: घोर अंधेरा भाग रहा है छत्तीसगढ़ अब जाग रहा है... खौल रहा नदियों का पानी खेतों में उग रही जवानी...
Admin Sun, Mar 2, 2025
छत्तीसगढ़ महतारी की पीड़ा को स्वर देकर छग के निर्माण के लिए कविताओं,जनआँदोलनों के माध्यम से जनचेतना की अलख जगाने वाले पवन दीवान तो राज्य बनने के बाद चले गये पर उनकी एक इच्छा बाकी है वे छत्तीसगढ़ को "मां कौशल्या" के नाम से पहचाने जाने के लिए अंतिम समय तक प्रयासरत रहे।संत,कवि पवन दीवान की पीड़ा थी कि जब बिहार की पहचान मां जानकी, ओडि़सा की पहचान भगवान जगन्नाथ,सुभद्रा और बलराम, उत्तरप्रदेश की पहचान अयोध्या, मथुरा, बनारस,वृंदावन और हरिद्वार की पहचान भगवान शंकर की ससुराल के रूप में होती है तो छत्तीसगढ़ की पहचान मां कौशल्या के नाम पर क्यों नहीं....? छत्तीसगढ़ का गांधी चला गया, पृथक छत्तीसगढ़ का निर्माण तो उनके सामने हो चुका था पर माता कौशल्या (श्रीराम की माता) की पहचान छत्तीसगढ़ की महतारी के रूप में भारत नहीं विश्व में हो उनका सपना अभी अधूरा है। संत परंपरा के अनुसार पवन दीवान को राजिम स्थित ब्रह्मचर्य आश्रम में 2 मार्च 2014 को निधन के बाद समाधिस्थ कर दिया गया। वैसे संत महात्मा अपने जीवन काल में सभी इच्छाएं पूरी होने के बाद ही समाधि ले लेते हैं पर संत दीवान ने सपना देखते देखते ही अपना शरीर त्याग दिया था।माता कौशल्या के विषय में एक बार उन्होंने मुझसे चर्चा में कहा था, कि बाल्मिकी रामायण में उनके विषय में अधिक जानकारी तो नहीं है किंतु जितनी जानकारी है उससे स्पष्ट है कि मां कौशल्या अत्यंत विदुषी, मंत्रिविद थीं उन्हें वेदों का भी अच्छा ज्ञान था। श्रंगी ऋषि को राजा भानूमंत (कौशल्या के पिता)का राज्याश्रय प्राप्त था।श्रृंगी ऋषि का आश्रम छग के महानदी के उद्गम स्थल सिहावा के पास ही है। संभवत: कौशल्या की शिक्षा-दीक्षा उन्हीं की देख रेख में हुई, वनवास जाने के पूर्व माता कौशल्या से जब श्रीराम मिलने पहुंचे थे तब माता की मनोदशा तथा छग की 'महानदी' उल्लेखित उदगार का जिक्र दीवानजी ने किया था।
स्थिरं नु हृदयं मछेम मेजरन्न दीयर्ते
पावृपीपवा महानद्या: स्पृस्टं मूलं नवांभसा।।
माता कौशल्या ने श्रीराम से उक्त अवसर पर कहा था कि मेरा हृदय कितना कठोर है? तुम्हारे विछोह की बात सुन वर्षाकाल के प्रखर जल प्रवाह से टकराते हुए महानदी के कगार की भांति यह हृदय चूर-चूर क्यों नहीं हो जाता।पुत्र विछोह के दारूण दुख से विदीर्ण हृदय की तुलना महानदी की बाढ़ से क्षतिग्रस्त कगारों (किनारों) से करना कौशल्या के लिए स्वाभाविक भी था। उनका बाल्यकाल,किशोर अवस्था महानदी के तट पर गुजरी थी। महानदी से कौशल्या का भावनात्मक, रागात्मक संबंध था।पवन दीवान का विचार था कि उनके हृदय में पुत्र विछोह(14 साल का बनवास) का दारूण दुख हुआ, स्वाभाविक तौर पर उन्हें अपने मायके (छत्तीसगढ़) की महानदी की याद आई.... तुलना के लिए उन्हें अन्य नदी नहीं सूझ सकती थी। महर्षि बाल्मिकी के काव्य की यह विशेषता है। उन्होंने माता कौशल्या की मनोदशा को प्रकट करने के लिए बाढग़्रस्त महानदी के ढहते कगारों की उपमा चुनी।