: लिटिल मिलेनियम व अलास्का पब्लिक स्कूल में मनाया गया दिवाली का त्यौहार
Sun, Oct 27, 2024
मनेन्द्रगढ़।एमसीबी। लिटिल मिलेनियम व अलास्का पब्लिक स्कूल में नन्हे मुन्ने बच्चों के साथ धूमधाम से मनाया गया दिवाली का त्यौहार। उत्सव की शुरुवात स्कूल की शिक्षिकाओं द्वारा माता लक्ष्मी और गणेश भगवान की पूजा अर्चना के साथ की। इसके पश्चात स्कूल के संचालक मो. फिरोज ने बच्चों को दिवाली त्योहार का महत्व समझाया। दिवाली को दीपों का त्योहार कहा जाता है। यह अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। दिवाली पर घरों को सजाया जाता हैं। दिवाली पर नए कपड़े पहने जाते हैं और मिठाई-उपहारों का आदान-प्रदान किया जाता हैl दिवाली पर परिवार एक साथ आते हैं और खुशियां बांटते हैं।दीपावली के खास मौके में स्कूल द्वारा बच्चों के लिए दिवाली से रिलेटेड विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। सभी प्रतियोगिताएं क्लास के अनुसार कराई गई। कक्षा प्ले ग्रुप और कक्षा नर्सरी के बच्चों के लिए ड्राइंग प्रतियोगिता कराई गई, कक्षा केजी1 और केजी2 के बच्चों के लिए पेपर क्राफ्ट क्रिएटिविटी प्रतियोगिता कराई गई, जिसमें छोटे-छोटे बच्चों द्वारा पेपर से दीये, पटाखे, लालटेन इत्यादि बनाए गए, प्राइमरी कक्षा के बच्चों द्वारा क्ले मॉडलिंग की गई जिसमें बच्चों ने गणेश जी की आकृति, लड्डू, पटाखे, फूल इत्यादि चीज बनाएं। इसके साथ-साथ बच्चों के लिए रंगोली बनाओ और थाली सजावट प्रतियोगिता भी कराई गई।दिवाली प्रतियोगिताओं के विजेताओं को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। जिसमें कक्षा प्ले ग्रुप की विजेता नियति जैन, उपविजेता रियांश गजवानी, कक्षा नर्सरी की विजेता मायरा, उप विजेता प्रनिका पांडे, कक्षा केजी1 के विजेता लक्ष्य गुप्ता, उपविजेता गुरवानी कौर, कक्षा केजी2 की विजेता अनाया दुआ, उपविजेता भव्या शर्मा, कक्षा -1 की विजेता आशिका रजक (रंगोली) शिवम कुमार (दिया व थाली सजावट), उपविजेता शिवांश कुमार चक्रधारी, कक्षा 2 के विजेता समर्थ दुआ (क्ले मॉडलिंग) रहे।स्कूल प्रबंधन के द्वारा सभी बच्चों के लिए फुलझड़ी, अनार, चक्री, रस्सी, पॉप-पॉप पटाखे का इंतजाम किया गया था। सभी बच्चों ने फुलझड़ी व अन्य पटाखे जलाकर खूब मस्ती की और दिवाली का त्यौहार अपने दोस्त एवं शिक्षक- शिक्षिकाओं के साथ हर्ष उल्लास के साथ मनाया। अंत में सभी बच्चों को मिठाई खिलाकर उनका मुंह मीठा कराया गया।यह दिवाली का त्यौहार स्कूल के संचालक मो. फिरोज की देखरेख व उनकी सहायक टीम एलियस् खान, शहाबुद्दीन अंसारी, स्मृती गुप्ता, निशी विश्वकर्मा, नेहा यादव, शबनम अंसारी, तेजस्वानी नामदेव, तसलीम मंसूरी, जरीन खान, गीता कुशवाहा, अनामिका आईन्द, खुशी गुप्ता और सहकर्मी उमा तिवारी, शांति जायसवाल, सुशीला के सफल प्रयास से सम्पन्न हुआ।
: आखिर हाथी जाए कहां ...................?
