: धान के कटोरे' में 'सोने- चांदी के सिक्कों' का भी कभी चलन था..
Admin Thu, Oct 31, 2024
'धान के कटोरे' के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ में विश्व की 12 हजार 500 धान की प्रजातियों में से करीब 10 हजार छत्तीसगढ़ में ही पाई जाती है। धान के इस कटोरे का इतिहास काफी समृद्ध रहा है। यहां सोने-चांदी के सिक्कों का चलन था। व्यापारिक क्षेत्र में भी छत्तीसगढ़ काफी समृद्ध था।गरियाबंद के पास"सिर कट्टी"में पैरी नदी के तट पर नदी बंदर गाह (डॉकयार्ड) के अवशेष मिले है। छग से 'रोम' का व्यापार प्राचीन काल में नदी मार्ग से होता था इसकी पुष्टि भी बंदरगाह के अवशेष मिलने से होती है।'धान के कटोरे' छ्ग में कुछ पुरातात्विक स्थलों की खुदाई में 'रोम के सोने के सिक्के' भी मिले है। ये समृद्ध संस्कृति,परंपरा, व्यापारिक संबंध विदेशों से होने की भी वकालत करते हैं।छत्तीसगढ़ में कभी स्वर्ण मुद्राएं प्रचलित थीँ।भारत -पश्चिम देशों से व्यापारिक संबंध अनादिकाल से चला आ रहा है। इसका प्रभाव तब छत्तीसगढ़ में भी पड़ा था। छग में भारतीय ही नहीं बल्कि विदेशों के सोने के सिक्के भी मिले है।बिलासपुर तथा चकरबेढ़ा नामक गांव में 'रोम' के 2 सोने के सिक्के प्राप्त हुए हैँ, आज भी महंत घासीदास संग्रहालय में सुरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ में चौथी शताब्दी में गुप्त वंश का प्रभाव पड़ा था। समुद्रगुप्त के काल के 20 सोने के सिक्के बनबरद गांव में ही मिले हैं।1सिक्का काच,1समुद्र गुप्तऔर 7 चंद्रगुप्त के समय का है। 'काच' समुद्रगुप्त के सुपुत्र थे जिसे रामगुप्त के नाम से भी जाना जाता है। सिक्कों में शौर्य रणक्षेत्र के प्रतीक अजेय राजाओं के सुसज्जित चित्र, वीणा बजाते राजा का चित्र अंकित है। कुछ सिक्कों में अश्वमेघ यज्ञ, माता-पिता के प्रति श्रद्धा के दृश्य अंकित हैं। भरमपुर वंशों के कार्यकाल में भी स्वर्ण मुद्राओं का प्रचलन था।छत्तीसगढ़ की राजधानी शरभवंश के काल में सिरपुर थी।वहां खुदाई से सोने के सिक्के मिले हैं स्वर्ण मुद्रा अमरार्य कुल के राजा प्रसन्न मात्र की मुद्रा थी।तब सिक्कों का चलन कटक से लेकर चांदा तक प्रचलित था। कल्चुरी नरेश प्रथम जाजल्लदेव ने भी सोने के सिक्के जारी किये थे। सोने के सिक्कों के अग्रभाग में जाजल्लदेव और पृष्ठ भाग में कलिंग के नृपतिगंग पर मिली विजय का प्रतीकराज शार्टूल चिंह अंकित हैँ, रतनपुर के अनेक कलचुरिनरेशों ने स्वर्ण सिक्के जारी किये थे।दिसंबर 1972 में दुर्ग जिले वानवरद गांव में गुप्त कालीन 9 स्वर्ण सिक्के मिले हैं, पूर्व में बिलासपुर में 01 गुप्त स्वर्ण सिक्का मिलाथा। नरेश प्रसन्नमात्र के समय के पांचवीं-छठवीं शताब्दी के कार्यकाल के स्वर्ण सिक्के दक्षिण कोसल के अनेक स्थानों पर मिल चुके हैं। सिक्के पर आवक्ष लक्ष्मी और गरूड़ के साथ ही शंख -चक्र भी विद्यमान है। यह सिक्का भग्नावस्था में मिला है। पं.लोचन प्रसाद पांडे ने शोधपत्र के अनुसार बालपुर, महानदी के आसपास अनेक सोने के सिक्के मिले है, हैहृयवंशियों के सोने -चांदी के सिक्कों परलोचन प्रसाद पांडे ने शोधपत्र भी तैयार किये थे जिनका प्रकाशन भी आंध्रा हिस्टारिकल रिसर्च सोसायटी में हुआ था, इंडियन म्यूजियम कलकत्ता के पुरातात्विक विभाग के तब के अधीक्षक वीआर चंद्रा ने स्वीकार किया था कि हैहृय वंशी पृथ्वीदेव, जाजल्लदेव और रत्नदेव के समय सोने के सिक्के चलते थे। अभी सेंट्रल म्यूजियम नागपुर में कुछ सोने के सिक्के रखे हुए हैं। छग में सर्वाधिक सोने के सिक्को के साथ मिलने का रिकार्ड बिलासपुर जिले का है। सोनसरी गांव में जमीन के भीतर तांबे के बर्तन में एक साथ 600 सोने के सिक्के प्राप्त हुए हैं। इस में 459 सिक्के राजा पृथ्वीदेव (11 40-1160 ए.डी.), 36 सिक्के राजा जाजलनदेव (1160- 1175 ए.डी.), और 96 सिक्के राजा रत्न देव (1175-1190 ए.डी.) के शासनकाल के है तो 9 सिक्के दूसरे शासन काल के थे। मल्हार के गांवों में खुदाई के समय भी सोने के सिक्के मिले थे।सोने के साथ चांदी के सिक्के भी छत्तीसगढ़ में प्रचलित थे। नंद-मौर्य काल में चांदी के सिक्कों का प्रचलन था। रायपुर जिले के तारापुर, तब के रायगढ़ के सारंगढ़ साल्हेपाली, बिलासपुर जिले के अकलतरा के पास चांदी के सिक्के खुदाई के दौरान मिल चुके हैं।
https://youtube.com/shorts/8r0Ql20D72c?si=DFwUmEa4V9nKQIe_
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