: पहाड़ी नदियाँ अकेले दम पर विशाल नहीं बनती
Sun, May 12, 2024
आज इस अंचल की पहाड़ी नदी हसदो पर चर्चा करते हुए हम यह कह सकते हैं कि हसदो ही नहीं बल्कि देश की सभी पहाड़ी नदियों का अस्तित्व एवं विशालता छोटी-छोटी सहायक नदियों के सह अस्तित्व पर ही निर्भर होती है . इन सहायक नदियों के सह अस्तित्व एवं सहयोग के बिना कोई भी पहाड़ी नदी अपने दम पर विशाल नहीं बन सकती.
गजलकार दुष्यंत कुमार की दो पंक्तियां इस पूरी दास्तान को इस तरह व्यक्त करती है --
" यहां आते-आते सूख जाती है कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा"ब्रह्मांड की सबसे बड़ी पूंजी पृथ्वी की संरचना प्रकृति नियंता ईश्वर ने बड़ी गंभीरता और तन्मयता के साथ किया है क्योंकि इसमें जीव जंतुओं पहाड़ों जंगलों नदियों का वैभव एवं सुंदरता भरी हुई है. यही कारण है कि स्वयं नियंता के अंश का ईश्वरीय अवतार भी इसी पृथ्वी पर हुआ है. ब्रह्मांड में बसे हमारे सौरमंडल और पृथ्वी की कहानी जग जाहिर है यह सभी जानते हैं कि पृथ्वी को छोड़कर अन्य कोई ऐसा ग्रह नहीं है जहां पर मानव जीवन की उत्पत्ति के अब तक प्रमाण मिलते हैं. अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के द्वारा लगातार प्रयास किया जा रहे हैं कि किसी अन्य ग्रहों की खोज की जाए जहां मानव को बसाया जा सके लेकिन अब तक यह संभव नहीं हो पाया है. जीवन की उत्पत्ति के साथ आवश्यक है जीवन के संरक्षण हेतु आवश्यक उपकरण, जिसमें शामिल होते हैं हमारी पृथ्वी पर पर्याप्त पानी और हवा अर्थात का ऑक्सीजन जिससे जीवन को आगे बढ़ाने में मदद मिलती है और जिससे यह जीवन फलता फूलता है और धीरे-धीरे बीजों के अंकुरण के साथ जीवन की शृंखला एक-एक कर आगे बढ़ती चलती है नष्ट होती है और पुनर्जन्म लेकर आगे बढ़ती है यह क्रम लगातार आगे भी चलता रहता है.
पर्यावरण चिंतन का एक पहलू यह भी है कि पृथ्वी पर प्रकृति द्वारा मानव एवं जीवन की उत्पत्ति के पहले नदियों सागर एवं हिमखंडों की रचना की गई है जिसमें समृद्ध समुद्र एवं हिमखंड इतने विशाल क्षेत्र में फैले हैं कि उनके परिवर्तन का प्रभाव बहुत धीरे-धीरे पृथ्वी पर दिखाई पड़ता है लेकिन नदियां एवं भूजल स्त्रोत का प्रभाव मानव एवं जीव जंतुओं पर तत्काल दिखाई पड़ने लगता है. ज्यादातर नदियां पहाड़ी इलाकों की ऊंचाइयों से प्रारंभ होती है और अपनी छोटी-छोटी सहायक नदियों से जुड़कर आगे बढ़ती हुई विशाल रूप धारण करती हैं. इसी विशाल अस्तित्व पर नदियों मे बांध बनाकर सिंचाई की व्यवस्था की जाती है इन्हीं बांधों के ऊपर बिजली पैदा करने से लेकर अन्य व्यवसायिक उपयोग तक किये जाते है. इसी व्यवसायिकता की आर्थिक दौड़ के बीच हम छोटी-छोटी जलधाराओं के पहाड़ी नालों को याद नहीं करते जिसका परिणाम होता है की बड़ी नदियों के विशाल पाट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जाती है और अंत में यह समाप्त होने लगती है किंतु जब तक हम इसके बारे में सचेत हो पाते हैं तब तक हमारे सभी प्रयास मुट्ठियों में हवा भरने जैसी बात साबित होने लगते हैं इसलिए यह जरूरी है कि छोटे-छोटे जल स्रोतों के मरते हुए नालो का अस्तित्व भी बनाए रखा जाए अन्यथा नदियों के विशालता धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी और हमें इसका पता भी नहीं चलेगा.
छत्तीसगढ़ में कई नदियां प्रवाहित है जो आगे लंबी यात्रा करती हुई समुद्र में समा जाती है. अपने आसपास की छोटी बड़ी नदियों के बारे में यदि हम नजर डालें तब हमें महानदी के अस्तित्व की चिंता भी करनी चाहिए क्योंकि महानदी की सबसे बड़ी सहायक नदी हसदो नदी है जो कोरिया जिले के सोनहत क्षेत्र में फैले कैमूर की पहाड़ियों से निकलकर एक छोटे उद्गम धारा के रूप में प्रवाहित होती है. जो आज मात्र छोटे-छोटे जल कुंड के रूप में ही गर्मियों में दिखाई पड़ रही है. लगभग दो दशक पहले हसदो नदी एक महुआ पेड़ के जड़ के पास एक अनवरत स्रोत के रूप में प्रवाहित थी जिसे सोनहत की पहाड़ियों से उतरकर नीचे एक धारा के रूप में जड़ के नीचे से प्रवाहमान माना जाता था लेकिन वर्तमान समय में रेत के कुछ छोटे-छोटे कुंड में ही पानी दिखाई पड़ता है. इस नदी के पूर्व वर्तमान तक की कहानी यहां उद्गम पर जनप्रतिनिधि चरणदास महंत के सहयोग से बने मंदिर में वर्षों से आने जाने वाले श्रद्धालुओं से उनके चिंता जनक हसदो की कहानी से जाना जा सकता है. इस हसदो नदी की सहायक नदी में मुख्य रूप से तान, झींग, गेज तथा झुमका के साथ-साथ रेत के नीचे धीरे धीरे बहने वाली छोटी-छोटी नदिया नाले के स्वरूप में आगे मिलती चलती है. इसी हसदो नदी को ढुलकू पहाड़ी के हरड़ा गांव के बारहमासी तुर्रा से निकलने वाले निरंतर पानी के नाला और आगे बेलहिया नाला तथा पड़ेवा गाँव के कउआ खोह नाला तथा बिहारपुर गांव का सिसौली पारा नाला (जिसे गंगा धाम भी कहते हैं) यह सभी मिलकर आगे तिलझरिया नाला का निर्माण करते हैं जो बिहारपुर - सोनहत मार्ग से सड़क पार कर आगे बढ़ती है जो धुटरा गाँव के उपर हर्रीटोला गांव को घेर कर चलने वाली घुनैठी नदी से मिलकर आगे बढ़ती है. यह घुनेठी नदी बारहोमास बहने वाली जिंदा नदियों मे से एक है. जो समाप्त हो रही हसदो नदी को पानी देकर अपने छोटी लेकिन जिंदा नदी होने का अपना परिचय देती है. इसी हसिया नदी में मनेन्द्रगढ़ के पास विशाल बोरा नाला जो बौरीडांड रेलवे स्टेशन के पास मध्य प्रदेश के ऊपरी गांव के बीच से निकलकर रेलवे स्टेशन के किनारे किनारे चलते हुए पहाड़ी नालों के साथ उनके बरसाती पानी को लेकर आगे बढ़ती है और मनेन्द्रगढ़ रेलवे स्टेशन के उत्तरी भाग को घेरती हुई आगे लालपुर गांव से बढ़कर बस स्टैंड के नीचे हसिया नदी के आंचल में अपना पूरा पानी उड़ते देती है जिससे हसिया नदी समृद्ध बनकर आगे बढ़ाने के लिए ऊर्जा प्राप्त करती है. छोटी-छोटी नदियों नालों का सहयोग समन्वय का जल एक बड़ी नदी के निर्माण में कितनी अहम भूमिका निभाता है यह इन नालों के मिलने से ही पता चलता है. यही सहयोग और समन्वय मानव को चिंतन के कई पहलुओं पर विचार करने के लिए भी प्रोत्साहित करती हैं जिसका पहला पक्ष सहयोग एवं समन्वय की भावना से मिलकर एक बड़े निर्माण का संकल्प पूरा करना एवं दूसरा पक्ष यह साबित करता है कि छोटे-छोटे नालों का अस्तित्व यदि बचा कर रखा जाएगा तभी बड़ी नदियों में पानी का अस्तित्व बचा रहेगा अन्यथा विशाल नदियों को भी समाप्त होने में देर नहीं लगेगी.