Sun, Oct 27, 2024
ढेर सारे प्रश्नों के बीच हमें और शासन तथा प्रशासनिक व्यवस्था को सोचना होगा कि हाथी भी हमारी इसी प्रकृति का हिस्सा है. उनके मार्ग में अवरोध बनकर नहीं सहायक बनकर आगे बढ़ना होगा अन्यथा यह प्रश्न यथावत जिंदा रहेगा कि "आखिर हाथी जाए कहां" जब हमने उनके घर और उनके रास्ते सब छीन लिए हैं ।भगवान शिव और गौरी पुत्र गणेश की कहानी ज्यादातर धार्मिक पुराणों के माध्यम से, बुजुर्गों के मुख से किस्से कहानी में या संतों के प्रवचन के माध्यम से आपने जरूर सुना होगा. धार्मिक ऐतिहासिक पक्ष शिव भक्त गजासुर का वरदान पूरा करने के लिए गौरी पुत्र गणेश का सिर त्रिशूल से काटने के बाद गजासूर को दिए गए वचन को पूरा करने के लिए हाथी का सिर जोड़ दिया था, लेकिन हाथी का सिर जोड़ने का दूसरा पक्ष यह भी है कि हाथी शाकाहारी जीव होते हुए सबसे ज्यादा बुद्धिमान प्राणी है जो समय के अनुसार अपने वंश एवं जीवन को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करता है स्पर्श, दृष्टि, गंध, और ध्वनि के माध्यम से संवाद करने वाला यह प्राणी लंबी दूरी तक इंफ्रासाऊंड और भूकंप संचार का प्रयोग करते हैं. और दूर खड़े हाथियों के दल को अपने पास बुला लेते हैं. जो इसके मस्तिष्क की विशिष्ट मेघा को प्रदर्शित करता है. हाथी के बुद्धि पर ज्यादा शोध नहीं हुआ है लेकिन हाथियों का दल जिस मार्ग से गुजरता है उसे वर्षों तक नहीं भूलते और इसी मार्ग से आने वाली उनकी पीढ़ियों का दल भी अनुसरण करते हुए आवागमन करता है.मानव संस्कृति में हाथी को धर्म साहित्य एवं सांस्कृतिक पन्नों में प्रतिष्ठित दर्जा दिया गया है. यही कारण है कि हमारी संस्कृत में हाथी को अलग-अलग रूपों में चित्रित किया गया है. हाथी पुरातन काल से ही राजाओं की शान कहे जाते रहे हैं, लेकिन आज हाथियों के सामने जीवन का संकट खड़ा हो गया है. अपनी आगामी पीढ़ी और वंश को बचाने का खतरा भी उनके सामने स्पष्ट दिखाई दे रहा है, यही कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ (I UCN) द्वारा एशियाई हाथियों को लुप्तप्रायः प्रजातियों की सूची में सूचीबद्ध कर दिया गया है. प्रश्न उठता है कि क्या इसके वंश की समाप्ति के दोषी हम बनने के लिए तैयार हैं. मानव जाति की शान और सम्मान बनने वाले हाथी आज लुप्तप्रायः प्रजाति की परिधि में खड़े हैं और हम मूक दर्शक बनकर उनके वंश को बचाने के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं."जियो और जीने दो" और सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया के सिद्धांत का पालन करने वाला यह हमारा भारत देश जहां हाथियों की पूजा कर युद्ध में उतरता था. विजय श्री की कामनाएं की जाती थी, वही हाथी आज मानव के विरोध में तोड़फोड़ एवं फसलों को नष्ट करने पर उतारू है. प्राकृतिक से जीवन प्राप्त करने वाला और प्रकृति की पूजा करने वाला हमारा आदिवासी समाज आज हाथी के आतंक से प्रभावित हो रहा है. हालकि शासन प्रशासन द्वारा भी हाथियों को बचाने के लिए प्रयास किये जा रहे हैं हाथियों की प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष हत्या पर कठोर दंड का प्रावधान किया गया है. वहीं हाथियों के आक्रमण से प्रभावित आदिवासियों को मुआवजा देने के नियम बनाए गए हैं, लेकिन हमारी शासन प्रशासन व्यवस्था इस बात की चिंता नहीं कर पा रहा है कि हाथियों के शरण स्थली एवं उनके आवागमन के मार्ग को प्रभावित नहीं किया जाए. उनके रास्ते खुले रखे जाएं.