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पद्मश्री स्व डॉ सुरेंद्र दुबे ने : छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति को वैश्विक पहचान दी- उपाध्याय

Praveen Nishee Fri, Jun 27, 2025

मनेद्रगढ़। एमसीबी।पद्मश्री डॉ सुरेंद्र दुबे अब नहीं रहे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ी भाषा एवं संस्कृति को नई ऊंचाई देने वाले व्यंग्य कवि डॉ सुरेंद्र दुबे के आकस्मिक निधन को साहित्य जगत की अपूर्ण क्षति है। मनेद्रगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार, एवं देश के आध्यात्मिक गौरव सम्मान से विभूषित स्थानीय साहित्यकार सतीश उपाध्याय का उनसे विभिन्न साहित्यिक संदर्भों में गहरा जुड़ाव रहा। पद्मश्री डॉ सुरेंद्र दुबे से जुड़े एक संस्मरण को स्मरण करते हुए सतीश उपाध्याय बतलाया कि छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के डॉ सुरेंद्र दुबे जब 2011 में छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के सचिव थे तब उनके निर्देशन में स्थानीय राजस्थान भवन में जिला स्तरीय साहित्यकार सम्मेलन सम्मान समारोह काव्य संध्या का आयोजन किया गया था। जिसमें , छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध रचनाकारों के साथ मनेद्रगढ़ के लेखक पत्रकार एवं जनप्रतिनिधि उपस्थित थे। तत्कालीन विधायक स्व दीपक पटेल के मुख्य आतिथ्य में आयोजित यह ऐतिहासिक साहित्यिक कार्यक्रम डॉ सुरेंद्र दुबे के निर्देश पर ही आयोजित किया गया था। मनेद्रगढ़ के इस विशिष्ट जिला स्तरीय साहित्यिक सम्मेलन को डॉ सुरेंद्र दुबे ने उत्कृष्ट आयोजन पर कार्यक्रम संयोजक सतीश उपाध्याय को बधाई भी दी थी। पद्मश्री स्व दुबे से जुड़े एक अन्य संस्मरण की चर्चा करते हुए साहित्यकार, कवि उपाध्याय ने बताया कि -डॉ सुरेंद्र दुबे मुझे सतीश बाबू नाम से बुलाया करते थे, मैं उनको भैया कह कर संबोधित करता था। मेरी जानकारी में यह बात तो थी कि डॉ सुरेंद्र दुबे कुशल मंच संचालक, सशक्त व्यंग्यकार के अतिरिक्त अच्छे आयुर्वेदिक चिकित्सक भी थे। रायपुर में एक बार राज्य स्तरीय राजभाषा सम्मेलन में मैंने उनसे आयुर्वैदिक चिकित्सा एवं आयुर्वेद के वैश्विक महत्व पर लंबी बातचीत की थी। मैंने कहा भैया- आप अपने चुटीले अंदाज एवं एवं कविताओं के साथ जिस ऊंचाइयों पर पहुंचे हैं, उन ऊंचाइयों से आयुर्वेद को आप कहां देखते हैं?

थोड़ी देर खामोश रहने के बाद उन्होंने कहा था सतीश बाबू आयुर्वेद सिर्फ एक चिकित्सा पद्धति नहीं यह जीवन शैली भी है, आज आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति से कोई अनजान नहीं है। मेरे मंच संचालन और धारा प्रवाह कविता के लिए मुझे लंबी गहरी सांस की आवश्यकता पड़ती है , यही वजह है कि मैं अपने कविताओं के प्रस्तुति में हास्य व्यंग के साथ - हजारों श्रोताओं दशकों से बार-बार यह कहता हूं कि-"सांस लेना है " यह ईश्वर की कृपा ही रही कि ज्यादातर कविताएं मुझको याद हो जाती है इसकी मूल वजह योग ही है। जब भी वक्त मिलता है मुझे मैं प्राणायाम का सहारा लेता हूं और आयुर्वेदिक उपचार के लिए लोगों को प्रेरित भी करता हूं। इसके बाद रायपुर में जब-जब डॉ सुरेंद्र दुबे से मुलाकात होती थी वे पूछते थे तुम्हारे जिले में योग प्राणायाम और आयुर्वेद का क्या हाल है?मैं कहता था भैया-बस आपसे प्रेरणा लेकर अपने कर्म में लगा हुआ हूं! आज डॉ सुरेंद्र दुबे हमारे बीच नहीं हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ का वैश्विक पटेल पर मान बढ़ाया छत्तीसगढ़ी भाषा को अंतरराष्ट्रीय दर्जा भी दिया। वे विनम्र ,हंसमुख एवं हाजिर जवाब , जिंदा दिल इंसान थे ।पद्मश्री डॉक्टर सुरेंद्र दुबे के चले जाने से काव्य जगत को अपूर्णीय क्षति हुई है। मनेद्रगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार एवं हिंदी साहित्य भारती के जिला अध्यक्ष सतीश उपाध्याय ने डॉ सुरेंद्र दुबे की व्यक्तित्व को अद्वितीय बताते हुएकहा-" -छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया" इस नारे को वैश्विक रूप से बुलंद करने वाले डॉ सुरेंद्र दुबे ने छत्तीसगढ़ को जो मान और सम्मान दिया वह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है।

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