. हसदो की सहायक नदियों में गेज नदी के बहाव का सहयोग बहुत बड़ी भूमिका निभाता है. गेज नदी हसदो की सबसे लंबी सहायक नदियों में से एक है जो आगे बढ़कर हसदो अरण्य के क्षेत्र में घूमती हुई हसदो के साथ-साथ बहती है. इसी नदी पर फैले हंसदो अरण्य जंगल के उपर बहुत बड़ा खतरा आज मंडरा रहा है क्योंकि इसी हंसदो अरण्य जंगल के 1880 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 23 नए कोयला ब्लॉक का भंडारण ही इस जंगल की मृत्यु का कारण बन चुका है जो यहां के आदिवासियों को जीवन मौत के बीच खड़ा कर चुका है वहीं हजारों पशु पक्षियों को की कई नष्टप्राय प्रजातियों पर भी यह एक बड़ा संकट बनकर इसी हंसदो अरण्य में इनकी कब्रगाह बनाने के लिए तैयार है इन सब के साथ इस क्षेत्र में नए कोयला उत्खनन परियोजनाओं से जहां-जहां का भूमिगत जल स्तर नीचे गिरेगा वहीं गेज की समाप्ति के साथ हसदो की समाप्ति का अनकहा निमंत्रण दिखाई पड़ रहा है.
हसदो नदी छत्तीसगढ़ के ज्यादा प्रदूषित नदियों में से एक गिनी जाती है क्योंकि इसी नदी पर छत्तीसगढ़ की विद्युत सूर्य कहे जाने वाले कोरबा जिले के 13 से ज्यादा थर्मल पावर प्लांट संचालित हैं. जिसका पूरा कचरा इसी नदी में समाहित हो रहा है इसी तरह चांपा की फैक्ट्रियां और मनेन्द्रगढ़ जैसे व्यावसायिक शहर की गंदगी भी हसिया नदी के जरिए इस नदी में डाली जा रही है. महेंद्रगढ़ के निवासी होने के कारण हमारा चिंतनीय पहलू यह है कि लगभग 100 करोड़ की नगर पालिका मनेन्द्रगढ़ के पास नगर के प्रदूषित पानी को साफ करके हसदो में डालने के लिए अब तक कोई भी परियोजना विचाराधीन नही है. जबकि स्वच्छता के नित नये प्रयोग मे हसिया के पानी को साफ करके हसदो मे डालने हेतु आज यह बहुत जरुरी है. जानकारी के अनुसार सन् 1900 से कारीमाटी नाम से अपनी ऐतिहासिक धरोहर लिए हुए मनेन्द्रगढ़ सैकड़ो वर्ष पुराने इस नगर के क्रमिक विकास की कहानी में कचरा प्रदूषण को समाप्त करने या काम करने के लिए कोई ध्यान नहीं दिया जाना हमारी सबसे बड़ी चिंता मे शामिल होना चाहिए. अपने समय के कोरिया राज्य मे 1931 मे राजा रामानुज प्रताप सिंह देव द्वारा मनेन्द्रगढ़ की 2600 आबादी की नगरी के लिए एक नगरपालिका की स्थापना की गई जिसके प्रारंभ मे नामांकित कमेटी को संचालन दायित्व दिया गया. 1936 में यह नगर पालिका अपने पूरे अस्तित्व में आ गई जिसका आजादी के बाद चयनित कमेटी के माध्यम से कार्य संपन्न होने लगे. अविभाजित अंबिकापुर के साथ-साथ मनेन्द्रगढ़ में स्थित इतनी पुरानी नगर पालिका में हसदो नदी के कचरे को समाप्त करने के प्रति चेतना नहीं होना कई प्रश्न खड़े करता है. कचरे को एक जगह से उठाकर दूसरी जगह डंप कर देने से कचरा समाप्त नहीं होता बल्कि धीरे-धीरे घुलकर पानी और वायु के माध्यम से हमारे स्वास्थ्य को तिल तिल कर तोड़ रहे हैं. यह हमारी चिंता के विषय में शामिल होना चाहिए . मुझे उम्मीद है कि प्रदूषण को कम करने के लिए और नालों के पानी को स्वच्छ कर साफ पानी हसदो नदी में डालने हेतु यदि कोई प्रस्ताव शासन को भेजा जाएगा तब इसे अवश्य स्वीकृति मिलेगी. जिससे नगर को हसदो से स्वच्छ पीने का पानी भी नगर को मिल सकेगा और हसदो में प्रदूषण की मात्रा को कम करने के प्रयास की चर्चा दूसरों के लिए मार्गदर्शक बनेगी.
आज इस अंचल की पहाड़ी नदी हसदो पर चर्चा करते हुए हम यह कह सकते हैं कि हसदो ही नहीं बल्कि देश की सभी पहाड़ी नदियों का अस्तित्व एवं विशालता छोटी-छोटी सहायक नदियों के सह अस्तित्व पर ही निर्भर होती है . इन सहायक नदियों के सह अस्तित्व एवं सहयोग के बिना कोई भी पहाड़ी नदी अपने दम पर विशाल नहीं बन सकती.
