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18th April 2026

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मै कतरा होकर भी दरिया से जंग करता हूँ.... मुझे बचाना समंदर की जिम्मेदारी है....!

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वरिष्ठ पत्रकार शंकर पांडे की कलम से...*कॉलम 21 सालों से लगातार : मै कतरा होकर भी दरिया से जंग करता हूँ.... मुझे बचाना समंदर की जिम्मेदारी है....!

Praveen Nishee Fri, Apr 17, 2026

प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर बस्तर में वनों से आच्छादित पहाडिय़ां,उनमें उन्मुक्त विच रण करते वन्य प्राणी,मनो हारी जलप्रपातों के साथ कल कल बहती नदियां, रहनेवाले सीधे-सादेे लोग जंगली पारं परिक नृत्य मन मोह लेते थे पर पता नहीं उसे किसकी नजर लग गई...झीरम घाटी के नरसंहार के बाद विधायक भीमा मंडावी सहित 5 लोगों की हत्या आदि निश्चित ही फिर सोचने मजबूर किया था कि क्या बस्तर,छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की समस्या का कोई तोड़ सरकार के पास नहीं है....? केरल राज्य से बड़ा बस्तर उत्तर से दक्षिण तक 215 किलोमीटर लंबाई और पश्चिम से पूर्व तक 182 किलोमीटर की चौड़ाई तक फैले 39 हजार 114 वर्ग किलोमीटर बस्तर प्राकृतिक संपदा, जनजातीय संस्कृति, पुरातत्व, प्राकृतिक स्थलों के कारण देश-विदेश में प्रसिद्ध है।पर कुछ सालों से सदा बहार,निस्तब्ध वनों की खुशबू में खौफनाक जहर घोल दिया गया था।नक्सली वारदातों, बारूद की दुर्गंध और निर्मम हत्याओं को लेकर चर्चा में रहा।1972 में भोपालपट्नम में पहली बार नक्सली धमक सुनी गई थी, छग में नक्सली वारदात बढ़ती रही, दखल क्षेत्र बढ़ता गया। 76 सीआरपीएफ के जवानों की निर्मम हत्या, झीरम घाटी में 9 बार लोकसभा साँसद रहे पूर्व केन्द्रीयमंत्री विद्याचरण बतौर निर्दलीय सांसद बनने वाले पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा अविभाजित मप्र, छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री रहे नंदकुमार पटेल,पूर्व विधायक उदय मुदलियार सहित 31 लोगों की शहादत हुई थी, दंतेवाड़ा में जेल ब्रेक में 299 नक्सलियों सहित कैदियों के फरार होने की वारदात हुई, एक ट्रक बारूद भी बस्तर के जंगलों से गायब होने की खबर मिलीथी राजनांदगांव जिले के मानपुर जंगल में नक्सली वारदात में एसपी विनोद चौबे की हत्या की गई। बस्तर में बिगड़ते हालात के लिए आखिर जिम्मे दार कौन था? सीआरपीएफ 76 जवानों के सामूहिक नर संहार के बाद तब के एसपी को हटा दिया गया, झीरम घाटी की बड़ी वारदात के बाद भी एसपी हटा दिये गये, कले क्टर को सचिवालय अटैच कर दिया गया। दुनिया का सबसे बड़ा नक्सली जेल ब्रेक हुआ, डिप्टी जेलर कोबर्खास्त कर दिया गया। क्या बस इसी से सरकार की जिम्मेदारी पूरी हो गई थी। सुकमा कलेक्टर एलेक्स पाल मेमन का अप हरण हो गया था उनकी किन 'शर्तों' में वापसी हुई यह भी अभी तक चर्चा में है...!

