: वृद्धाश्रम सुरजपुर में रह रहे वृद्ध को सकुशल घर पहुंचाया गया
Tue, Nov 7, 2023
सुरजपुर। वृद्धाश्रम सुरजपुर में रह रहे वृद्ध को सकुशल घर पहुंचाया गया,एक वृद्ध जो जिला जांजगीर चांपा का भटकते हूए छत्तीसगढ़ शबरी सेवा संस्थान लखनपुर जिला सरगुजा छग द्वारा संचालित वृद्धाश्रम स्नेह संबंल वृद्धाश्रम तिलसिवा सुरजपुर में आ गया था । जिसका नाम -सुफल दास पिता तुला दास उम्र लगभग 75 वर्ष ग्राम झररा जिला जांजगीर चांपा छग के निवासी था । जानकारी मिलते सुरेन्द्र साहू प्रदेश सचिव छत्तीसगढ़ शबरी सेवा संस्थान द्वारा सोशल मीडिया में यह समाचार प्रसारित किया गया। सोसल मीडिया के द्वारा उनके परिवार को सुचना मिली कि उनके रिश्तेदार जिला प्रशासन सुरजपुर द्वारा संचालित वृद्धाश्रम में है निवासरत है। परिवार जनो द्वारा वृद्धाश्रम के संचालक सुरेन्द्र साहू के मोबाइल से सम्पर्क कर दो तीन दिन में आकर ले जाने कि बात कही। और अच्छे से देखभाल करने को कहा। वृद्धाश्रम के सभी कर्मचारी जिसमें प्रमुख रूप से पायल गुप्ता, अमृता राजवाड़े, सुनीता, फुलबसिया राजवाड़े द्वारा अच्छे से देखभाल किया गया।और चार दिन बाद उनके परिवार के सदस्य द्वारा अपने घर जांजगीर चांपा सकुशल ले जाया गया। परिवार जनों द्वारा वहा के सरपंच से भी वृद्धाश्रम के कर्मचारियों से बात कराया गया। इस दौरान वृद्धाश्रम के संचालक सुरेन्द्र साहू ने बताया कि सुरजपुर के कलेक्टर रजत बंसल, जिला मुख्य कार्यपालन अधिकारी लीना कोसम, उपसंचालक समाज कल्याण सुरजपुर के बीच तिर्की के मार्गदर्शन में जिला सुरजपुर में स्नेह संबंल वृद्धाश्रम का संचालन किया जा रहा है। इस दौरान वृद्ध के घर का पता लगाने में वृद्धाश्रम के संचालक सुरेन्द्र साहू, अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला जांजगीर चांपा के अभिमन्यु साहू सहित वहां के सरपंच, सचिव और रोजगार सहायक का सराहनीय योगदान रहा। वृद्धाश्रम के संचालक सुरेन्द्र साहू ने सभी जन प्रतिनिधियों से अपिल किया है कि अगर कहीं भी कोई भी वृद्ध जिसकी उम्र 60 वर्ष से अधिक है और जिसका देखरेख करने वाले कोई नहीं वृद्धाश्रम में पहुंचा सकते हैं या छत्तीसगढ़ शबरी सेवा संस्थान में फ़ोन करके सुचना प्रदान कर सकते हैं। जिससे कि उनकी देखभाल अच्छे से किया जा सके।
: पटाखे की दुकानों को लेकर वहां बसे लोगों में डर व भय का माहौल
Tue, Nov 7, 2023
https://youtube.com/shorts/sMs0dhTPGsI?si=8U8yi5nOfZGLPfZOमनेन्द्रगढ़।एमसीबी। प्रति वर्ष की तरह इस वर्ष भी दीपावली का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाएगा।
मनेन्द्रगढ़ शहर में हर वर्ष पटाखो की दुकान हाई स्कूल ग्राउंड में लगाया जाता आ रहा है। लेकिन इस वर्ष पटाखो की लगभग 24 दुकाने शहर के बीचो-बीच सर्कस ग्राउंड पर लगेगी, जिसकी अनुमति sdm मनेन्द्रगढ़ से ली जा चुकी है। पटाखे की दुकानों को लेकर वहां बसे लोगों में डर व भय का माहौल बना हुआ है। बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि आखिर नियमों को ताख पर रखकर किस तरह से पटाखो के दुकान लगने की अनुमति दी जा सकती है?[video width="848" height="480" mp4="https://ghoomatadarpan.com/storage/2023/11/VID-20231107-WA0295.mp4"][/video]अगर उस स्थान पर कोई बड़ा हादसा होता है तो उस हादसे की जिम्मेदारी किसकी तय होगी? सुरक्षा को लेकर किस तरह के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं? क्या जिला प्रशासन आम नागरिक की जान के साथ नहीं खेल रहा है? क्या पुलिस विभाग और नगर पालिका से अनापत्ति ली गई है?
आखिर प्रशासन जगा और सर्कस ग्राउंड में लगने पटाखो की दुकान
अनुविभागीय अधिकारी के द्वारा नहीं दिया गया किसी तरह का कोई अनुमति ऐसा पत्र में अनुविभागीय अधिकारी राजस्व के द्वारा जानकारी दी गई है।
: नक्सली हमला:झीरम का सच क्या सामने आ पायेगा....?
