वरिष्ठ पत्रकार शंकर पांडे की कलम से..*(कॉलम 21 सालों से लगातार ) : किसी को कांटों से चोट पहुंची, किसी को फूलों ने मार डाला.... जो इस मुसीबत से बच गये थे, उन्हें उसूलोँ ने मार डाला...
Praveen Nishee Fri, Apr 24, 2026
जहाँ एक तरफ सरकार और कई मीडिया संस्थान यह दावा कर रहे थे कि "महिला आरक्षण बिल गिर गया" यह पूरी तरह से गलत खबर है, असल में महिला आरक्षण 'बिल'नहीं, बल्कि इस देश का कानून बन चुका है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 28 सितंबर 20 23 को ही इस पर हस्ताक्षर कर दिए थे।16 अप्रैल 2026 को इस कानून को अधिसूचित (Noti fy) भी कर दिया गया है, जिसमें महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान है।महिला आरक्षण क़ानून और परिसीमन से जुड़ा 131 वां संवैधानिक संशोधन विधेयक ही लोकसभा में गिर गया था ।पिछले 12 साल में ये पहली बार है जब सदन में पीऍम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सरकार की तरफ़ से पेश कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक सदन में गिरा हो।सदन में दो दिन की बहस के बाद मतदान हुआ,संसद में महिलाओं को 33%आरक्षण देने वाले क़ानून में संशोधन और परिसीमन से जुड़े बिलों के समर्थन में 298 मत पड़े, विरोध में 230 मत पड़े।लोकसभा क्षेत्रों की संख्या फिर से निर्धारित करने लाया जा रहा परिसीमन विधेयक भी इसके साथ जुड़ा हुआ था। सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक इन दोनों विधेयकों के साथ पेश किया था। विधेयक का मक़सद केंद्र शासित प्रदेशों के निर्वाचन‑क़ानून आरक्षण ‑व्यवस्था को नए परिसीमन और लोकसभा ‑विस्तार ढांचे से जोड़ना है। विश्लेषक मान रहे हैं परिसीमन विधेयक के पीछे राजनीतिक एजेंडा था, असली लक्ष्य परिसीमन पर ही केंद्रित था, इसके ज़रिए भाजपा अपने राजनीतिक भविष्य को सुर क्षित करना चाहती थी।“राजनीति में एक प्रसिद्ध कहावत है- दिल्ली का रास्ता उत्तरप्रदेश से होकर गुज़रता है। परिसीमन के बाद सदन में उत्तरभारत की ताक़त और मज़बूत होती,और इस समय भाजपा उत्तर भारत में बहुत मज़बूत है, परिसीमन के बाद अगर उत्तर भारत में सीटें बढ़ेती तो भाजपा इससे और मज़बूत होती “जिस तरह से सरकार महिला आरक्षण के साथ परिसीमन विधेयकलेकर आई,राजनीतिक दुस्साहस ही कहा जाएगा। विपक्ष महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक के साथ परिसीमन विधेयक लाने पर हमलावर रहा। सांसद राहुल गांधी ने सदन में बहस के दौरान कहा- महिला आरक्षण बिल नहीं, इलेक्टोरल मैप बदलने की साज़िश है। सभी दलों में आपसी सहमति न होने की वजह से इस बिल को नाकाम होना ही था। यह "हैरानी की बात है कि एनडीए के ही लगभग 12 सदस्य अनुपस्थित थे,इससे साफ़ ही है सदन के प्रबंधन को गंभीरता से नहीं लिया गया। राज्यों में चुनाव के बीच ही बुलाए गए विशेषसत्र ने संदेह पैदा किया जिसे सभी दलों की बैठक से टाला जा सकता था।सरकार तमिलनाडु,बंगाल के मतदाताओं से कह रही है कि विपक्ष महिला विरोधी है, विपक्ष कह रहा है,उन्होंने संघवाद, संविधान को बचाया है।