माता कौशल्या के नाम पर हालांकि पूर्ववर्ती राज्य सरकार ने कौसल्या शोध पीठ की स्थापना,मां कौशल्या के नाम महिला उत्थान के क्षेत्र में कार्यरत महिला को1लाख सम्मान निधि देने की घोषणा की थी पर पवन दीवान अपने जीवन के अंतिम समय तक माता कौशल्या का भव्य मंदिर जनसहयोग से बनाने प्रयासरत थे। मूर्ति बनाने का भी आदेश हो गया था पर मूर्ति का भुगतान करने वे जनसहयोग ले रहे थे। वैसे पूर्ववर्ती सरकार ने मंदिर स्थापना की पहल भी उनके समाधिस्थ होने के अवसर पर की थी, स्थिति जस की तस ही रही। सरकार के पूर्व मुखिया भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ के गांधी कहे जाने वाले भावुक किस्म के राजनेता, फक्कड़,धर्म संस्कृति के अध्येता, कवि संत पवन दीवान की अंतिम इच्छा के अनुसार मां कौशल्या का भव्य मंदिर बनाने की पहल चंदखुरी में तो की है पर महानदी के तट पर राजिम स्थित ब्रम्हचर्य आश्रम जहां पवन दीवान समाधिस्थ हुए थे उसे एक स्मारक के रूप में आकर्षक बनाकर एक छत्तीसगढ़ी तीर्थ के रूप में उसका उन्नयन करना अभी बाकी है ताकि राजिम की त्रिवेणी संगम में आने वाला व्यक्ति संत,कवि,राजनेता के संगमरूपी पवन दीवान को भी उनके समाधिस्थल पर आकर याद कर सके।
बहरहाल आपातकाल के समय स्व. पवन दीवान ने 'पृथक छत्तीसगढ़ पार्टी' से भी रायपुर से चुनाव लड़ा हालांकि उन्हें सफलता तो नहीं मिली पर 'पृथक छत्ती सगढ़ राज्य' की अलख जगाने के रोपित बीज में उन्हें जलवर्षा कर उसे अंकुरित होने में योगदान दिया। स्व. खूबचंद बघेल से लेकर स्व. चंदूलाल चंद्राकर के सतत संपर्क में रहकर पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया। उनके बारे में एक नारा भी उछला था।
पवन नहीं वो आंधी है
छत्तीसगढ़ का गांधी है
छत्तीसगढ़ की पीड़ा और लगातार हो रहे शोषण पर अविभाजित म.प्र. के समय उन्होंने जनजागरण किया तथा कविता के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति भी प्रकट की...
छत्तीसगढ़ में सब कुछ है
पर एक कमी है स्वाभिमान की
मुझसे सही नहीं जाती है
ऐसी चुप्पी वर्तमान की।
ऐसा नहीं था कि वे छत्तीसगढ़ की पीड़ा और शोषण से आहत रहा करते थे वे कविता के माध्यम से चेता वनी देने में भी पीछे नहीं रहते थे। छत्तीसगढ़ निर्माण के पूर्व उनकी एक कविता...
घोर अंधेरा भाग रहा है
छत्तीसगढ़ अब जाग रहा है
खौल रहा नदियों का पानी
खेतों में उग रही जवानी
गूंगे जंगल बोल रहे हैं..
पत्थर भी मुंह खोल रहे हैं
धान कटोरा रखने वाले
अब बंदूक तोल रहे हैं...
खैर 2 बार सांसद, एक बार विधायक बनने वाले पवन दीवान की छत्तीसगढ़ बनने के बाद उपेक्षा शुरू हो गई, पं. श्यामाचरण शुक्ल को महासमुंद से प्रत्याशी बनाने के बाद वे स्वयं राजनीति से पृथक करने लगे हालांकि छत्तीसगढ़ राज्य के लगभग सभी लोकसभा-विधानसभा चुनावों में नाम उछलता तो था पर उन्हें टिकट से वंचित ही रखा गया,कांग्रेस -भाजपा में आने-जाने का उनका दौर जारी रहा। मेरा उनसे परिचय पुराना था एक बार जब उन्हें पता चला कि मेरा जन्म ही फिंगेश्वर (राजिम) में हुआ है, उन्होंने बताया था कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी फिंगेश्वर में हुई है इसलिए वे कहा करते थे कि 'मोर गांव के पास ही ते ह जनम ले हस'। बहर हाल जीते जी उन्हें वह मुकाम हासिल नहीं हो सका जिसके वे हकदार थे। छग के माटीपुत्र विष्णुदेव साय सीएम बने हैँ और उससे पवन दीवान की स्मृति को जीवंत बनाने उचित कदम उठाने की उम्मीद की जा सकती है।
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