गजलकार दुष्यंत कुमार की दो पंक्तियां इस पूरी दास्तान को इस तरह व्यक्त करती है --
" यहां आते-आते सूख जाती है कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा"
: नींव के पत्थरों में सोया हुआ इतिहास धवलपुर
Sun, Apr 28, 2024
लोक कथाओं की किवदांतियो और इतिहास की बहुत लंबी कहानी है जिसके एक-एक पन्ने पलटने पर आपकी जिज्ञासा और ज्यादा बढ़ने लगती है क्यों, कैसे जैसे प्रश्नों से प्रारंभ होकर उसके बाद क्या हुआ जैसी घटनाओं का अध्ययन सोच एवं उसे क्रमवर जोड़कर एक दस्तावेज का रूप देना ही इतिहास की पहली सीढ़ी है जो आगे कई कड़ियों में अपने प्रमाणिक दस्तावेजों के अनुसार सुधार की गुंजाइश के साथ लिपिबद्ध कर दी जाती है. इतिहास के लेखन में आपको कई स्थानों पर लेखक की कल्पना के अंश भी मिल जाते हैं.भारतवर्ष के इतिहास के बारे में पुराणो का महत्व सर्वमान्य इतिहास है जिसमें भारतीय पंचांग के अनुसार सृष्टि के आरंभ से एक अरब 95 करोड़ 58 लाख 85 124 वर्ष और कलयुग के 5124 वर्ष तथा विक्रम संवत 2019 वर्ष बीत चुके हैं भारतवर्ष का पुराना इतिहास सत्य घटनाओं पर आधारित इतिहास था जिसे पुराण कहा जाता है किंतु यह विदेशी आक्रमण के दौरान आक्रांताओं द्वारा जला दिया गया. हमारे देश के विश्व स्तरीय पुस्तकालय नालंदा एवं तक्षशिला में मुगल आक्रमण कारियो द्वारा इसे नष्ट कर दिया गया जिससे कई ऐतिहासिक पुस्तकों सहित पुराण जैसे ग्रंथ समाप्त हो गए. आज कुछ पुराने स्मृतियों के आधार पर या किसी विद्वान पारखी नजरों में सहेज कर रखे गए दस्तावेज ही हमारा इतिहास बनकर उपलब्ध है. विज्ञान एवं अन्वेषण से पता चलता है कि लगभग 500 लाख पहले भारतीय उपमहाद्वीप एशिया से अलग महाद्वीप था जो कालांतर में आकर एशिया से जुड़ गया इस जुड़ाव की टकराहट से हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ किसी शुभ कार्य में अनुष्ठान के पूर्व "जम्बूदीपे भारत खंडे आर्यावर्ते देशांतर्गते अमुकस्थाने या गांव का नाम शामिल रहता है. जो भारत की पृथ्वी पर स्थिति एवं सुप्त कहानियों का सार है.
इस विशाल भारत के गौरवशाली ऐतिहासिक पुस्तकों में कई ऐसे पन्ने भी है जो आज उपलब्ध नहीं है यह कहानी जो छोटे-छोटे राजाओं की कहानी से प्रारंभ होती थी लेकिन उनका उल्लेख नहीं मिलता यह भी हो सकता है कि इन राजाओं की कहानियों को महत्व नहीं दिया गया लेकिन जब जंगलों पहाड़ों के बीच किसी प्राचीन मंदिर के लिए या विलेन सभ्यता के अंश आज भी दिखाई पड़ते हैं तब उसके प्रति और ज्यादा जानने की जिज्ञासा में हम उसकी तह तक जाने जाने को बाध्य होते हैं जो हमें ग्राम में अंचलों के निवासियों बुजुर्गों एवं मुंह पत्थर की जुबानी प्राप्त होती है इसी तरह की जानकारी सूक्त इतिहास के वेतन है जो हमें पढ़ने के लिए बातें करते हैं इसी तरह न्यू के पत्थरों की आवाज पकड़ने की कोशिश है धवलपुर धरोहर एवं पर्यटन स्थल की एक दास्तान.
चलिए चले पर्यटन के लिए धवलपुर. आज हमारे साथ में इस अंचल के जानकार सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष परमेश्वर सिंह एवं सहयोगी नरेंद्र श्रीवास्तव. हमारी यात्रा मनेन्द्रगढ़ -चिरमिरी- भरतपुर(एम. सी. बी.) जिले के मुख्यालय मनेन्द्रगढ़ से प्रारंभ होकर साउथ झगड़ाखांड (लेदरी) से होते हुए आगे भौता की ओर प्रारंभ होती है. आगे हमें झीमर नाला पुल पार करना पड़ता है . समय के बदलाव मे अब मरवाही तक पहुंचने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत कई पुल बन गए हैं जिससे गांव तक आवागमन सुविधा हो गई है नहीं तो इन गांव तक पहुंचना टेढी खीर था. झीमर नाला पार करते ही छिपछिपी गांव के पहले एक और नाला पड़ता है परमेश्वर सिंह के कहने पर हम अपनी कार इसके पुल को पार करके रोकते हैं . नदी जैसे चौड़े पाट का यह नाला यहां एक और छोटे नाले का संगम है. इस नाले के बीच एक मजबूत इग्नियस चट्टान के ऊपरी हिस्से में बंदूक की नाल की तरह लंबी संरचना को इंगित करते हुए परमेश्वर सिंह जानकारी देते हैं कि किवदंती एवं मान्यता है कि धवलपुर के राजा जब अपने गढ़ी से बाहर किसी लड़ाई मे निकले थे . इसी समय वहीं के एक नाउ ने राजा की मौत की सूचना देकर रानी पर गलत निगाह डाली थी. और अंत मे रानीकुंडी मे रानी ने जलसमाधि ले ली थी. राजा के वापस आने पर जब धटना की सूचना मिली तब राजा इसी जंगल में छिपे नाउ को मारने आए उस समय बंदूक की नली इतनी गरम हो गई थी जिसके निशान आज भी इस पत्थर पर यहां दिखाई पड़ता है. घटनाओं की सत्यता चाहे जो भी हो लेकिन घटना का तारतम्य यदि पुराने राजाओं से जोड़ा जाए तो किवदंतियां इसे धारमल शाही के जमाने से जोड़ती हैं. इस तरह की धटनाओं की कड़ी मे हमें यह भी ध्यान रखना पड़ेगा कि क्या 17वीं सदी मतलब 300 साल पहले जंगल के इस पहाड़ी नाले के तेज बहाव के दौरान यह नष्ट नहीं हुआ होगा या 300 साल पहले क्या इस तरह की बंदूकें उपलब्ध थी. इस तरह के कई अबूझ पहेलियां की कहानी मैं उस नाई के मारे जाने और उसके नाम पर इस नउआ नाले के नामकरण की कहानी के साथ हम आगे बढ़ जाते हैं धवलपुर की ओर. लगभग दस कि.मी. के मील पत्थर तक पहुंचने के बाद भौता गांव तिराहे पर लगे बैरियर से बाएं मुड़कर हम आगे कोड़ा गांव पहुंचते हैं. कोड़ा पुलिस चौकी से आगे लगभग दो किलोमीटर बढ़ने के बाद मुख्य मार्ग के बाईं ओर मील के पत्थर में लिखा हुआ मिलता है धवलपुर 4.3 किलोमीटर. अपनी मंजिल मिलने की खुशी हमारे चेहरे पर प्रसन्नता की मुद्रा में दिखाई देने लगती है. गांव में प्रवेश करने पर हमारी मुलाकात इसी गांव के निवासी शिक्षक ईश्वर सिंह से होती है. नेवरी गांव के शिक्षक ईश्वर सिंह के साथ हम गांव के कंक्रीट की सड़क होते हुए धीरे-धीरे कच्चे रास्ते पर निकल पड़ते हैं. अचानक रास्ता छोड़कर दाहिनी और उंगली दिखाकर ईश्वर सिंह हमें मोड़ते हैं. करीब 100 मीटर कच्चे मार्ग को छोड़कर हम पत्थरों के एक टीले पर जाकर खड़े हो जाते हैं. जिसे लोग गढ़ी बताते हैं गांव के भगवान सिंह एवं बसंत सिंह हमें यहां पहुंचते देखकर अपने पशुओं को चराते हुए यहां पहुंच जाते हैं. एक छोटे से परिचय के बाद बसंत सिंह बताते हैं कि यह पुराने राजा की गढ़ी के पत्थरों के अवशेष है . कहते हैं कि राजा धारमल शाही का परिवार यहां रहा करता था.अलग-अलग तीन-चार स्थान पर इन पत्थरों के ढेर यह जानकारी देते हैं कि यह गढ़ी कई कमरों की विशाल स़रचना रही होगी. पत्थरों पर खुदाई करके की गई कसीदा कारी यह संकेत देती थी कि यहां इसका भव्य द्वार भी रहा होगा. भगवान सिंह चर्चा में बताते हैं कि यहां आप जैसे लोग कभी कभी यहाँ आते हैं . हाँ चुनाव के समय नेताओं का आना-जाना होता है. नहीं तो गांव में कौन आता है भइया. चर्चा करते करते उसने कहा कि एक बार बैकुंठपुर विधायक रामचंद्र सिंह देव (कोरिया राजवंश के पुत्र) अपने सहयोगी नेताओं के साथ यहां आए थे उन्होंने इस गढ़ी के पत्थरों को दिखाकर अपने मित्रों को कहा था यह गढ़ी हमारे पुरखों की वह निशानी हैं जिनके हम वंशज हैं,लेकिन किसी ने इसे आगे बढा़ने हेतु नहीं सोचा.