2023 के क़ानून की अचानक अधिसूचना से स्थिति और जटिल हो जाएगी, मुद्दा जनगणना के बाद फिर सामने आएगा। केंद्र सरकार ने 2023 के महिला आरक्षण के क़ानून को लेकर नोटिफ़िकेशन जारी कर दिया है।ऐसा क्यों किया गया? ज़ब सरकार ने 2023 के क़ानून (नारीशक्ति वंदन अधिनियम) को लागू करने की अधिसूचना जारी की है, ताकि एक तकनीकी कमी को दूर किया जा सके। क़ानून को लागू करने अलग अधिसूचना की ज़रूरत थी, जो हाल ही में जारी नहीं की गई, संवैधानिक संशोधन विधेयक को पारित कराने दो-तिहाई बहुमत ही ज़रूरी है, मौजूदा सदन में सरकार के पास ये संख्या नहीं है,विपक्ष को भरोसे में लिए ये विधेयक पारित नहीं कराए जा सकते थे, विश्लेषक मान रहे हैं कि विधेयक का गिरना सरकार के लिए झटका है। क्योंकि उन्हें दिख रहा था उनके पास संख्या नहीं है फिर चुनावों के बीच ही लेकर आई क्योंकि बंगाल में महिलाओं के वोट ही अधिक संख्या में हासिल करना चाहती थी, भाजपा कह रही है विपक्ष, महिलाओं के हक़ में काम नहीं करने दिया। वैसे विधेयक का गिरना सरकार की साख़ के लिए तो झटका है, लेकिन बड़ा सवाल मंशा और मंसूबों का है। सरकार अपने मंसूबों में नाकाम हो गई है। विश्लेषक कई राज्यों में चल रही चुनावी प्रक्रिया के बीच भी संसद का विशेष सत्र बुलाने पर सवाल उठा रहे हैं?अहम सवाल यह है सरकार ने ऐसे समय में ही विशेष सत्र क्यों बुलाया जब राज्यों की चुनावी प्रक्रिया चल रही हो, क्या सरकार ध्यान कहीं और खींचना चाहती थी? चुनाव के बीच सिर्फ़ इसलिए लाए थे जिससे कि चुनाव में कहा जा सके कि हम बंगाल की महिलाओं के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे लेकिन विपक्ष ने हमें करने नहीं दिया।भाजपा महिला आरक्षण विधेयक के ज़रिए महिलाओं को एक वोटवर्ग के रूप में साधना चाहती है, कुछ सालों में महि लाएं एक अलग वोट बैंक बन कर उभरी हैं और भाजपाउन्हें अपनी तरफ खींचना चाहती है। महिला आरक्षण विधेयक साल 2023 में ही पारित हो चुका है तो अब परिसीमन के साथ जोड़कर लाने की क्या ज़रूरत थी..? सरकार, परिसीमन के साथ महिला विधे यक को भी टैग किया, इससे साफ़ है वह चुनाव के समय राजनीतिक फ़ायदा उठाना चाहती थी।विधेयक का गिरना सरकार के राजनीतिक एजेंडे के लिए झटका हो सकता है।राष्ट्र के नाम संदेश में पीएम नरेंद्र मोदी विपक्ष को केवल कोसा ही..वह भी उस समय ज़ब 2 राज्यों में चुनाव प्रचार तेजी से चल रहा था...? क्या चुनाव अचार संहिता का उल्लँघन नहीं है....?
महिला का हितैषी
कौन.. विरोधी कौन...?
महिला आरक्षण को लेकर भाजपा, कॉंग्रेस पऱ महिला विरोधी होने का आरोप लगा रही है, पऱ कांग्रेस का पुराना इतिहास और भाजपा की वर्तमान स्थिति से तो भाजपा ही कटघरे में ख़डी दिखाई दे रही है..कांग्रेस ने तो सुचेता कृपलानी को भारत कीपहली सीएम,इंदिरा गाँधी को पहली पीएम, प्रतिभा पाटिल को पहली राष्ट्रपति, मीरा कुमार को पहली लोकसभा अध्यक्ष सरोजनी नायडू को भी कांग्रेस की अध्यक्ष, फातिमा बीबी को पहली न्यायाधीश बनाया था, वर्तमान में 21 राज्यों में भाजपा और गठबंधन की सर कार है पऱ केवल एक राज्य, दिल्ली में ही महिला सीएम बनी है..? भाजपा अध्यक्ष या पीएम पद पऱअभी तक कोई महिला नहीं पहुंची है?
