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17th October 2026

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वो हादसा भी कितना अजीबो गरीब था... वो आग से जला जो नदी के करीब था...

स्थापना, खनिज, जनसंपर्क, महिला एवं बाल विकास, आबकारी, खाद्य सहित विभिन्न विभागों का लिया जायजा,

15, 16 और 17 अक्टूबर को सजेगा उत्सव का रंगमंच, भव्य मंच और आकर्षक सजावट के साथ आयोजन की तैयारियां पूरी

पार्षदों ने वन विभाग से की तत्काल कार्रवाई की मांग, पिंजरा लगाकर भालुओं को पकड़ने की अपील

राजस्व अधिकारी प्रतिदिन दो से चार घंटे प्रकरणों के अध्ययन और निर्णय के लिए दें, समय पर उपलब्ध कराएं नकल, नक्शा और खसरा

: जनजातीय गौरव दिवस पर विशेष, पुर्व कोरिया रियासत में जनजातियों का योगदान

Admin Fri, Nov 15, 2024

इतिहासकार डॉ विनोद कुमार पांडेय लिखते हैं की अपनी भौगोलिक सीमाओं के साथ-साथ घने जंगलों व ऊंची नीची पहाड़ियों व नदी नाले तथा क्षेत्रीय विषमताओं व प्राचीन आक्रामक जनजातियों के कारण यह रियासत किसी भी बाहरी आक्रमण से सुरक्षित रही यही कारण है कि स्वाधीनता आंदोलन में भी छत्तीसगढ़ कौशल दक्षिण, कौशल व दंडकारण्य का यह क्षेत्र चाहे मराठो का शासन हो या अंग्रेजों का अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण यह रियासत पूर्णतया बाहरी हस्तक्षेप से न केवल बची रही बल्कि अपनी संस्कृति को सहेज कर रखा अनेक प्रमाणित तथ्यों के आधार पर ज्ञात होता है कि पूर्व सरगुजा समूह के अंचल के अंतर्गत निवास करने वाली प्रजाति अन्य राज्यों खासकर छोटा नागपुर (बिहार) से आकर इस क्षेत्र में रची बसी । डॉ पांडेय बताते हैं की वर्तमान मनेद्रगढ़-चिरमिरी -भरतपुर जिले में सर्वाधिक जनसंख्या हिंदुओं के बाद इन जनजातियों की ही है यहां गोड़, उरांव, कोल, कोरवा, नगेसिया, बैगा, धनुहार, अगरिया, भूमिहार ,कोडांकू व अन्य जनजातीय निवास करती है तथा वह अपने विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम त्योहार सरहुल, कर्मा, कठोरी, महुआ ,होली, तीजा, छेरता, कनिहारी पर्व ,सरहुल पर्व मानते हैं साथ नृत्य व संगीत कला कर्मा, शैला, सुआ, डोमकच, होली, ज्वारा, गीत गाते हैं तथा अपने सामाजिक रीति रिवाज के अनुसार विवाह अन्य संस्कारों का पालन करते हुए स्वच्छंद जीविका चलाते हैं आधुनिक विकास का जो मापदंड है उसे आदिवासी समाज कोई दिलचस्पी नहीं रखता है आदिवासी समाज की न्यूनतम आर्थिक आवश्यकता विकसित समाज के लिए चुनौती है

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