हाथियों के उत्पात की बातें आजकल आम बात हो गई है. अभी ताजा समाचारों में गरियाबंद के जंगल मार्ग में हाथियों के उत्पादन से सैकड़ो एकड़ फसल बर्बाद हो गई है तथा लगभग 15 से ज्यादा गांव के निवासी दहशत में जी रहे हैं. कई स्थानों पर सुरक्षा की दृष्टि से ग्रामीण परिजन मकान के छत पर झोपड़ी बनाकर बच्चों को सुरक्षित बचाने की कोशिश कर रहे हैं. यह चिंतनीय मुद्दे हैं. इसी बीच की एक घटना यह भी चर्चा मे आई है कि रायगढ़ के पास जंगलों में बिजली करंट लगने से तीन हाथियों की मौत हो गई है. पर्यावरणीय प्रभाव की बदलती स्थितियों में स्वयं को बदल लेने वाला हाथी की औसत उम्र 50 से 70 वर्ष तक जिंदा रहता है मानव की औसत उम्र भी हाथियों के लगभग बराबर है. यह अलग प्रश्न है कि मानव हाथियों को प्रकृति द्वारा दिए गए 70 वर्षों का जीवन काल उसे जीने देगा या नहीं.हाथी अपने स्थलों में स्वतंत्र विचरण करने वाले प्राणी है उन्हें कोई बाधा ना पहुंचाएं, तब वह मानव के विरुद्ध कोई उत्पात नहीं करेंगे. इसके लिए जरूरी है कि हाथियों की विचरण मार्ग के आवागमन रास्ते को हम अपने विकास की अंधी दौड़ के लिए ना रोकें. विकास के पैमाओं को आर्थिक समृद्धि से ना तौला जाए. बल्कि प्रकृति में पैदा होने वाले सभी जीव जंतुओं एवं वन की जैव विविधता का संरक्षण और सुख समृद्धि भी हमारी संयुक्त जिम्मेदारी है. यह हमारी सोच में शामिल होना चाहिए. यूरोपीय विकास को ही वास्तविक विकास का पैमाना मानना भारत जैसे देश के लिए उचित नहीं है.ज्यादातर हाथी पानी के स्थलों के आसपास पाए जाते हैं और अपने स्वभाव के कारण पानी की उपलब्धता समाप्त होने पर यह अपना स्थान बदलकर पानी के दूसरे स्थान पर चले जाते हैं. हसदो अरण्य जंगलों के कटाव की चर्चा एक दशक से सुर्खियों में है. आश्चर्य हमें तब होता है जब अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सामने हम प्रकृति को बचाकर चलने एवं पृथ्वी को बचाने का संकल्प लेकर हम विश्व के सामने वाहवाही प्राप्त करते हैं लेकिन इसका क्रियान्वयन नहीं कर पाते.संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में 1972 से लगातार पचास वर्षों से प्रकृति एवं जैव विविधता को बचाने की कोशिश इसलिए कर रहे हैं हमारे राष्ट्रीय प्रतिनिधी इस सत्यता को स्वीकार कर चुके हैं कि -
"पृथ्वी है तब मानव है"
इस सत्यता को स्वीकार करके ही हमारे प्रतिनिधि पर्यावरण एवं जैव विविधता के संरक्षण की चर्चा करते हैं. और इसे बचाने का संकल्प भी लेते हैं. लेकिन एशियाई क्षेत्र अपने छत्तीसगढ़ से जुड़े जैव विविधता के लिए चर्चित हसदो अरण्य के जंगलों को काटने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ( NGT) के द्वारा लिए गए निर्णय में जैव विविधता को बचाने के लिए उत्खनन पर लगाए गए रोक जैसे निर्णय अपने अनुसार उलट फेर कर बदल लिए जाते हैं. आर्थिक विकास को धुरी मानकर आज ही हम प।थ्वु से सब कुछ ले लेना चाहते हैं. हम इसकी परवाह बिल्कुल नहीं करते कि इसी प्रकृति के वन एवं वन्य जीव के अस्तित्व का एक हिस्सा यह हाथी भी है. जिसका मुख्य विचरण का गलियारा हसदो अरण्य और हस्तदो नदी के बीच से गुजरता है. जिसकी परवाह नही करते हुए कोयला उत्खनन के लिए वन एवं वन्य प्राणियों की बलि दी जा रही है. विकास का यह चक्र हमें किस दिशा में ले जाएगा इस पर एक जागरूक नागरिक की तरह विचार करना हम सबका कर्तव्य है. विचार वह बीज है जो अंकुरित होकर समाधान का मार्ग तय करता है. विचारशील व्यक्ति एक देश के स्वस्थ नागरिक की पहचान है और स्वस्थ एवं संपन्न वैचारिक देश का आधार स्तंभ भी विचारशील व्यक्ति ही होता है. इसलिए शासन प्रशासन के साथ हमें भी विचार करना होगा. क्योंकि शासन प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार हमें है और हम ही इसका निर्माण करते हैं.
ढेर सारे प्रश्नों के बीच हमें और शासन तथा प्रशासन को यह भी सोचना होगा कि हाथी भी हमारी इसी प्रकृति का हिस्सा है. अतः उनके मार्ग के अवरोध बनकर नहीं सहायक बनकर हम आगे बढ़े। अन्यथा यह प्रश्न यथावत इसी स्थिति में जिंदा रहेगा कि आखिर हाथी जाए कहां. जब हमने उनके घर और उनके सब रास्ते छीन लिए हैं तब उनके पास सिवाय बगावत करने के और कौन सा रास्ता खाली बचा है.
