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बीरेन्द्र श्रीवास्तव की कलम से....पर्यावरण एवं पर्यटन अंक - 42 : गुफाओं की सभ्यता की मूक गवाह है  "आदिशक्ति गांगीरानी मंदिर"

Praveen Nishee Sun, Jan 4, 2026

                           मानव और गुफाओं का संबंध मानव की उत्पत्ति के साथ-साथ रहा है।  जब पशुओं की तरह आदिमानव जंगलों में भटकते रहते थे उस समय अपनी सुरक्षा के लिए जंगली जानवरों की तरह मानव ने भी अपना आश्रय स्थल गुफाओं को बनाया।  यह गुफाए पहाड़ों के बीच पत्थरों के बनावट एवं कटाव से प्राकृतिक रूप से बन गए थे।  इसमें रहते हुए मानव सुरक्षा के साथ-साथ आपसी सहभागिता एवं समूह में रहने कुछ शुरूआत की। अपने ज्ञान और अनुभव को आपस में उन्होंने बांटना शुरू किया । ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार  मानव द्वारा 6000 ईसा पूर्व से ही गुफाओं के उपयोग की जानकारी  मिलती है। जब मानव के पास कोई भाषा नहीं थी तब मानव ने चित्रों को अपने भाव की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया जो समय के बदलाव में भित्ति चित्र के रूप में जाने गए।  आज भी यह भित्ति चित्र आदिमानव की सभ्यता और उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ-साथ समय काल की घटनाओं का चित्रण करते हैं। छत्तीसगढ़ की विविध जैव विविधताओं से भरे जंगलों पहाड़ों में एक समृद्ध गुफाओं और भित्ति चित्र का वर्णन मिलता है जिसमें कोरिया एवं मनेन्द्रगढ़- चिर. - भरतपुर जिले के जनकपुर मार्ग में बहरासी ग्राम के पास भवरखोह पहाड़ मैं कोहबउर एवं तितौलीगढ़ पहाड़ पर घोड़सार भित्ति चित्र मानव सभ्यता के ज्ञान अनुभव एवं भावनाओं की चित्रों में अभिव्यक्ति को प्रस्तुत करते हैं।  समय काल के अनुसार जैसे-जैसे मानव सभ्यता बढ़ती गई वैसे-वैसे इन चित्रों में भी बदलाव हुआ है। उत्तरी छत्तीसगढ़ के उदयपुर (अंबिकापुर)  की पहाड़ियों में ईसा पुर्व के समय काल की पाली भाषा में उत्तीर्ण पंक्तियां एवं भित्ति चित्र उकेरे गए हैं जिसमें बैल, हिरण, मानव आकृतियां एवं हाथ के पंजे दिखाई पड़ते हैं।

                            समय के बदलाव में जब मानव एक स्थान से दूसरे स्थान पर आने-जाने लगा तब उसे रूकने एवं कुछ समय गुजारने के लिए भी सुरक्षित आश्रय की आवश्यकता महसूस हुई और स्थान विशेष पर प्राकृतिक गुफाएं नहीं मिलने पर मानव द्वारा भी कुछ गुफाओं का निर्माण किया गया।  इन्हीं गुफाओं में रहकर जंगलों में पाए जाने वाले फल फूल से अपना जीवन यापन करने का नया साधन बना।  यह मानव निर्मित गुफाएं भी हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति एवं सभ्यता की  कहानी अपने अंतस  में दबा रखी है। इसे कब बनाया गया कौन बनाया जैसे प्रश्नों के साथ उसे समय की आवश्यकता एवं कितने समय में बनाई गई , जैसे प्रश्न आज भी किवदंतियों एवं पत्थरों की बनावट के वैज्ञानिक  प्रमाण के खोज के लिए  हमारी ओर देख रहे हैं ।