बस्तर और विवाद

बस्तर संभाग का बतौर कार्य भार सम्हालने वाले तब के कमिश्नर शेखर दत्त बाद में छग के राज्यपाल बने, छत्तीसगढ़ के बतौर मुख्य सचिव का कार्यभार सम्हालने वाले सुनील कुमार ने आईएएस का प्रारंभिक प्रशिक्षण बस्तर से ही लिया।मप्र के पूर्व मुख्य सचिव आर.परशुराम भी जून 86 से मई 88 तक बस्तर के कलेक्टर रहे, नक्सलियों के करीबी समझे जाने वाले स्व. ब्रम्हदेव शर्मा भी बस्तर कलेक्टर रह चुके थे। बस्तर में कई योग्य अफसर पदस्थ रहे फिर भी नक्सलवाद के बीज को खाद-पानी मिलता रहा और वह अब विशाल वृक्ष के रूप में तब्दील हो चुका था । सीपी एण्ड बरार( मप्र- छत्तीसगढ़ इसी राज्य में शामिल था) में बस्तर की पृथक पहचान थी।आजादी के बाद एस पी मुशरान वहां प्रभारी तो 6 जनवरी 49 से 21 जनवरी 55 अर्थात लगभग 6 साल के लंबे समय तक कलेक्टर रहे आर.सी.व्ही.पी.नरोन्हा ने तो रिकार्ड ही बना डाला वही 24 दिन के कलेक्टर बनने का रिकार्ड आईएएस हर्षमंदर का है। कलेक्टर मो.अकबर ने 1962 से 66 यानि 4 साल तक बस्तर की कलेक्टरी की इन्हीं के कार्यकाल में बस्तर के मसीहा के नाम से चर्चित राजा प्रवीरचंद भंजदेव की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई वहीं कई अन्य लोग भी पुलिस फायरिंग से मारे गये। तब अविभाजित मप्र के सी एम डीपी मिश्र थे।यह मामला देश की संसद सहित विधान सभा में गूंजा था। आज भी कई सवाल अनुतरित है। डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा 24 अगस्त 69 से 3 नवंबर 71 तक बस्तर के कलेक्टर रहे तब बस्तर में दैहिक शोषण के खिलाफ आवाज उठाई, पुरातात्विक धरोहरों की अफरा-तफरी उस समय भी हुई। 10 अक्टूबर 1977 से 1 अगस्त 1980 तक बस्तर के कलेक्टर रहे नन्हें सिंह का कार्यकाल काफी चर्चित रहा।इनके कार्यकाल में यशोदा हत्याकांड, बैला डिला गोलीकांड हुआ जिसमें कई आदिवासियों- श्रमिकों की मौत हुई थी। औद्योगिक नगरी किरंदुल (बैलाडिला की पहाडिय़ों से लगा) में छटनी का विरोध करनेवाले मजदूरों -पुलिस के बीच झड़प के बाद गोली चलाई गई,कई मजदूर असमय ही कालकलवित हो गये। उस समय मजदूरों की सिलसिले वार जली झोपडिय़ां और बैलाडिला की रक्त रंजित पहाडिय़ां अभी भी इस बात की गवाह है कि आजादी के इतने साल बाद भी पुलिस का आचरण वैसा ही तो था जैसा आजादी के पहले था। बस्तर के 27 वें कलेक्टर बी राजगोपाल नायडू ने 15 जुलाई 96 को कार्य सम्हाला था तब के कमिश्नर, उनके बीच उपजे विवाद की चर्चा तब के सीएम तक पहुंची थी।