Tue, Nov 7, 2023
बस्तर के झीरमघाटी की घटना नक्सली वारदात थी या यह कोई राजनीति साजिश थी....? इसका खुलासा छ्ग के आम जन,पीड़ित परिवार के सदस्य चाहते हैँ पर क्या यह हो पाएगा...!
25 मई 2013 को बस्तर के सुकमा से कांग्रेस नेता राज्य में सत्ता परिवर्तन यात्रा का शंखनाद करने निकले और सवा सात बजे सुकमा से जगदलपुर मार्ग में दरभा घाटी में नक्सलियों के नरसंहार में 2 दर्जन कांग्रेस के बड़े-छोटे नेता,सुरक्षा कर्मी शहीद हो गये।इस परिवर्तन यात्रा में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाये गये पर अभी भी दोषी कौन है यह अतीत के गर्त में है...?हाँ उस समय वहाँ पदस्थ अफसर तो अभी भी बड़े- बड़े पदों पर हैँ ? उनकी लगातार पदोन्नति भी होती जा रही है....? दिवंगत लोगों के परिवारजनों के लिए तो यह त्रासदी सालती ही रहेगी कि झीरम घाटी हमले को 10 साल पूरे हो चुके हैं पर,अभी भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं सहित अन्य लोगों की मौत के मामले में कई खुलासे बाकी हैं..? देश की सबसे बड़ी संस्था एनआईए की तीन साल जांच चली पर घटना से बचकर लौटे लोगों से भी पूछताछ की जरूरत नहीं समझी...! जस्टिस प्रशांत मिश्रा की अध्यक्षता 2013 में घटना के बाद ही गठित जांच आयोग की जांच चलती रही...कॉंग्रेस की सरकार बनने के बाद आयोग ने और समय माँगा था वहीं इस पर निर्णय के पहले ही आनन-फानन में सचिव द्वारा राज्यपाल को अपनी रिपोर्ट सौंप दी गई..भूपेश सरकार ने कुछ और बिंदु जोड़कर दो सदस्यीय आयोग बनाया और उसी के बाद तब के नेता प्रतिपक्ष तथा भाजपा नेता धरम लाल कौशिक उसकी वैधानिकता को लेकर हाईकोर्ट पहुंच गये....।खैर तब विपक्ष में होने पर कांग्रेस ने तो आयोग के सामने तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे,तत्कालीन सीएम डॉ. रमन सिंह तथा तत्कालीन गृह मंत्री ननकीराम कंवर को गवाही के लिए बुलाने आयोग को आवेदन भी दिया,कांग्रेस का तर्क था कि बाबरी मस्जिद तथा इंदिरा की मृत्यु के बाद सिक्ख दंगों के मामले में तत्कालीन मंत्रियों सहित राज्यपाल की गवाही हो चुकी है तो झीरम जैसे बड़े नक्सली हमले में आयोग ने महत्वपूर्ण लोगों को गवाही के लिए क्यों नहीं बुलाया....? एनआईए की जांच चली,इस एजेन्सी ने जिन्हें आरोपी बनाया उनमें से कई अभी भी कानून के शिकंजे के बाहर हैं।बाद में विधानसभा में कार्यवाहक गृहमंत्री अजय चंद्राकर ने इस मामले में सीबीआई जांच की घोषणा की थी पर भिलाई में पदस्थ सीबीआई के प्रभारी डीएसपी ने एनआईए जांच के बाद सीबीआई जांच की जरूरत नहीं बताई और जांच नहीं हुई.... सवाल उठता है कि बड़ा या छ्ग मंत्रिमंडल?बहरहाल कई सवालों का जवाब अभी भी नहीं आया... महेन्द्र कर्मा तो नक्सलियों के निशाने में थे पर नंदकुमार पटेल और उनके बेटे की नक्सलियों ने घटनास्थल से दूर ले जाकर क्यों हत्या कर दी.. नक्सली उनसे क्या बात करना चाहते थे....? विद्याचरण शुक्ल,उदय मुदलियार को तो क्रॉस फायरिंग में गोली लग गई पर कांग्रेस का एक विधायक वहां से एक मोटर सायकल से कैसे निकलने में सफल रहा...? हमलावर नक्सलियों में युवतियों की संख्या अधिक थी वे क्रूरता से हत्या कर रही थीं ..?गोलियां मारने के बाद चाकूओं से भी हमला किया गया....आखिर महेन्द्र कर्मा को छोड़कर बाकी कांग्रेसियों से उनकी क्या दुश्मनी थी..?नक्सली तो कई कांग्रेसी नेताओं को पहचानते भी नहीं थे,हमले के बाद किसी देवा नाम के नक्सली नेता से लगातार सेटेलाइट फोन पर निर्देश ले रहे थे ये देवा कौन है...? किस रमन्ना नामक नक्सली नेता ने सभी की हत्या के निर्देश दिये बाद में बचे लोगों को छोड़ दिया गया....। पीड़ित पक्ष 10साल पूरे होने पर भी घटना से परदा नहीं उठने पर कहते हैँ कि हमने अपने परिवार के मुखिया को खो दिया है क्या हमे झीरम घाटी की सच्चाई जानने का हक भी नहीं है? सरकार 10साल में किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंची है...।