                             उत्तरी छत्तीसगढ़ के पहाड़ों और कंदराओं में जहां कई प्रसिद्ध गुफाओं का नाम आता है उसमें बनवासी राम के वन गमन मार्ग के शोधकर्ता मन्नुलाल यदु के अनुसार एमसीबी  जिले का पश्चिमी प्रवेश द्वार जनकपुर  बनवासी भगवान राम का दंडकारण्य में आने का मार्ग रहा है। यहां पर मवई नदी के तट पर सीतामढ़ी हरचौका में बनी गुफाएं भगवान राम के प्रथम पड़ाव स्थल के बारे में जानकारी देती है इसी क्रम में घघरा सीतामढ़ी की गुफा भी भगवान राम की त्रिकाल संध्या आरती स्थल के रूप में अपनी पहचान बनाती है। इसी मार्ग से आगे चलकर घने जंगलों से घिरे कोटाडोल विकासखंड से आगे छतौड़ा गुफा आश्रम में भगवान राम के साथ माता सीता एवं भ्राता लक्ष्मण के चौमासा बिताने की कहानी चर्चित हैं। यह सभी गुफाएं बलुआ पत्थर की ऊंची चट्टानो को काटकर बनाई गई प्रतीत होती है और सभी गुफाएं जमीन के नीचे बनी हुई है, जिसकी ऊंचाई लगभग  5 फीट तक सीमित है जो प्राचीन मान्यताओं के अनुसार देवी देवताओं के मंदिर या सिद्ध स्थल में सर झुका कर जाने की परंपरा को प्रदर्शित करते हैं। इसी क्रम में जब हम कोटाडोल के जंगल मार्ग से आगे बढ़ते हैं तब सोनहत एवं देवगढ़ की पहाड़ियों की ओर रामगढ़ में इसी बलुआ पत्थरों से बनी एक गुफा हमें मिलती है जिसे हम आदिशक्ति गांगी रानी का मंदिर के रूप में जानते हैं।  इस गुफा नुमा गांगी रानी मंदिर मे भी  सीतामढ़ी हरचौका एवं घघरा सीतामढ़ी की तरह पत्थरों के स्तंभ बनाकर ऊपरी हिस्से की चट्टानों को रोका गया है।  इसके भीतर का हिस्सा लंबा चौड़ा कमरे नुमा बना दिखाई पड़ता है जो समय के बदलाव के साथ पानी और वीरान पड़े रहने के कारण स्थानीय आदिवासियों द्वारा देवी जी की प्रतिमा स्थापित कर  कुछ अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां दीवारों पर अंकित कर दी गई है।

                              आदिशक्ति गांगी रानी का मंदिर आदिवासी मान्यताओं की देवी प्रतिमा के साथ रामगढ़ के घने जंगलों से 4 किलोमीटर आगे चलकर ग्राम नटवाही के उत्तर पूर्व दिशा में  2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।  बैकुंठपुर से लगभग 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रामगढ़ और उसे 4 किलोमीटर और आगे चलकर यह मंदिर लगभग 76 किलोमीटर दूर है।  गुरु घासीदास तैमूर पिंगला बाघ अभ्यारण क्षेत्र की सीमा पर स्थित ग्राम नटवाही में इस पहाड़ी नुमा चट्टान के नीचे इस गुफा में आदिशक्ति मां गांगी रानी की प्रतिमा विराजमान है। पत्थरों के छह स्तंभ पर टिके इस मंदिर का अगला भाग एक चौड़े बरामदे के रूप में स्थित है जिसमें कई देवी देवताओं की मूर्तियां अलग-अलग  स्थल में विराजमान है, जिसमें भगवान गणेश सहित बजरंगबली एवं नाग प्रथा से संबंधित देव माता की मूर्तियां पत्थरों पर उकेर कर बनाई गई है। आदि शक्ति माता के मंदिर के प्रवेश द्वार पर देवी की सहयोगी देवियों की मूर्तियां भी उकेरी गई है जो बहुत स्पष्ट नहीं है। इसमें नृत्य करती अप्सराएं एवं कतारबद्ध खड़े ऋषियों की तस्वीर दिखाई पड़ती है।  20 मीटर लंबे और 20 मीटर चौड़े इस गुफा में देवी मां के मंदिर में भी घुसने का प्रवेश द्वार लगभग 5 फीट ऊंचा है जो भक्ति भाव से जाने वाले किसी भी भक्त को देवी के सामने सिर झुकाकर उनका आशीर्वाद मांगने और प्रणाम करने की हिंदू रीति के अनुगमन की शिक्षा प्रदान करता है।  मंदिर की भीतरी हिस्से में तीन देवी प्रतिमा अमूर्त एवं अस्पष्ट प्रतिमा है,  जिसे हम माता गांगीरानी की प्रतिमा कहते हैं। ग्राम वासियों के अनुसार यह मूर्तियां यहां सैकड़ो वर्षों से विराजमान है लेकिन घने जंगलों के बीच स्थित इस गांगीरानी मंदिर की गुफा अपने निर्माण कला एवं भूमिगत गुफा स्वरूप होने के कारण रामवनगमन  की गुफाओं से मिलती-जुलती है, जो इस मंदिर को हजारों वर्ष पुरानी मानवीय संसकृति एवं सभ्यता  की कहानी के पन्नों को उजागर करती है।                              समय के बदलाव के साथ जंगलों के बीच स्थित इस मंदिर को आदिवासी  बुजुर्गों द्वारा परंपरागत रूप से चैत्र नवरात्रि के समय पूजा पाठ करने का विधान निरंतर आज भी चल रहा है। धार्मिक मान्यताओं को बल देते हुए लोग अपने घर के सुख-दुख देवी के साथ बांटते हैं। इस बीच कुछ लोग नारियल अगरबत्ती जलाकर देवी को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं और कुछ अपनी पारिवारिक समस्याओं को दूर करने और  इच्छा अनुसार आदि शक्ति के सामने अपनी झोली फैलाकर याचना स्वरूप मनौती भी मानते हैं तथा मनौती पूर्ण होने पर आदिवासी परंपरा के अनुसार देवी को यथा संभव चढ़ावा भोग या भंडारा कर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।  अंचल के निवासियों की इसी श्रद्धा को पहचानते हुए छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा वर्ष 2018-19 में भंडारा एवं रसोई भवन बनाने की घोषणा की गई।  मंदिर प्रांगण के सम्मुख एक भव्य रंगमंच बना दिया गया है जहां भजन कीर्तन एवं रामायण पाठ तथा देवी भक्ति के गीतों की प्रस्तुति दी जाती है । नौ  दिन तक चलने वाले नवरात्रि पर्व पर आने जाने वाले श्रद्धालुओं को कोई समस्या ना हो इसलिए ग्रामीण जल योजना से एक बोरिंग करा कर पीने के पानी की व्यवस्था की गई है।  ऊपर एक  टंकी में पानी एकत्र कर रखा जाता है ताकि आवश्यकता अनुसार नवरात्रि एवं शिवरात्रि मेले के समय आने वाले ज्यादा श्रद्धालुओं को पीने की पानी मिल सके। इसी तरह का एक बड़ा 25 मीटर लंबे एवं चौड़े भवन में श्रद्धालुओं की भोजन व्यवस्था के लिए भवन बनाया गया है। मंदिर के सामने मैदान में सौर ऊर्जा से संचालित समूह विद्युत व्यवस्था कर दी गई हैताकि  यहां आने वाले पर्यटकों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

