वरिष्ठ पत्रकार शंकर पांडे की कलम से....{किश्त 257} : बस्तर के कूटरू में बनभैँसा का शिकार,और पेस्टनजी की कब्र पर मुहब्बत का दिया.
Praveen Nishee Tue, Apr 22, 2025
बस्तर संभाग का दक्षिण - पश्चिमी जिला है, बीजापुर। यह महाराष्ट्र और तेलंगाना ने सटा कडप्पा शैलभूमिका वन क्षेत्र है। यहां से ऊपर बघेलखंड तक का हिस्सा गोंडवाना कहलाता है भारत के मध्य में अवस्थित इस भू क्षेत्र का इतिहास, संस्कृति और भूगोल को रोशनी में लाये जाने की जरूरत है। इसी बीजापुर जिले में रियासत काल की सबसे बड़ी जमींदारी थी कुटरू। कुटरू का अपना इतिहास है और यह अपने जंगली भैंसोँ के लिए भी विख्यात है।किसी समय बाहर से लोग जंगली भैंसोँ का शिकार करने आते थे।इसी शिकार से जुड़ी यहां एक कहानी और भी है जो तस्वीर में दिख रही कब्र की है।यह कब्र है,मुम्बई के एक पारसी व्यापारी पेस्टनजी नौरोजी की। नौरोजी, तब बस्तर महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव के मेहमान बनकर बस्तर आये थे। 1947 का दिसंबर महीना था।बस्तर आकर नौरोजी ने कुटरू में जंगली भैंसे के शिकार में रुचि दिखाई तो प्रवीरचन्द्र भंजदेव ने उन्हें कुटरू भेज दिया। 01 जनवरी 1948 मतलब नए वर्ष का पहला दिन। आज जहां कुटरू बस्ती है,वहां तब जंगल था। नौरोजी ने मचान बनवाया और एक सहायक के साथ भैंसे का इंतज़ार करने लगे। बनभैसा आया। उन्होंने उस पर गोली चला दी।बनभैँसा तड़पा,शिकार की सफलता में खुशी के मारे पेस्टनजी मचान से नीचे उतर आए। सहायक उन्हें मना करता रहा गया और इधर भैंसे पर दूसरी गोली भी दाग दी! वे कच्चे शिकारी थे, उत्साह में भैंसे के सामने आ गए थे। भैंसा मरा नहीं था बल्कि आक्रामक हो गया था। वह पेस्टनजी पर पिल पड़ा और उन्हें मार डाला और गोली लगी होने के कारण खुद भी मर गया !गांव वालों ने पेस्टनजी को वहीं दफना दिया। खबर मिलने पर कुछ समय बाद पेस्टन जी की पत्नी कुटरू पहुंची और उस जगह पर यह कब्र ' ln the sad memory of Nauroji Preston ji ' बनवा दी जो तस्वीर में दिख रही है। नौरोजी की उम्र तब 46 साल थी।पत्नी ने वहां मोमबत्ती जलाए और इस दिन हमेशा मोमबत्तियाँ या दिया जलाने के लिये लोगों को पैसे दिये और वापस लौट गई। पेस्टन जी की पत्नी सम्भवतः जब तक वे जीवित रहीं,अपने पति के इस कब्र की देख भाल के लिए पैसे भेजती रहीं और उस पारसी स्त्री का प्रेम कुटरू में अपने पति की कब्र में मोमबत्ती बनकर जलता रहा। आज भी पेस्टनजी की समाधि पर कभी कभी दिया जला देते हैं पर पहले जैसा अब नही रहा। यह जगह अब उपेक्षित हो रही है, ध्यान नही देने से संभव है यह लुप्त भी हो जाये। स्थानीय स्तर पर साफ सफाई करके इस जगह को संरक्षित रखा जाए तो एक पत्नी का प्रेम साल में कम से कम एक बार मोमबत्ती की रोशनी में यहाँ जरूर जलता रहेगा।
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