बस इतना ही
फिर मिलेंगे किसी अन्य चिंतन पर.....
: आरंग का भांड देवल जैन मंदिर अति प्राचीन...
Sun, Oct 27, 2024
भांड देवल मंदिर, ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध का एक जैन मंदिर है,आरंग (राय पुर)के महाकोशल क्षेत्र में है। इसे वास्तुकला भूमिजा शैली में बनाया गया है। इस मंदिर के चबूतरे पर विस्तृत अलंकरण है। एक चबूतरा है जो एक कुर्सी को सहारा देता है, दीवार पर मूर्तियों की दो पंक्तियाँ हैं। मंदिर का 'ले आउट प्लान' एक स्टार आकार में है जिसे स्टेलेट (जिसका अर्थ -एक तारे के आकार का, जिसमें बिंदु या केंद्र से निकलने वाली किरणें हैं)के रूप में जाना जाता है, जिसमें छह "ऑफसेट" हैं।मंदिर पाँच मंजिलाँ ऊँचा हैअसामान्य विशेषता माना जाता है। मंदिर पश्चिम की ओर है और जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। अतीत में, मंडप (एक बाहरी मंडप),एक बरामदा संभवतः मंदिर के हिस्से के रूप में मौजूद था। मंदिर में गर्भगृह या गर्भगृह में जैन तीर्थंकरों की 3 स्वतंत्र रूप से खड़ी बड़ी छवियाँ हैं। इन्हें काले पत्थर में अलंकृत रूप से उकेरा गया है,अत्यधिक पॉलिश किया गया है।तीर्थंकरों में अजित नाथ , नेमिनाथ,श्रेयासन नाथ हैं। केंद्रीय आकृति को बाएं हाथ में दो हिरणों को पकड़े एक चक्र के प्रतीक से सजाया गया है, दाहिने हाथ पर एक ग्लोब है। इस छवि के आधार पर "पंख वाली आकृति" नक्काशी है। नक्काशीदार छवियां मंदिर के बाहरी चेहरों को भी सुशोभित करती हैं।रायपुर-महासमुंद की सीमा में स्थित आरंग जैन धर्म के अनुयायियों का प्रमुख स्थल है।जैन प्रतिमाओं के अलावा गुप्तकालीन मुद्राएं,राजर्षि तुल्य कुलवंश, शरभपुरीय, कलचुरी शासकों केअनेक अभिलेख मिले हैं।आरंग का भांड देवल मंदिर छत्तीसगढ़ में जैन धर्म का सबसे प्रमुख मंदिर माना जाता है।रायपुर महासमुंद रोड पर 36किमी दूरी पर स्थित आरंग महत्व पूर्ण ऐतिहासिक स्थल है।आरंग महाभारत काल के राजा मोरध्वज की नगरी मानी गई है।आरंग में एक समय जैनधर्म का महत्वपूर्ण केंद्र भी था।यहां11वीं सदी का प्राचीन मंदिर स्थित है,जैन धर्म को समर्पित है। यह मंदिर भांड देवल के नाम से लोकप्रिय है। भांड देवल मंदिर एक ऊंची जगती पर बना है, पश्चिमाभि मुखी है, मंदिर ताराकृती में पंचरथ और भूमिज शैली में बना हुआ है।गर्भगृह में तीन तीर्थंकर की सुन्दर, चमकदार कायोत्सर्ग मुद्रा वाली प्रतिमाएँ अधिष्ठित हैं। पश्चि ममुखी मंदिर ऊँची जगती पर निर्मित है,आधार विन्यास में पंच रथाकार है। नागर शैली में निर्मित इस मंदिर के मंडप और मुख मंडल का आधार से ऊपर का भाग विनिष्ट हो चुका है। मंदिर की बाह्य भित्ति अधिष्ठित से लेकर अमालक तक उरु श्रँगों और कुलिकाओं से अलंकृत हैं। जैन तीर्थंकार यक्ष- यक्षिणी और देव प्रतिमाओं तो हैं, इसके अतिरिक्त भी आलिंगनरत मिथुन मूर्तियाँ का भी उत्कीर्णन किया गया है। अधिष्ठा नभाग की सज्जा 5 पट्टीका ओं,हँसवाली नृत्य-संगीत के दृश्य,कीर्तिमुख,ज्यामिति अभिप्राय के अँकनों से युक्त है। कला की दृष्टि से हैहयवंशीय शासकों द्वारा निर्मित माना जाता है।