                              मंदिर के बाहरी हिस्से में एक कोने में रखे आदिवासियों के त्रिशूल, देवी मां का झंडा, चिमटा एवं बान को देखकर बैगा पुजारी से बातचीत करने पर पता चला कि  चैत्र नवरात्रि में आदिवासी अपनी आस्था और आत्म बल से मनौती के लिए बाना लेते हैं यह बाना जीभ को बान से छेद देना एवं देवी की भक्ति आराधना करना कहलाता है।  इसी तरह भक्तों द्वारा नुकीले लोहे की खड़ाऊ पहनकर पूजा में शामिल होना एवं नुकीले लोहे के झूले पर झूला झूलने जैसी आत्म शक्ति का परिचय भी देवी मंदिर में दिया जाता है।  यहां मंदिर परिसर से बाहर बजरंगबली की प्रतिमा की स्थापना लोगों को बल प्रदान करती है

                            आदिशक्ति गांगी रानी का यह मंदिर आदिवासी संस्कृति की प्रकृति प्रेरणा एवं प्रकृति को ही ईश्वर मानने वाले समुदाय का प्रेरणा स्रोत मंदिर है जहां आपकी आस्था के अनुसार आपको देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। गुरु घासीदास तैमूर पिंगला बाघ अभयारण्य की सीमा से जुड़े होने के कारण जंगलों का यह स्थल कई आश्चर्यजनक किवदंतियों  से भी भरा हुआ है।  अंचल की अच्छी जानकारी रखने वाले स्व. डॉक्टर सिद्दीकी  के अनुसार मुगल बादशाह औरंगजेब के तेवर देखते हुए शाहजहां ने अपना खजाना औरंगजेब के सत्तासीन होनेसे पहले इन्हीं रामगढ़ की पहाड़ियों की प्राकृतिक गुफाओं में कहीं छुपाया दिया था, ताकि सत्ता में वापस आने पर उसे पुनः प्राप्त किया जा सके। इस किवदंती को वहां से प्राप्त कुछ शाहजहां कालीन सिक्के मिलने की चर्चा जोड़कर वे इसे प्रमाणित करने की कोशिश करते रहे थे। वास्तविकता यह है कि रामगढ़ की पहाड़ियों पर आज भी ऐसी प्राकृतिक गुफाएं मौजूद हैं जो सैकड़ो मीटर लंबी है। गांव वालों का कहना है की उन गुफाओं में अभी तक किसी का पहुंचना संभव नहीं हुआ है जो इन तथ्यों के पक्ष को भी समर्थन प्रदान करता है। डॉ सिद्दीकी के अनुसार आगरा से उज्जैन के रास्ते यह खजाना यहां तक पहुंचाया गया था किवदंतियों की सत्यता समय काल के अनुसार खोज परक प्रयासों को जन्म देती है और खोज के बाद मिलने वाली उपलब्धियां पर इसकी सत्यता को प्रमाणित करती है। इसलिए किंवदंतियां  तब तक केवल किंवदंतियां रहती हैं जब तक उसे  कोई प्रमाणिक दस्तावेज नहीं मिल जाता।

