वरिष्ठ पत्रकार शंकर पांडे की कलम से..*(कॉलम 21 सालों से लगातार ) : सियासत हो या फिर शतरंज, दोनों का नियम है.... 'बली' प्यादों की चढ़ती है वजीरों को बचाने में....
Praveen Nishee Sat, May 2, 2026


छत्तीसगढ़ राज्य बने 25 साल पूरे हो चुके हैं इस दौरान 12 भाजपा विधायकों का दलबदल,अजीत जोगी के लिये भाजपा विधायक द्वारा इस्तीफा, हाल फिलहाल आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य (छ्ग मुंगेली जिला निवासी) डॉ संदीप पाठक का भाजपा प्रवेश तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ला का कांग्रेस छोड़ एनसीपी में जाने की चर्चा जरुरी है।2000 में मप्र से अलग होकर छत्तीस गढ़ राज्य का निर्माण हुआ और पहले सीएम बने आईपी एस,आईएएस अजीत प्रमोद कुमार जोगी।जोगी उस समय विधायक नहीं थे,उन्हें 6माह के भीतर विधायक बनने की बाध्यता थी, उन्होंने भाजपा के मरवाही के विधायक राम दयाल उइके से इस्तीफा दिला अपने लिये सीट रिक्त करवा ली, रामदयाल उइके कांग्रेस में शामिल हो गये। यह राज्य बनने के बाद पहला दलबदल था। उसके बाद अजीत जोगी ने ही भाजपा के 12 विधायकों का दलबदल कराकर कॉंग्रेस में शामिल करा लिया जिसमें तरुण प्रसाद चटर्जी, गंगूराम बघेल, डॉ शक्राजीत नायक, परेश बागबाहरा आदि शामिल थे,हालांकि इस दलबदल की जरुरत नहीं थी पऱ जोगी ने यह दूसरा दलबदल कराया था। जोगी के सीएम बनने तथा स्वयं की उपेक्षा के चलते कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्या चरण शुक्ला ने दलबदल कर एनसीपी (राष्ट्रवादी कॉंग्रेस पार्टी ) की सदस्यता लेकर छ्ग का पहला विस चुनाव भी लड़वाया,उनका हालांकि एक विधायक जीता पऱ भाजपा की सरकार बनाने में उन्होंने एक तरह से मदद ही की।इसे तीसरा दलबदल कह सकते हैं,हाल में छ्ग के मूल निवासी पंजाब से आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य डॉ संदीप पाठक दलबदल कर भाजपा में शामिल हो गये हैं।संदीप पाठक छग के मुंगेली जिले के रहने वाले हैं और वर्तमान में भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण नाम बन गए हैं। वे अप्रैल 2022 से पंजाब से राज्यसभा सांसद हैं। 24 अप्रैल 2026 को डॉ. संदीप पाठक ने आम आदमी पार्टी से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है।वे आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव और प्रमुख रणनीतिकार थे।उनके साथ राघव चड्ढा सहित के 7 राज्यसभा सांसदों नेएक साथ पाला बदला है। सांसदों ने दावा किया कि राज्यसभा में पार्टी की दो-तिहाई संख्या के साथ भाजपा में विलय किया है, ताकि दलबदल के कानून से बचा जा सके। डॉ. पाठक का भाजपा में जाना छत्तीसगढ़ की राजनीति के लिहाज से भी चर्चा का विषय है, क्योंकि उन्हें छ्ग में 'आप' का भविष्य माना जा रहा था। उनके पिता छग में भाजपा से जुड़े रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में दल-बदल
का इतिहास पुराना.....