मालिक मकबूजा वृक्ष यानि आदिवासियों की जमीन पर खड़े इमारती वृक्षों को कहा जाता था। टिम्बर के व्यापारी कम कीमत में वृक्ष खरीद, अधिक कीमत में बेचते थे। इस दौरान करीब 55 करोड़ के 75 हजार वृक्ष टिम्बर व्यापारियों द्वारा काटे गये बाद में कमिश्नर- कलेक्टर को जांच का आदेश देना भारी पड़ा उनके तबादले कर दिये गये। इस मामले में बस्तर के कुछ राजनेताओं के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गई थी। बाद में 25 फरवरी 97 को प्रवीर कृष्ण कलेक्टर बने तो 'इमली आंदोलन' के लिए उनका कार्यकाल चर्चित रहा। बस्तर की वनोपज इमली का सही मूल्य दिलाने उन्होंने ही महत्वपूर्ण कदम उठाया था। मालिक मकबूजा प्रकरण के छीँटे तब कमिश्नर नारायण सिंह (बाद में मुख्य सचिव छग के समतुल्य पद से सेवा निवृत्त) चितरंजन खेतान(तब सहायक कलेक्टर )पर पड़े, नारायण सिंह,खेतान तो इसी प्रकरण के चलते संभवत: मुख्यसचिव नहीं बन सके।बस्तर में बाद में गणेशशंकर मिश्रा ने कलेक्टर-कमिश्नर का कार्यभार सम्हाला, शहर के विकास सहित औद्योगिकी करण के लिए कई कदम भी उठाये। फिलहाल वहाँ डोमन सिंह कमिश्नर हैँ,उनके कार्यकाल में बस्तर नक्सल मुक्त हो गया है?बस्तर में वैसे भी संभवत: देश के पहले आयुक्त होते हैं जिनके अधीन सर्वा धिक जिले हैँ।सवाल फिर यही उठ रहा, जब अच्छे प्रशासक - कलेक्टर- कमीश्नर वहां पदस्थ रहे...नक्सलवाद का पौधा कैसे फलता- फूलता रहा...?क्या अफसरशाही इसके लिए जिम्मेदार थी,वहां राजनीति इसके लिए दोषी थी या राज्य सरकार की इच्छा शक्ति की कमी कहीं न कहीं दोषी थी? इसके लिए अभी भी गंभीरता से विचार करना होगा? मुझे छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्यपाल आईबी में डायरेक्टर रहे इ एसएल. नरसिम्हन (बाद में राज्यपाल आंध्रप्रदेश - तेलंगाना) की बात याद आ रही है उन्होंने एक बार मुझे दिये गये साक्षात्कार में कहा था- 'पहले पता तो चले नक्सली आखिर चाहते क्या हैं? नक्सलियों से बातचीत का सवाल है तो यह तो पता लगाया जाए नक्सली का नेतृत्व कौन कर रहा है?क्योंकि नक्सली संगठन कई लेयर में बना है? वैसे आंध्र प्रदेश-तेलंगाना पैटर्न पर ही सरकार को योजना बनाना पड़ेगा। सलवा जुडूम, के.पी. एस गिल की पदस्थापना, विजय रमन को नक्सली मामले का प्रभारी बना कई प्रयोग हुए और उन्हें सफल तो नहीं कहा जा सकता है?खैर देर आयद दुरुस्त आयद.. बस्तर नक्सल मुक्त हो ही गया पऱ कई सवालों के जवाब तो अभी भी आना बचा है..?वैसे नक्सली वहाँ फिर अपनी पैठ न बना पाएँ इसके लिये अभी "बहुत कुछ करना" छ्ग सर कार की जिम्मेदारी है।

और अब बस...

0 देश में नक्सलवाद की कुल घटनाओं में करीब 70% छत्तीसगढ़ और झारखंड में होती थी ।

0 बस्तर की पहाडिय़ों में बसा अबूझमाड़ ऐसा वन क्षेत्र है, जहां सर्वेक्षण नहीं हो सका है।

0 बस्तर को पहली बार सन 1896 में राजदरबार ने वन अधिकारी की नियुक्ति की थी।

0 महेन्द्र कर्मा पहले राजनेता रहे थे जो निर्दलीय सांसद बनने में सफल रहे थे।

0 बस्तर से अभिमन्यु रथ जरूर राज्यसभा में गये थे पर उन्हें ओडि़सा से प्रतिनिधित्व मिला था। बस्तर को ओडि़सा में शामिल करने के प्रयास के कारण उन्हें राज्यसभा भेजा गया था।

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