राजा धारमल शाही की कहानी ऐतिहासिक पन्नों में 17वीं शताब्दी के राजाओं में प्राप्त होती है कोरिया राज्य की स्थापना की लंबी कहानी सरगुजा राज्य के महाराजा के महल के बगावत से उत्पन्न होती है. जिसमें सरगुजा महाराज के राज्य से बाहर जाने के कारण राज्य में उन्हीं की सेना के कुछ सरदारों ने बगावत कर दी और राजमहल को घेर लिया चिंतित रानी को उनके गुप्तचर से सूचना मिली कि चौहान भाइयों की एक टुकड़ी अपनी छोटी सी सेना सहित गांव के तालाब के पास डेरा डाले हुए हैं ऐसी विषम परिस्थितियों में सरगुजा रानी ने क्षत्रिय परिवार की परंपरा के अनुसार एक राखी भेज कर एवं राजमहल की स्थितियों से परिचित कराकर उन्हें अपने राजमहल की रक्षा करने का अनुरोध पत्र भेजा. साही भाइयों ने राखी स्वीकार कर महाराज के राजमहल की बगावती सरदारों से मुक्त कराया और रानी की रक्षा की. इस लड़ाई में कुछ शाही सैनिक भी मारे गए.
पुराने समय में दक्षिण जाने का मार्ग सरगुजा एवं मिर्जापुर से होकर जाता था. उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी मंदिर के धार्मिक यात्रा करके वापस लौटते समय मैनपुरी के चौहान वंशी दो भाई दलथंबन शाही के साथ सरगुजा में पड़ाव डाले हुए थे उनके साथ एक छोटी सी सेना की टुकड़ी थी जो रास्ते में अपनी सुरक्षा के लिए साथ लेकर चलते थे. एक समृद्ध राज्य देखते हुए उन्होंने सुरक्षित स्थान समझकर यहां पड़ाव डाल दिया था. तालाब के किनारे पड़ाव डाले हुए इस शाही परिवार को सरगुजा राजमहल को बचाने का एक मौका मिला . सरगुजा राजा के वापस लौटने पर जब राजा को बगावत एवं शाही बंधु की वीरता की सूचना मिली तब राजा ने उन्हे धन्यवाद देते हुए राज्य के उत्तरी इलाके झिलमिली का एक हिस्सा देकर उन्हें यही बस जाने का प्रस्ताव दिया जिसे बड़े भाई दलथंबन शाही ने इसे स्वीकार कर लिया एवं रेड़ नदी के किनारे कसकेला गांव में अपना पहला निवास स्थान बनाया. रेड़ नदी के दूसरी तरफ की भूमि पर राजा बालेन्द का राज था जो सीधी मड़वास का रहने वाला था इसी राजा बालेन्द द्वारा कुदरगढ़ में पहाड़ी पर मंदिर बनवाया गया था जो आज 350 साल बाद लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है. जंगलों के बीच इस देवी मंदिर को यहां के आदिवासी एवं चौहान राजा के वंशजों के बीच काफी मान्यता है. उसी समय से इस देवी के मंदिर में चली आ रही पशुबली प्रथा चली आ रही है जो उस समय शौर्य का प्रतीक मानी जाती थी. समय के बदलाव के साथ इस बली प्रथा को समाप्त करने की मांग श्रद्धालुओं द्वारा हमेशा की जाती रही है .दलथंबन साही कसकेला गांव में निवास करते हुए धीरे-धीरे अपनी सेना मजबूत कर राजा बालेन्द पर चढ़ाई कर दी और बालेन्द को हराकर उनके राज्य के रेड़ नदी के पार से जुड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया. रानी के भैया होने के कारण यह स्थान आगे भैया स्थान कहलाया. आज भी उनकी पीढ़ियां के लोग यहां भैया बहादुर कहलाते हैं. दलगंजन साही इस क्षेत्र में अपना शासन स्थापित कर चुके थे. कुछ दिनों शांति से रहने के बाद धारमल साही ने एक स्वतंत्र राज्य बनाने की विचार से दक्षिणी क्षेत्र की ओर कूच किया और चिरमी (वर्तमान चिरमिरी) क्षेत्र के कोल राजाओं के ऊपर आक्रमण कर इस स्थान पर अपना कब्जा जमा लिया.