विद्याचरण शुक्ला
छत्तीसगढ़ की राजनीति में दल-बदल का पुराना इतिहास है। राजनीति में कभी कद्दावर नेता रहे विद्याचरण शुक्ल इसके सबसे बड़े उदाहरण थे। अविभाजित मप्र के समय ही इंदिरा संजय गांधी के करीबी देश की राजनीति में अहं स्थान रखने वाले विद्याचरण शुक्ल 1989 में तब के पीएम राजीव गांधी का साथ छोड़ कर वीपी सिंह के जनतादल में चले गए और केंद्र में मंत्री बने। इसके बाद ही उनका राजनीतिक कैरियर बुरी तरह प्रभावित हुआ। वे फिर कांग्रेस में लौटे मंत्री बने,लेकिन तब अपेक्षित महत्व नहीं मिला। छत्तीसगढ़ बना तो विद्याचरण यहां सीएम बनना चाहते थे, लेकिन उनकी जगह जोगी सीएम बन गए। नाराज होकर एनसीपी में चले गए। एनसी पी 2003 के विधानसभा चुनाव में कुछ खास नहीं कर पाई तो वे भाजपा में चले गए । 2004 के लोकसभा चुनाव में महासमुंद से भाजपा की टिकट पर उतरे लेकिन कांग्रेस के अजीत जोगी से हार गए। 2013 में नक्सल घटना में मृत्यु तक वे राजनीति की मुख्यधारा से किनारे ही रहे।
संत पवन दीवान....
दल-बदल की राजनीति के दूसरे बड़े नाम संत कवि पवन दीवान रहे हैं। अपनी मृत्यु के पहले तक कई बार दलबदल करते रहे। दीवान 1977 में जनता पार्टी से विधायक बने, मंत्री भी बनाए गए।1980 में वे जनता पार्टी से अलग हो गए, खुद की छत्तीसगढ़ पार्टी का गठन किया। मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह की सरकार थी तब वे कांग्रेस में चले गए और सांसद बने। 2008 के विधान सभा चुनाव से पहले भाजपा में चले गए। 2012 में कांग्रेस में लौटे, फिर भाजपा में चले गए। अंतिम समय में उनका राजनीतिक कैरियर दल-बदल का शिकार होकर रह गया था।
अरविंद नेताम....
बस्तर के कद्दावर आदिवासी नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने 1998 में कांग्रेस से किनारा किया और बसपा में शामिल हो गए। बसपा में कुछ खास नहीं कर पाए,2002 में एनसीपी में चले गए। 2007 में कांग्रेस में वापसी तो की लेकिन पार्टी में पुराना कद दोबारा हासिल नहीं कर पाए। 2012 में वे पीए संगमा की एनपीपी में चले गए। फिर से कांग्रेस में लौटे हैं। दलबदल से नेताम की राजनीति लग भग खत्म हो गई?
पार्टी बदलने के बाद
भी जीते कर्मा...
दल-बदल करने वाले नेताओं में महेंद्र कर्मा सफल रहे हैं। वे 1980 में दंतेवाड़ा से सीपी आई के विधायक थे। बाद में कांग्रेस में आए, मंत्री बने। हालांकि कर्मा आखिर में चुनाव हार गए थे। भाजपा के कद्दावर नेता दिलीप सिंह जूदेव के पिता विजयभूषण सिंहदेव जनसंघ में थे। इंदिरा के समय में कांग्रेस में आ गए, लेकिन जनता ने स्वीकार नहीं किया। बाद में उन्होंने सन्यास ले लिया। जूदेव के ही भतीजे विक्रमादित्य सिंहदेव, भाजपा से कांग्रेस में गए, निर्दलीय हो गए। कोरबा में नवरंगलाल वामपंथी रहे।1998 में कांग्रेस में शामिल हो गए। उनका यह फैसला गलत साबित हुआ।
और अब बस.....
0श्यामाचरण-विद्याचरण शुक्ला परिवार में अभी कोई भी सांसद विधायक नहीं है।
0 अजीत जोगी सीएम रहे, उनकी पत्नी डॉ रेणु और पुत्र अमित भी विधायक रहे पऱ अब इस परिवार का कोई भी विधायक नहीं हैं।
0 छ्ग के की राजनीति में इक्का दुक्का राज परिवार के लोग ही सक्रिय हैं।
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