न्यायालयी आदेशों की अवहेलना कर प्रेस क्लब की स्वायत्तता पर सीधा हमला : बिना अधिकार, बिना कोरम, बिना सुनवाई — अफसरों ने कुचल दी प्रेस क्लब की लोकतांत्रिक प्रक्रिया
Praveen Nishee Fri, Jan 9, 2026
बिलासपुर।(महफूज़ पंडित की कलम से) फर्म एवं संस्थाएं बिलासपुर संभाग के सहायक पंजीयक ज्ञान साहू और छत्तीसगढ़ के रजिस्ट्रार पद्मिनी भी ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बिलासपुर प्रेस क्लब के चुनाव को रद्द कर दिया और नियम विरुद्ध चुनाव करवा दिया है। जबकि न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि अवैध आदेश के तहत की गई सारी प्रक्रिया अवैध है।
बिलासपुर प्रेस क्लब के दो साल का कार्यकाल (2023-25) समाप्त होने से पहले 7 सितंबर 2025 को सामान्य सभा बुलाई गई। इसमें आय व्यय की जानकारी पेश की गई। इस बीच सदस्यों ने चुनाव कराने की मांग उठाई और सर्वसम्मति से क्लब के वरिष्ठ सदस्य महेश तिवारी को चुनाव अधिकारी नियुक्त किया गया। चुनाव अधिकारी ने 9 सितंबर को चुनाव अधिसूचना जारी कर प्रारंभिक मतदाता सूची का प्रकाशन किया। दूसरे दिन यानी कि 10 सितंबर को दावा आपत्ति का निराकरण कर अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन किया गया और विधिवत चुनाव कार्यक्रम और वोटर लिस्ट की सूची फर्म एवं संस्थाएं बिलासपुर संभाग के कार्यालय में जमा की गई और उसकी पावती ली। मतदाता सूची को लेकर चार लोगों ने सहायक पंजीयक साहू के पास शिकायत दर्ज करवाई। इनमें दो सदस्य बाहरी थे, जिन्हें संस्था का कोई लेना देना नहीं है। दो सदस्य वो थे, जिन्होंने चुनाव में प्रत्याशी के रूप में भाग लिया। इस बीच उनकी शिकायत चलती रही। दूसरी ओर चुनाव प्रचार भी करते रहे। इनकी शिकायत पर सहायक पंजीयक साहू ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर संज्ञान लिया। दरअसल, छत्तीसगढ़ रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1973 संशोधित अधिनियम 1998 की धारा 32 में संस्था के खिलाफ मिली शिकायत की जांच को संज्ञान लेने का नियम दिया गया है। धारा 32 के अनुसार किसी संस्था के शासी कमेटी के अधिकांश सदस्यों के शपथ पत्र में मिली शिकायत को रजिस्ट्रार संज्ञान लेकर जांच कर सकता है या फिर जांच अधिकारी नियुक्त कर सकता है। दूसरा क्लब के एक तिहाई सदस्यों के हस्ताक्षर युक्त शिकायत मिलने पर ही जांच की जा सकती है। इसमें भी शपथ पत्र अनिवार्य है। अधिनियम में दी गई शर्तों को पूरा नहीं करने वाला शिकायत पत्र अवैध माना जाता है। हाई कोर्ट ने कई मामलों में कोरम पूरा नहीं वाली शिकायत पर की गई कार्रवाई को अवैध ठहराया है। बिलासपुर प्रेस क्लब के मामले में सहायक पंजीयक द्वारा बिठाई गई जांच में स्पष्ट है कि बिना कोरम पूरा किए अवैध शिकायत को संज्ञान में लिया और अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर चुनाव अधिकारी को नोटिस जारी किया। जवाब मिलने के बाद भी नोटिस जारी किया। चुनाव में दोनों शिकायतकर्ता हार गए इसके बाद फिर से शिकायत की। मजेदार बात ये है कि सहायक पंजीयक ने चुनाव अधिकारी को ही नोटिस जारी किया, जबकि कानून में दिए गए प्रावधान के अनुसार चुनाव कार्यक्रम संपन्न होने के बाद चुनाव अधिकारी का काम खत्म हो जाता है। सारी जवाबदारी निर्वाचित कार्यकारिणी पर आ जाती है, यह नियम जानते हुए भी क्लब के निर्वाचित अध्यक्ष दिलीप यादव को सुनवाई का मौका नहीं दिया। दूसरी ओर, रजिस्ट्रार ने सारा दस्तावेज तलब कर 18 नवंबर 2025 को अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर 19 सितंबर को हुए चुनाव को अमान्य कर दिया, जबकि नियम कहता है कि किसी भी चुनाव के परिणाम को निरस्त करने के लिए इलेक्शन पिटिशन जरूरी है। कोर्ट ही चुनाव को रद्द कर सकता है।
यह भी बता दें कि छत्तीसगढ़ रजिस्ट्रीकरण अधिनियम की धारा 32 में दिए गए प्रावधान के अनुसार वित्तीय स्थिति में विवाद, गठन, गड़बड़ी या अव्यवस्था की जांच कर सकता है, इसकी पुष्टि होने पर ही शासी निकाय का विघटन किया जा सकता है। अधिनियम में कहीं पर भी उल्लेख नहीं है कि चुनाव निरस्त करने का अधिकार रजिस्ट्रार को है। इससे साफ है कि रजिस्ट्रार और सहायक पंजीयक ने जानबूझकर बिलासपुर प्रेस क्लब की स्वतंत्रता का हनन किया, उसकी अस्मिता से खेला और अधिकार न होते हुए भी चुनाव रद्द कर दिया। ऐसा भ्रष्टाचार करने के पीछे फर्म एवं संस्थाएं के अधिकारियों की क्या दिलचस्पी रही होगी, खुद ही अनुमान लगाया जा सकता है।
विज्ञापन