प्राप्त जानकारी के अनुसार 17 वीं सदी से पूर्व कोल राजा और गोंड़ जमीदारों ने अपने संयुक्त सैन्य बल शक्ति से राजा बालेन्द को दक्षिणी कोरिया के क्षेत्र से भगा दिया था और कोल राजाओं ने यही 11वीं पीढ़ी तक राज्य किया. कोरियागढ़ की पहाड़ी पर उनकी राजधानी थी जहाँ आज भी उनके गढ़ी के भग्नावशेष प्राप्त होते हैं यहां पर एक बावली भी है. कुछ लोगों के मतानुसार उनकी राजधानी कुछ दिनों बचरा पोंड़ी में भी रही है यहीं पर एक मिट्टी का टीले को लोग कोल राजाओं का निवास बतलाले है . इन्हीं कोल राजाओं से संधर्ष के दौरान तत्कालीन भीषण जंगलों पहाड़ों के स्थान पर रहते हुए राजा धारमल साही धवलपुर जा पहुंचे, जो हसदो नदी के किनारे था तथा यहां से आसपास निगरानी रखी जा सकती थी. इसी के पास छिपीछिपी गांव भी था जो सेना के छिपने के काम आता था. यहां से राज्य के चारों तरफ सुरक्षा व्यवस्था बनाने के लिए अनुकूल स्थान था. अतः धारमल साही ने धवलपुर में अपने निवास के लिए पत्थरों की एक गढ़ी बनवाई जिसके भग्नावशेष पत्थर आज भी धवलपुर में दिखाई देते हैं. इसी के आगे पानी की व्यवस्था के लिए एक पड़ा तालाब भी बनवाया गया था जिसमें कुछ स्रोतों से पानी आता था एवं पर बरसात का पानी भी इकट्ठा होता था. गढ़ी एवं तालाब के रास्ते के बीच एक चौकोर पत्थर से बंधी 4 फुट लंबी चौड़ी एवं 10 फीट गहरी संरचना दिखाई पड़ती है इस तरह के और संरचनाओं की बात कही गई है जो मिट्टी से पट गई है लेकिन एक स्थल आज भी यहां दिखाई देता है. ग्रामीणों का कहना है कि यह एक कुआँ है लेकिन इतनी छोटी संरचना कुआँ कहना उचित प्रतीत नहीं होता . भगवान सिंह ने बताया की कुछ दिन पहले यहां नीचे कोई खजाना होगा ऐसा सोचकर कुछ चोरों ने इसकी खुदाई की. लेकिन सुबह जानकारी मिलने पर देखा गया कि खुदाई के बाद 25-20 फीट नीचे लोहे की जंजीरों से यह स्थान ढका हुआ मिला. जिसे चोर तोड़ नहीं सके. इस प्रकार मजबूत जंजीर मिलने से ऐसा प्रतीत होता है की सुरक्षा की दृष्टि से राज परिवार की महिलाओं को तालाब तक आने जाने का यह सुरंग मार्ग की हो सकता है जिसमें हवा के प्रबंध के लिए इस तरह के छोटे-छोटे खिड़की नुमास्थल बनाए गए थे. यह संरचना इस गढ़ी के अवशेष के कुल प्रश्नों के उन पन्नों को इंगित करती है कि -
* क्या इस घड़ी के नीचे कुछ गुप्त सुरंग द्वारा थे जो उनकी सुरक्षा से जुड़े हुए थे .
* उसे समय गढ़ी बनाने के लिए पत्थरों की जोड़ाई कैसे की जाती थी.
* 300 वर्ष पहले इस बियाबान जंगल में कौन सी सभ्यता एवं परिवार यहां रहते थे यह तय है कि राजा की गढ़ी के आसपास संपन्न परिवारों की बस्तियां भी रही होगी वे कहां गई।
* क्या इस गढ़ी के नीचे से कोई रास्ता इस तालाब या झील तक जाता था.
*क्या आसपास के क्षेत्र में ्स्थित रानीकुंडी, छिपछिपी एवं चिरमिरी के रानी सती मंदिर के बीच इस गढ़ी का कोई संबंध है.
इन सभी स्थानों पर प्राप्त पत्थरों की एकरूपता कोई कहानी जोड़ती है. इस तरह के कई प्रश्न के उत्तर और वास्तविकताओं की परतें इससे जुड़े शोध संस्थान आगे आकर कर पाएंगे. आज इस स्थान पर उनके बारे में जानने की पहल भारतीय सर्वेक्षण विभाग या छत्तीसगढ़ पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग को करनी होगी अन्यथा इस धरोहर के आसपास की भूमि में अब गांव वालों द्वारा कब्जा किया जा रहा है. गढ़ी के नक्काशी दार पत्थर लोग अपने घरों में या मंदिरों एवं कुआँ के पास कपड़ा धोने के लिए उपयोग कर रहे हैं.
गांव के बाहरी हिस्से में इस गांव की बहुल आदिवासी जनजाति के द्वारा एक बूढ़ादेव का मंदिर और कंकाली काली माता का मंदिर निर्माण कर लोगों में आस्था एवं रचनात्मक जीवन की यात्रा का संदेश देने का प्रयास किया गया है. मानव स्वभाव अपनी भक्ति के माध्यम से अपनी इच्छाओं को ईश्वर के सामने व्यक्त करता है यह मंदिर भी लोगों को सही मार्ग पर चलने का एक माध्यम है. इतिहास के पन्ने में कैद इस धारमल साही की गढ़ी के लिए स्थानीय प्रयासों में ग्रामीणों से चर्चा के दौरान हमारे द्वारा कुछ सुझाव दिए गए हैं कि ग्राम पंचायत द्वारा एक बोर्ड लगाया जाए जिसमें 300 साल पुराने राजा ""धारमल शाही की गढ़ी" लिखा हो एवं यहां तक पहुंचाने के लिए रास्ता बनाया जाए जो बारहमासी पहुंच के योग्य हो. इसके विकास के लिए जिलाधीश एवं कलेक्टर को इस स्थल के विकास एवं पुरातात्विक खोज के लिए एक पत्र लिखा जाए जिसमें छत्तीसगढ़ पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के सहयोग से इसे संरक्षित करने तथा पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का प्रयास किया जाए.
वापस लौटते हुए जब हम तालाब के पास पहुंचे तब इसी तालाब के सामने इसके जीर्णोद्धार के लिए के लिए लगभग एक करोड़ खर्च करने की योजना का बोर्ड दिखाई पड़ा. लेकिन तालाब की इतनी बड़ी योजना का उपयोग लगभग शून्य है एक करोड़ खर्च करने के बाद भी यदि मछली पालन की बड़ी योजनाएं भी गांव को समृद्धि के रास्ते नहीं दे सकी हैं. ऐसी योजनाओं के क्रियान्वयन को देखकर शासन की योजनाओं पर कई प्रश्न चिन्ह लगते हैं जिनके समाधान के रास्ते स्थानीय पंचायत से होकर निगरानी करने वाली जनपद पंचायत एवं शासकीय इकाइयों के कार्य प्रणाली पर उंगली उठाती है.
धवलपुर पहुंचने के लिए आपको मनेन्द्रगढ़ से लेदरी होते हुए भौता से मुड़कर कोड़ा तक पहुंचना होगा. यही से 2 किलोमीटर आगे मुख्य मार्ग पर धवलपुर गांव का मील का पत्थर दिखाई पड़ता है कोरिया जिले के बैकुंठपुर से खड़गवां के रास्ते देवाडांड़ पहुंचकर भौता रास्ते में कोड़ा पुलिस चौकी से पहले धवलपुर पहुंचा जा सकता है. बैकुंठपुर से यह लगभग 45 किलोमीटर दूर होगा एमसीबी जिले का यह पर्यटन केंद्र हमें हमारे ऐतिहासिक पक्षों से जोड़ते हैं. जो मानव जीवन की सभ्यता एवं संघर्ष की ऐसी घटनाएं कहते है जिसे जानने की हमें जरूरत है जिज्ञासा एवं शोध परक इस गढ़ी को देखने आप अपने परिवार के साथ एक बार जरूर जाएं और राजाओं के ऐसे संघर्ष से जुड़ी हमारी सभ्यता के पूर्वजों की कहानियों के उस अंश से परिचित हो , जो आज हमारे लिए आज भी गौरवशाली विषय है.