 गोपद नदी के किनारे स्थित यह मंदिर कभी घने जंगलों के बीच हुआ करता था। अब आदिवासी परिवारों की बसाहट इन जंगलों को धीरे-धीरे खेती में बदल रही है यही कारण है कि दूर जंगल में बने इस मंदिर के पास तक अब  कुछ कच्चे मकान बन गए हैं।  इन मकानों की मंदिर  के पास होना तथा खेती-बाड़ी की जमीन उजड़ते जंगलों  की बात दबे जुबान से कहने लगी है।  यह उजड़ते जंगलों और मानवीय बसाहट के साथ-साथ जंगलों की जमीन पर कब्जा धारियों को  आदिवासी पट्टे देने जैसे राजनीतिक निर्णय की पुनः समीक्षा के स्वरों को बल देती है।  यदि जंगल इसी तरह समाप्त होते रहे तब मानव स्वयं अपने ही जीवन को नई पर्यावरणीय चुनौतियों के सम्मुख खड़ा कर देगा।  कुछ विशेष पौधों की प्रजातियां का इस क्षेत्र में पाया जाना अच्छी सूचना मानी जा सकती है। जीवित जीवाश्म की श्रेणी में मान्य फर्न के पौधों की  नदियों एवं पानी की जलधारा के किनारे बहुतायत मात्रा में पाया जाना जैव विविधता की विशिष्ट प्रजाति के संरक्षण को दर्शाता है। इसी तरह कर चिरौंजी के पेड़ इस क्षेत्र में बहुतायत में पाए जाते हैं। वन्य जीव में शाही जैसे लुप्त होते वन्यजीवों का शिकार की घटनाएं चिंतित करती हैं इसके प्रति जागरूकता वर्तमान समय की आवश्यकता है। वन्य जीव एवं जैव विविधता का संरक्षण ही मानव जीवन के संरक्षण की कुंजी है इसे हमें गंभीरता से समझना होगा।

                                 आदिशक्ति गांगीरानी के दरबार में पहुंचने के लिए आपको कोरिया जिले के मुख्यालय बैकुंठपुर तक पहुंचना होगा जहां आपके रहने एवं भोजन की उचित व्यवस्था उपलब्ध है। यहां से अपनी टैक्सी या सार्वजनिक परिवहन बस से भी आप रामगढ़ तक पहुंच सकते हैं।  उचित यही होगा कि आप अपनी टैक्सी या दो पहिया वाहन से यात्रा करें ताकि दूरस्थ स्थानों तक भी आसानी से पहुंचा जा सके। बैकुंठपुर से लगभग 74 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आदिशक्ति गांगीरानी  मंदिर के इस पर्यटन यात्रा के दौरान आप हंसदो नदी का उद्गम स्थल, गुरु घासीदास तैमूर पिंगला बाघ अभ्यारण के प्राकृतिक नजारों और वन्यजीवों से साक्षात्कार कर सकेंगे वहीं बालमगढ़ की पहाड़ी की ऊंचाइयों से क्षितिज को झुककर धरती और बादल को बातें करते देख सकते हैं। इसी मंदिर के पूर्व दिशा में सिंधौरगढ़ पहाड़ तथा देवगढ़ की पहाड़ियां स्थित है जो अपने प्राकृतिक दृश्य तथा भित्ति चित्र के लिए प्रसिद्ध है। इसलिए यहां की यात्रा के लिए एक टूर सर्किट बनाकर आप अपनी यात्रा प्रारंभ करें ताकि एक बार में ही कई पर्यटन स्थलों का आनंद प्राप्त कर सकें।

बस इतना ही

फिर मिलेंगे, किसी अगले पड़ाव पर

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