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श्रेय लेने की होड़ में समन्वय गायब : _धान तस्करी पर कार्रवाई या विभागीय टकराव? जब्ती के बाद सुपुर्दनामा बना जंग का मैदान

Praveen Nishee Tue, Dec 16, 2025

अमलीपदर। गरियाबंद। समर्थन मूल्य पर धान खरीदी शुरू होते ही उड़ीसा–छत्तीसगढ़ सीमा पर धान तस्करी ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली है। प्रशासन की ओर से नाके, जांच और सख्ती के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों को खुली चुनौती देती नजर आ रही है। जंगलों, घाटियों और कच्चे पहाड़ी रास्तों से रोज़ाना धान की आवाजाही जारी है। सवाल यह नहीं कि कितनी जब्ती हुई, असली सवाल यह है कि जब हर रास्ते पर निगरानी का दावा है, तो तस्करी रुक क्यों नहीं रही?

बीती रात कसेरसील गांव में सामने आया मामला पूरे सिस्टम पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। पत्रकारों की सूचना पर मौके पर पहुंचे मंडी विभाग के सचिव ने अपनी टीम के साथ लगभग 100 पैकेट लावारिस धान जब्त किया। दुर्गम पहाड़ी रास्तों से पिकअप वाहन के जरिए धान नीचे लाया गया और मंडी अधिनियम के तहत एक रजिस्टर्ड व्यापारी के यहां सुरक्षित डंप कराने की वैधानिक प्रक्रिया शुरू की गई। यह कार्रवाई दर्शाती है कि इच्छाशक्ति हो तो जोखिम उठाकर भी ज़मीन पर प्रभावी कार्रवाई संभव है।

लेकिन यहीं से मामला विभागीय समन्वय के बजाय आपसी टकराव में बदल गया। घाटी से नीचे उतरते समय पुलिस और राजस्व विभाग ने उसी पिकअप वाहन को रोक लिया और वाहन को थाने ले जाने की ज़िद पकड़ ली। मंडी सचिव दिनेश कुमार बंजारे द्वारा बार-बार यह स्पष्ट करने के बावजूद कि धान की जब्ती पूरी तरह वैधानिक प्रक्रिया के तहत हुई है और हम इसे अपने रजिस्टर व्यापारी के पास सुपुर्द नामा करने जा रहे हैं । फिर भी पुलिस कर्मियों की जीद मंडी विभागों का सर दर्द बन गया ।

हैरानी की बात यह रही कि सूचना देने वाले पत्रकारों पर ही तस्करी कराने का संदेह जताया गया। सवाल उठाने और सूचना देने वाले ही शक के घेरे में आ गए।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब थाना प्रभारी द्वारा तहसीलदार को पूरे जब्ती प्रकरण की विशेष जांच कर, कार्रवाई के समय मौजूद सभी लोगों के खिलाफ धारा 420 जैसी गंभीर धाराएं लगाने की बात कही गई। जबकि तथ्य बिल्कुल साफ हैं—सूचना पत्रकारों ने दी, कार्रवाई मंडी विभाग ने की और धान सरकारी रिकॉर्ड में जब्त किया गया।

इसके बावजूद तस्करों तक पहुंचने के बजाय सवाल पूछने वालों को कटघरे में खड़ा कर खोजी पत्रकारिता का मनोबल तोड़ने का प्रयास किया गया। राजस्व विभाग को बार-बार सूचना देने के बावजूद किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई, जबकि मंडी विभाग को एक बार सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचकर जोखिम भरी कार्रवाई करनी पड़ी। इसके बाद उन्हीं अधिकारियों और मीडिया कर्मियों के साथ जो व्यवहार किया गया, वह न केवल मीडिया का मनोबल गिराने वाला है, बल्कि धान तस्करी पर कार्रवाई करने वाले ईमानदार अधिकारियों को भी हतोत्साहित करता है।

इस संबंध में जब हमने एसडीएम मैनपुर तुलसीदास मरकाम से चर्चा की तो उनका कहना था " मंडी सचिव पूरे जिले में कहीं पर भी कार्रवाई करने के लिए अधिकृत है और मंडी अधिनियम के तहत कार्रवाई करने व सुपुर्द नामा कर सकते हैं । धान तस्करों के खिलाफ कार्यवाही करने वाले अफसर के साथ अगर अन्य विभाग के कर्मचारियों के द्वारा दुर्व्यवहार किया जाता है तो यह पुलिस,राजस्व और मंडी विभाग के आपसी ताल मेल का कमी ही माना जाएगा "

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब नाके, गश्त और निगरानी के दावे मौजूद हैं, तो धान रोज़ सीमा पार कैसे पहुंच रहा है? क्या जंगलों के अवैध रास्तों पर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं, या फिर विभाग आपसी समन्वय के बजाय श्रेय लेने की होड़ में उलझे हुए हैं?

धान तस्करी पर प्रभावी रोक के लिए केवल कार्रवाई का दिखावा नहीं, बल्कि पुलिस, राजस्व और मंडी विभाग के बीच ईमानदार और स्पष्ट तालमेल ज़रूरी है। जब तक मीडिया को सहयोगी नहीं, बल्कि संदेह की नजर से देखा जाता रहेगा, तब तक तस्कर, तस्करी के नए-नए रास्ते बनाते रहेंगे और सच्चाई सामने लाने वाले सवालों के घेरे में खड़े होते रहेंगे।

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