बस इतना ही फिर मिलेंगे -
पर्यटन के किसी अगले पड़ाव पर .....
: आध्यात्मिक आस्था का समंदर है "खडगवां का महामाया मंदिर"
Sun, Apr 21, 2024
अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय है यह विशाल ब्रह्मांड, जिसमें अनगिनत तारामंडल अपने-अपने ग्रहों के साथ विचरण करते रहते हैं. सबका एक निश्चित परिपथ है इस परिपथ से भटकने वाला तारा अपना अस्तित्व समाप्त कर इसी ब्रह्मांड में विलीन हो जाता है या कोई नया नाम ग्रहण कर लेता है. इसी ब्रह्मांड में हमारा सूर्य और सौरमंडल भी है जिसमें मनुष्य सहित कई जीव जंतु की उत्पत्ति होती हैं, लेकिन ब्रह्म और ब्रह्मांड का नियम हम पर भी लागू होता है कि अपने परिपथ को न छोड़ें अन्यथा हम भी उसी विशाल तारे की तरह नष्ट हो जाएंगे.
आध्यात्मिक संत महात्माओं के ज्ञान के अनुसार वर्तमान परिवेश में जब हम भौतिकवादी युग में धन यश कमाने में एक दूसरे को पीछे धकेलने की प्रतिस्पर्धा में तल्लीन दिखाई पड़ते हैं जो हमारे वास्तविक जीवन का उद्देश्य नहीं है. जीवन को जीने के उद्देश्य परक ज्ञान को प्राप्त करने की विधा हमें अध्यात्म में मिलती है. अध्यात्म जीने की एक ऐसी विधा है जिसमें जियो और जीने दो की शक्ति कार्य करती है. आपके व्यवहार में करुणा और सत्य दोनों होना चाहिए. ईर्ष्या प्रलोभन से दूर स्वयं के साथ दूसरों की प्रगति में खुशी महसूस करना ही अध्यात्म की प्रथम सीढ़ी है. अध्यात्म ही जीवन में प्रेम शांति खुशी और विवेक की शक्ति प्रदान करता है. हम सर्वव्यापी इस परमात्मा के अंश है जो ब्रह्म के अंदर समाहित है जिसका कोई स्पष्ट रूप नहीं है किंतु वह इस ब्रह्मांड और प्रकृति का नियंता भी है उत्तरोत्तर विकास के आगले चरण में हमें ज्ञान होता है कि हम देह नहीं मन नहीं बल्कि आत्मा है यह उसी परमात्मा का अंश है जो ब्रम्ह और ब्रम्हांड का नियंता है. आध्यात्मिक ज्ञान हमें पतन की ओर जाने से रोकता है.
आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य के अंदर जो अंधकार उत्पन्न हो गया है उसे अध्यात्म के प्रकाश से ही दूर किया जा सकता है . मंदिरों एवं गुरु शक्ति के समीप पहुंचने का प्रयास भौतिकवादी जीवन से आध्यात्मिक जीवन में जाने का प्रथम चरण है. जब हम अपने भौतिक सुखों से विरक्त होने लगते हैं एवं जब आर्थिक संसार की ऊंचाईयाँ भी हमे शांति नहीं देती तब अध्यात्म के केंद्र, शक्ति स्थल मंदिर हमें एक शांति प्रदान करते हैं. दूसरी ओर सामान्य जन की भाषा में जब इसी पृथ्वी के जीव मनुष्य का एक वर्ग असफलता एवं निराशा के दौर से गुजरता है तब इन्हीं आध्यात्मिक शक्ति स्थल मंदिर में स्थापित मूर्ति को ब्रह्मांड की चेतना का अंश मानते हुए हम उनकी शरण में चले जाते हैं. यही शक्ति केंद्र हमें स्वयं की आत्मा से परिचित कराते हैं आध्यात्मिक शांति का हम अनुभव प्राप्त करते हैं. मंदिर और शक्ति केंद्र हमें नकारात्मकता की बजाय सकारात्मक प्रयास के लिए प्रेरित करते हैं . यही सकारात्मक भाव हमारे जीवन की दिशा तय करते हैं इसी दिशा परिवर्तन को हम ईश्वर, महामाया या शक्ति केंद्र का आशीर्वाद मानते हैं जिसके बल पर हमारे जीवन की सफलता की आगामी यात्रा तय होती है.
शक्ति स्थल की चर्चा में आईए आज चलते हैं छत्तीसगढ़ के 32 में जिले मनेन्द्रगढ़- चिरमिरी - भरतपुर के आखिरी छोर में बसे खडगवां विकासखंड के चनवारीडांड़ ग्राम में स्थित महामाया देवी के मंदिर की ओर, जो समय के अनुसार आध्यात्मिक आस्था का समंदर बनता जा रहा है. आदिवासी जनजाति के हजारों परिवारों से परिपूर्ण यह अंचल अपनी आदिवासी संस्कृति के गौरवपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों से परिपूर्ण है. आसपास के गांव में आदिवासी राजाओं के कई किस्से आज भी पुरखों की जुबानी सुनी जा सकती है. राजगोंड़ परिवार के लोग आज भी उनके वंशज कहलाने पर गर्व का अनुभव करते हैं. इस अंचल के धवलपुर, खडगवां, रानी कुंडी जैसे कई पर्यटन स्थल है जो इन राजाओं की कहानियों से जुड़े हुए हैं और कई किस्से आज किवदंतियों के रूप में प्रचलित है. जो आदिवासी गौरव की किस्सागोई के रूप में लोगों के द्वारा आज भी याद की जाती है. गोंड राजाओं के राज्यों के कई किस्सों के बीच खड़गवां ब्लॉक जो सैकड़ों वर्ष पूर्व से आदिवासी जमीदारों की निवास स्थल रही है. नए जिले मने- चिर- भरतपुर जिले की सीमाएं इसी खड़गवां विकास खंड से बिलासपुर और कोरबा जिले तक फैली हुई है. यहां के चनवारी डांड ग्राम में गोंड राजाओं के समय काल से ही जमींदारी चली आ रही है. यहां के जमीदार स्वर्गीय उदित नारायण सिंह का राज निवास यहां खडगवां में था जहां पर उन्होंने अपने क्षेत्र की सुख समृद्धि के लिए महामाया देवी के पूजा स्थल की स्थापना की थी. जो उनकी कुलदेवी के रूप में मान्यता प्राप्त है. लेकिन समय के बदलाव के साथ राजाओं के राज्य और जमीदारों की जमींदारियाँ समाप्त हो गई. परिवार बिखर गए. तब ऐसे मंदिरों के शक्ति स्थल धीरे-धीरे आम जनमानस की आस्थाओं से जुड़ते चले गए. अपनी आध्यात्मिक आस्था के साथ जो भी इस महामाया मंदिर तक शांति के लिए या अपनी मनोकामनाओं के लिए पहुंचा इस ग्रामीण परिवेश में मां जगदंबा ने उसके भीतरी शक्ति को जागृत करने का अवसर दिया और यही आशीर्वाद के रूप में हमारे द्वारा किए गए कार्यों के क्रियान्वयन एवं सफलता का कारण बनी . इसी आशीर्वाद एवं पण्य प्रताप की चर्चा से इस महामाया मंदिर की कीर्ति आसपास के गांव शहर और पूरे छत्तीसगढ़ में फैल गई. लोगों का आध्यात्मिक आस्था के साथ खडगवां के चनवारी डांड में स्थित इस महामाया मंदिर में लोगो का आवागमन बढ़ते बढ़ते यह स्थल आज आस्था का एक विशाल समंदर बन चुका है.
