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17th October 2026

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: कठिन भोगोलिक स्थिति होने के बावजूद पर्यटन और पुरातत्व के क्षेत्र में जिले की अपनी एक विशिष्ट पहचान है  - डॉ. विनोद कुमार पाण्डेय

Admin Sat, Jan 4, 2025

प्राचीन काल में दण्डकारण्य व दक्षिण कौशल के नाम से जाने जाने वाला यह क्षेत्र जंगलों, पहाड़ों और नदियों के बीच कठिन भोगोलिक स्थिति होने के बावजूद पर्यटन और पुरातत्व के क्षेत्र में जिले की अपनी एक विशिष्ट पहचान है। यह निश्वय है कि समय के साथ नदियों ने मार्ग बदला, आरण्यों ने दिशाए तथा पर्वतों ने अपना स्वरूप बदला अगर कुछ नहीं बदला तो वह मनुष्य की आस्था। जिला नोडल अधिकारी पुरातत्व डॉ विनोद पाण्डेय कहते हैं. मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के भरतपुर विकास खण्ड में तिलौली, आरा, भंवरखोह (कोहबउर). लावाहोरी (घोडबंधापाट), सोनहरी (नवाडीह) आदि मानव द्वारा निर्मित जंगलों और पहाड़ों में अनेक शैल चित्र देखने को मिलते हैं जो मध्य प्रदेश के भीमबेटिका से प्राप्त शैल चित्रों से काफी समानता रखते हैं, तथा पुरापाषाणकाल से मध्य पाषाणकाल समय के प्रतीत होते है। तिलौली- जिला मुख्यालय से लगभग 130 किमी दूर कठौतिया केल्हारी-बहरासी कुंवारपुर होकर ग्राम तिलौली पहुंचा जाता है। मेन रोड से लगभग 1 किमी दूरी पर पहाड़ी पर गढ़ादाई (गढ़ादेवी) का मंदिर है। पर्यटकों की आवाजाही को देखते हुए वन विभाग द्वारा पहाड़ी पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां बनाई गई है। तिलौली के प्राकृतिक चट्टानों में मानव निर्मित आकृति हिरण, कमल के फूल, घोड़े तथा लिपियों का चित्र बनाया गया है। इन शैल चित्रों को बनाने में बहुतायत लाल रंग का प्रयोग किया गया है। आरा के शैल चित्र जिला मुख्यालय मनेन्द्रगढ़ से कठौतिया केल्हारी-कुंवारपुर से तिलौली जाते समय तिलौली से लगभग 5 किमी पहले आरा नामक गांव है। वहां से लगभग 500 मीटर चलने पर पहाड़ी पर मानव, हिरण, बकरी, घोड़े आदि के शैल चित्र बने हुए है। भंवरखोह (कोहबउर) जिला मुख्यालय मनेन्द्रगढ़ से केल्हारी-जनकपुर होते हुए भंवरखोह पहुंचा जाता है। सरगुजिया बोली में भंवर का अर्थ है मधुमख्खी और खोह का अर्थ है गुफा। इस प्रकार भंवरखोह का मतलब ऐसी गुफा से है जिसमें मधुमख्खियों के विशाल छत्ते हैं। केल्हारी-जनकपुर मार्ग के ग्राम चुटकी से 4-5 किमी दूर भंवरखोह होते हुए मुरेलगढ़ उंची पहाड़ी है। यहीं पर कोहबउर नामक शैलाश्रय इन्हीं पहाड़ियों के मध्य स्थित है। यहां पर कोहबउर के अतिरिक्त बैल, हिरण, स्वास्तिक, मानव आकृति, चिड़िया, ज्यामितीय, पतंगनुमा आकृति व अन्य कई प्रकार के शैल चित्र बने हुए हैं। बिहारपुर (नवाडीह) जिला मुख्यालय मनेन्द्रगढ़ से बिहारपुर, सोनहरी से जटाशंकर जाते समय रास्ते में नवाडीह ग्राम के जंगलों में भी शैलचित्र देखे गए हैं। यहां विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों एवं मानव की आकृति बनी हुई है। लावाहोरी- जनकपुर से कोटाडोल मार्ग पर ग्राम घघरा से बांये तरफ 02 कि.मी. दूर रापा नदी पार करके 07 कि.मी. दूर लावाहोरी स्थित है यह ग्राम पंचायत घघरा का आश्रित ग्राम है, यहां से 02 कि.मी. की दूरी पर जंगल में मध्यपहाड़ी पर चित्रित शैलाश्रय है जिसमें हिरण, मानव आकृति व ज्यामितीय आकृतियां दिखाई पड़ती है। मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में प्राप्त यह शैलाश्रय अव्यस्थित अवस्था में हैं। ये प्राचीन कलाकृतियां धीरे-धीरे अपने रंग को खोते जा रही हैं। यदि सही ढंग से प्रयास किया जाए तो वर्षों पुरानी इन कलाकृतियों को संरक्षित और सुरक्षित किया जा सकता है।

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