यदि सांसदों ओर विधायकों
की संख्या बढ़ जाती तो......?
यदि महिला आरक्षणसंशोधन बिल पारित हो जाता तो लग भग 15 हजार करोड़ काखर्च सालाना बढ़ जाता,अतिरिक्त खर्च का वहन मध्यमवर्गीय करदाताओं को करना पड़ता? 547 से बढ़कर 850 सांसद करने की योजना थी,प्रदेशों की विधानसभाओं में विधायकों की संख्या 4100 से बढ़कर 6200 करने की भी योजना थी।छत्तीसगढ़ में भी 90से 120 विधानसभा और 17 लोकसभा क्षेत्र बनाना प्रस्तावित था। वैसे नये लोस और विस क्षेत्र बनने पऱ ही कितना खर्चा बढेगा इस पऱ किसी ने विचार नहीं किया है, ठीक है कि भारत की जन संख्या बढ़ गई है पऱ क्षेत्रफल तो वहीं है।एक सांसद पऱ वेतन, सभी सुविधाओं पऱ 5करोड़ ₹ प्रति वर्ष खर्च आता है।विधायकों पऱ 2करोड़ ₹ वार्षिक खर्च बैठता है।लोकसभा में सांसद बढ़ते, विधान सभाओं में विधायक बढ़ते तो कुल संख्या के अनुपात में 15% मंत्री बढ़ते जाहिर था कि मंत्रियों के लिये भी बँगले बनाने की जरूरत होती,उनके तामझाम में भी खर्च होता, दिल्ली में लोकसभा सदस्य बढ़ते तो उनके आवास, अन्य सुविधाएं भी बढ़ानी पड़ती, वहीं राज्यों के मुख्यालयों में विधायकोँ तथा बढ़नेवाले मंत्रियों के लिये भी आवास आदि पऱ भी खर्च करना ही पड़ता..? पिछले 12 सालों में ही कर्ज लेने का इतिहास बनाने वाली मोदी सरकारफिर कर्ज लेती और मध्यमवर्गीय लोगों पऱ करों का बोझ भी निश्चित ही बढ़ता... विपक्ष की मांग सही है, मौजूदा सांसदोँ की संख्या में ही 33% महिलाओँ के लिये आरक्षण किया जाय, जिससे 543 सांसदों में 180 महिलाओँ के लिये सीटें रिजर्व हो जाएंगी वैसे मौजूदा समय में 75 महिला सांसद हैँ, भाजपा की 31, कुल जीते सांसदों की संख्या का 13%, कांग्रेस 13 सांसद 13%, टी ऍमसी 11सांसद (38%), और सपा के 5 सांसद 14% हैँ ।
और अब बस.....
0 महिला आरक्षण के मामले में कांग्रेस के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाने छ्ग विधानसभा का विशेष सत्र 30 अप्रेल को होने वाला है।
0अब तक भारत में चार बार 1952, 1963, 1973 और 2002 में आयोग का गठन किया जा चुका है।इस आयोग को संविधान, शक्तियां और स्वायत्तता देता है और उनके लिए गए निर्णयों को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती.....
0 1952 में कुल 489 लोकसभा सीटें थीं,1973 में सीटों की संख्या 543 हो गई, 1976 में इंदिरा गांधी ने 42वें संशोधन के ज़रिए परिसीमन पर 25 साल के लिए रोक लगा दी थी।
0 इसके बाद 2001 में जनगणना हुई, 2002 में परिसीमन आयोग का गठन हुआ,तब के पीऍम अटल बिहारी वाजपेयी ने 84 वां संशोधन कर इसे 25 साल के लिए टाल दिया था...!
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