। जिसमें से ब्राह्मी लिपि को पढ़कर वैज्ञानिक इसे 2000 साल प्राचीन निर्माण बताते हैं, लेकिन शंख लिपि अभी तक किसी विद्वान के द्वारा नहीं पढ़ी जा सकी है इसलिए शंख लिपि में लिखी भावनाओं की अभिव्यक्ति संभव नहीं है। कलाकार द्वारा गुफाओं को स्थायित्व देने हेतु पत्थरों में कालम एवं बीम का सहारा देने की तकनीक भी इतने पुराने समय के निर्माण कला तकनीक की जानकारी देती है। नदी के सुरम्य तट पर हरे रंग के जल का बहाव जहां नदी की गहराई बताती है वही ऐसे मनोहारी दृश्य उत्पन्न करता है जहां कुछ देर परिवार एवं मित्रों सहित नदी की रेत पर बैठकर जल बहाव और बोलती चट्टानों की भाषा को समझने का प्रयास किया जाए। ऐसे अवसर जीवन में कम ही आते हैं जब हम प्रकृति और मूक चट्टानों से बातें करते हैं। नर्मदा उद्गम स्थल मैकल की पहाड़ियों तथा सतपुड़ा के साल वनों की श्रृंखला का यह हिस्सा आपके नर्मदा उद्गम पर्यटन को और खूबसूरत बना देगा। यदि आप गुफाओं जंगलों और प्राचीन भाषाओं के संबंध में जानने की जिज्ञासा रखते हैं तब निश्चित मानिए 2000 वर्ष पुरानी लिपि भाषा और पत्थरों पर समय और इतिहास की बोलती जानकारी, यहां मौजूद है। आपकी जिज्ञासा का समाधान लेकर सिलहरा की गुफाओं का यह पर्यटन स्थल और केवई का किनारा आपके आगमन का इंतजार कर रहा हैं।
बस इतना ही
फिर मिलेंगे किसी अगले पड़ाव पर.....
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