चनवारीडांड़ गांव में इस मंदिर की स्थापना की भी अपनी एक कहानी है. खड़गवां के पुराने निवासी राजेश्वर श्रीवास्तव के पुत्र अनिल श्रीवास्तव एवं महामाया मंदिर कमेटी के सचिव आर बी श्रीवास्तव ( राम बाबू श्रीवास्तव) से प्राप्त जानकारी के अनुसार पूर्वजों एवं किवदंतियों के अनुसार यह महामाया देवी की मूर्ति रतनपुर महामाया स्थल से पूर्व विधायक चंद्र प्रताप सिंह के परदादा स्व. र्देवनारायण सिंह के पुत्र स्वर्गीय उदित नारायण सिंह द्वारा लगभग सौ साल पहले लाई गई थी. उस समय आवागमन हेतु घोड़े, बैलगाड़ी भैसागाड़ी जैसे साधन ही उपलब्ध थे. अतः यह मूर्ति भी बैलगाड़ी मैं लादकर खड़गवां में स्थापित करने के विचार से लाई गई, लेकिन रतनपुर से आते समय उन दिनों कच्चे रास्ते पर चलती बैलगाड़ी उबड़ खाबड़ रास्ते से गुजरती हुई चनवारी डांड के इस स्थान तक पहुंच कर कीचड़ भरे रास्ते में फँस गई. तालाब का किनारा होने के कारण यह रास्ता कीचड़ भरा कच्चा रास्ता था जिसमें मूर्ति से लदी यह बैलगाड़ी ज्यादा धँस गई. जिसे ग्रामीणों के प्रयास से निकालने की कोशिश की गई लेकिन बैलगाड़ी को ना तो बैल खींच पाए और ना ही आदमी उसे निकाल पाए, ऐसी स्थिति में मूर्ति को नीचे उतार कर कर तालाब के एक ऊंचे स्थान पर रख दिया गया. जिसे दूसरे दिन फिर से उठाकर खड़गवां ले जाना तय किया गया, किंतु रात को जमीदार स्वर्गीय उदित नारायण जी को देवी जी ने उनके स्वप्न में प्रकट होकर कहा कि मुझे इस स्थान पर ही स्थापित कर दो यह एक सिद्ध स्थल है . कहीं और ले जाने का प्रयास मत करो. देवी की यह मनसा को आशीर्वाद और आदेश मानते हुए उदित नारायण जी ने मां महामाया को आम के पेड़ के नीचे स्थापित कर दिया जो आज भी अपने स्थान पर स्थापित है.
सुरगुंजा का यह इलाका हाथियों के चिंघाड़ और चहलकदमी का विशाल भ्रमण का क्षेत्र था. जहां हाथियों के चिंघाड़ से यह क्षेत्र गुंजायमान हुआ करते थे. झुंड के झुंड हाथी यहाँ आया जाया करते थे. ऐसा माना जाता है कि गज भ्रमण के समय इसी तालाब में पानी पीने वाले हाथियों के चहल कदमी से देवी जी का ऊपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था जिसे चांदी से मढ़कर ठीक किया गया. काफी प्रयास के बाद इंदौर से सुप्रसिद्ध मूर्तिकार शर्मा जी द्वारा लगभग 30 किलो चांदी से इस मूर्ति का नवनिर्माण किया गया.
संत महात्माओं के चरणधूलि से लगातार तृप्त होती महामाया देवी के आध्यात्मिक स्थल की कीर्ति छत्तीसगढ़ संस्कृति एवं पर्यटन विभाग रायपुर तक पहुंची. जिसे वर्तमान समय में मान्यता प्राप्त पर्यटन स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया गया है जो इसकी गरिमा को बढ़ाती है एवं छत्तीसगढ़ के मुख्यालय रायपुर से चनवारीडांड़ के पर्यटन परिपथ में इस शक्ति केंद्र को जोड़ती है जो आस्थावान लोगों को इस मंदिर की ओर अधिक जानकारी के साथ आकर्षित करने का एक सशक्त माध्यम बन गई है.
जानकारी के अनुसार विगत चार दशक से इस महामाया मंदिर से जुड़े मंदिर कमेटी सचिव आर बी श्रीवास्तव से चर्चा में पता चला कि पहले यहां केवल महामाया देवी का मंदिर था जहां नवरात्रि में नौ दिवसीय अखंड आस्था एवं मनौति ज्योति कलश का दीपक जलाया जाता था. धीरे-धीरे इस ज्योति की आस्था में बढ़ोतरी होने लगी अतः एक बड़े हाल की आवश्यकता महसूस हुई जिसे विस्तार देकर अब बड़ा बना दिया गया है वर्तमान में यहां पर लगभग 3000 ज्योति जलाई जा रही है. देवी भक्ति की साधना से जुड़े यहीं पर एक भैरवनाथ का मंदिर भी बनाया गया है. इसी मंदिर के पीछे वह तालाब है जहां बैलगाड़ी फंसी थी. अब उसे बांधकर बड़ा बना दिया गया है. यहां देवी मंदिर में आस्था के अनुसार धागा बांधकर या नारियल चढ़ाकर लोग अपनी मनौती मांगते हैं.
महामाया मंदिर के मुख्यद्वार के निर्माण का आकर्षण पहुंचने वाले आस्थावान लोगों को दूर से ही आकर्षित करता है. एक एकड़ परिसर में फैली इस मंदिर में प्रवेश करने पर सामने महामाया देवी का मंदिर दिखाई पड़ता है . आस्था के सैलाब को नियंत्रित करने के लिए पाइप की रेलिंग लगा दी गई है ताकि दर्शनार्थी एक साइड से जाकर देवी की पूजा अर्चना के पश्चात दूसरी ओर बनी हुई रेलिंग पाइप से आगे की ओर बढ़ सके और अव्यवस्था ना हो. लोग अपनी पूजा अर्चना के बाद आगे ज्योति कलश कक्ष एवं हनुमान मंदिर और राम दरबार तथा भोलेनाथ के मंदिर के भी दर्शन के लिए यही से आगे बढ़ते हैं. इस मंदिर के सामने टीन सेड का एक छायादार स्थल बना दिया गया है ताकि लोग यहां बैठकर अपनी आस्था के अनुसार सत्यनारायण कथा या अन्य पूजन कार्य ब्राह्मण की उपस्थिति में यज्ञ हवन के साथ पूर्ण कर सकें . लंबी दूरी से आए हुए यात्री यहां कुछ देर के लिए शांति के साथ आंखें मूंदे चिंतन ध्यान करते हुए नजर आते हैं. भजन कीर्तन के लिए भी यह स्थल भजन मंडली के लिए उपलब्ध होता है। यहां कई नई जोडे़ अपने दाम्पत्यजीवन की शुरुआत करने विवाह संस्कार के लिए भी आते हैं उनकाविवाह कार्य भी यहां संपन्न कराया जाता हैं. कम खर्च में दो परिवारों को आपस में विवाह संस्कार से जोड़ने का यह कार्य मां महामाया के समक्ष उनके साक्ष्य एवं आशीर्वाद में संपन्न होता है.
मंदिर के विशाल परिसर में दाहिनी ओर भव्य हनुमान मंदिर एवं भोलेबाबा का शिव मंदिर का निर्माण इस मंदिर का आकर्षण है. जिसका गुंबज दूर से ही दिखाई पड़ता है. मंदिर निर्माण की चर्चा के दौरान आर बी श्रीवास्तव एक गहरी सांस लेकर कहते हैं कि मंदिरों का निर्माण कोई साल दो साल के समय में नहीं बल्कि एक लंबा ऐतिहासिक कार्यकाल होता है. जिसमें हजारों लोगों की भावनाएं जुड़ी रहती है. मंदिर निर्माण के लिए आस्था चिंतन और सहयोग के साथ-साथ धैर्य की आवश्यकता होती है. यह भी तय है कि ईश्वर की मर्जी के बिना किसी भी मंदिर का निर्माण नहीं किया जा सकता. समय और काल के पन्नो के अनुसार कई मंदिर निर्माण धैर्य के अभाव मे आधे अधूरे रह जाते हैं लेकिन जहां पर सहयोग एवं आस्था धैर्य के साथ प्रारंभ होता है या जिसे पूरा करने का मन बना लिया जाता है वह कार्य ईश्वर स्वयं पूरा करते हैं. दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर के प्रति जनमानस की बढ़ती आस्था को ध्यान में रखकर जब भव्य हनुमान मंदिर का निर्माण का विचार इस कमेटी के मन में आया तब 12 फरवरी 2003 को मंदिर के निर्माण हेतु पूजा पाठ कर मंदिर की नींव डाली गई. समय के अनुसार समय बितता गया और आज 21 वर्ष जब इस मंदिर को बीत चुके हैं तब हमें ऐसा लगता है कि यह कल की ही बात है. विगत 22 फरवरी 2023 को त्रिदिवसीय अनुष्ठान के साथ ही इस भव्य मंदिर में दक्षिण मुखी मारुति नंदन हनुमान जी की प्राण प्रतिष्ठा की गई. इसी के पास राम दरबार मंदिर एवं भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग मंदिर भी स्थापित हैजिसमे आदि देव भगवान गणेश जी के साथ मां पार्वती और कार्तिकेय विराजमान हैं. इस मंदिर के परिसर में पहुंचते साथ ही एक आध्यात्मिक शांति महसूस होती है यही कारण है कि यहां कई श्रद्धालु आंखें मूंदे शांति के साथ उपासना में मंत्र मुग्ध बैठे दिखाई देते हैं. स्वच्छ एवं साफ सुथरे परिवेश का यह वातावरण आपको अध्यात्म के साथ जोड़ता है इसी हनुमान मंदिर के पास संत महात्माओं के विश्राम स्थल की व्यवस्था भी की गई है ताकि किसी संत महात्माओं के आने पर उनका समुचित स्वागत किया जा सके और प्रवास के लिए उन्हें एक उचित स्थान दिया जा सके.
ज्ञान एवं आस्था का केंद्र महामाया मंदिर मनेन्द्रगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर एवं चिरमिरी से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित है. इस मंदिर तक पहुंचाने के लिए कई रास्ते हैं जो मनेन्द्रगढ़ मुख्यालय पहुंचकर या बैकुंठपुर पहुंचकर भी यहां पहुंचा जा सकता है. हवाई मार्ग के लिए बिलासपुर एवं रायपुर तो हवाई मार्ग उपलब्ध है जहां से यहां तक की यात्रा की जा सकती है बहुत जल्द ही अंबिकापुर से भी हवाई यात्रा के सुविधा प्राप्त होने की संभावना है मनेन्द्रगढ़ से अपनी कार या टैक्सी से सीधे महामाया मंदिर चनवारी डांड़ पहुंचने के लिए मनेन्द्रगढ़ से लेदरी होते हुए भौता मार्ग से यात्रा करनी होगी और भौता से बायें मुड़कर देवाडांड़ के रास्ते में कोड़ा गांव होते हुए आगे बढ़ना होगा कोड़ा गांव के मुख्य मार्ग में स्थित पुलिस चौकी आपके लिए सहयोगी सिद्ध हो सकती है . देवाडांड़ के तिराहे पर पहुंचने के बाद बांयें ओर मुड़कर खड़गवां रोड पर आगे बढ़ते हुए चनवारी डांड़ मंदिर तक पहुंचा जा सकता है. मुख्य मार्ग सेखड़गवां पहुंचने से पहले चनवारी डांड़ ग्राम के पहुंचने पर मुख्य मार्ग से ही मंदिर का भव्य द्वारा आपका स्वागत करता हुआ दिखाई पड़ता है.
जहां जीवन में जीवन जीने के सभी रास्ते बंद हो जाते हैं तब इस तरह के शक्ति स्थल हमें नया मार्ग दिखलाते हैं. यही कारण है कि विज्ञान एवं कला के विभिन्न श्रेष्ठ संस्थाओं से शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात भी आइई आइई टी जैसे संस्थान के विद्वान छात्र भी आध्यात्मिक रंग में रंगे हुए दिखाई पड़ते हैं. वृंदावन की गलियों में गेरुआ वस्त्र धारण किये ऐसे कई विद्वान युवक नई आध्यात्मिक चेतना के साथ आपको भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन मिल जाएंगे. आध्यात्मिक आस्था के समंदर इस महामाया मंदिर में आप भी सपरिवार आकर आध्यात्मिक शांति के वातावरण में आत्मिक शांति महसूस कर सकते हैं तथा बच्चों एवं नवयुवकों को हिंदू धर्म की आस्था के शक्ति स्थल एवं उनकी आध्यात्मिक परंपराओं से जोड़ने का पुनीत कार्य कर सकते हैं. हमारे हिंदू मान्यताओं के अनुसार उनकी संस्कृति में बसे ईश्वर एवं आस्थाओं के नए-नए केंद्र जोड़ने से अपनी सांस्कृतिक विरासत से जहां बच्चे परिचित होते हैं वही उन्हें आध्यात्मिक पड़ाव के जरिये जीवन जीने का एक नया अनुभव
प्राप्त होता है हमारा अनुरोध है कि एक बार जरूर
चनवारी डांड़ महामाया मंदिर के दर्शन करें और मां महामाया का आशीर्वाद प्राप्त कर जीवन को धन्य बनाए.
बस इतना ही
फिर मिलेंगे किसी अगले पर्यटन पर-