रोशन लाल अवस्थी की कलम से : ”दर्द में दहाड़ता तेंदुआ, खामोश निगरानी तंत्र — गरियाबंद के जंगल से आई डराने वाली तस्वीर”
Praveen Nishee Sat, Dec 27, 2025

गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से एक बेहद चिंताजनक और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जहाँ जंगल में शिकारियों द्वारा बिछाए गए अवैध जाल में एक तेंदुआ बुरी तरह फँस गया। तेंदुए की दर्दनाक दहाड़ सुनते ही पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और ग्रामीणों में दहशत का माहौल बन गया। यह घटना न सिर्फ वन्यजीवों की सुरक्षा पर सवाल उठाती है, बल्कि वन विभाग और प्रशासन की निगरानी व्यवस्था की गंभीर पोल भी खोलती है।
घटना का पूरा घटनाक्रम —
जानकारी के अनुसार, गरियाबंद जिले के जंगल से सटे एक ग्रामीण क्षेत्र में स्थानीय लोगों ने तेंदुए की तेज और लगातार दहाड़ सुनी। जब ग्रामीण मौके पर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि एक तेंदुआ लोहे के मजबूत शिकारी जाल में फँसा हुआ है। जाल में फँसने से तेंदुआ गंभीर रूप से घायल हो गया था और निकलने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा था।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते उसकी आवाज़ नहीं सुनी जाती, तो तेंदुए की जान भी जा सकती थी। दहाड़ की आवाज़ से आसपास के गाँवों में भय का माहौल बन गया और लोग अपने घरों में दुबकने को मजबूर हो गए।
वन विभाग की देर से सक्रियता :
घटना की सूचना मिलने के बाद वन विभाग के अधिकारी मौके पर पहुँचे और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया। तेंदुए को बेहोश कर जाल से बाहर निकालने की प्रक्रिया अपनाई गई और प्राथमिक उपचार की व्यवस्था की गई। वन विभाग का कहना है कि तेंदुए को सुरक्षित स्थान पर ले जाकर उपचार के बाद जंगल में छोड़ा जाएगा।
हालांकि, सवाल यह है कि जब शिकारी जंगल के भीतर तक जाल लगाने में सफल हो गए, तब वन विभाग की गश्त और निगरानी कहाँ थी?
प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर सवाल —
स्थानीय ग्रामीणों और वन्यजीव प्रेमियों का आरोप है कि इस इलाके में लंबे समय से अवैध शिकार की गतिविधियाँ चल रही हैं, लेकिन न तो नियमित पेट्रोलिंग की जा रही है और न ही शिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई हो रही है।
ग्रामीणों का कहना है—
“आज तेंदुआ जाल में फँसा है, कल कोई इंसान या बच्चा भी इसकी चपेट में आ सकता है। प्रशासन को अब कागज़ी कार्रवाई से बाहर निकलना होगा।”
”मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती समस्या”
गरियाबंद और आसपास के क्षेत्रों में जंगलों के सिमटने और निगरानी की कमी के चलते वन्यजीवों का गांवों की ओर आना बढ़ गया है। इससे न केवल जानवरों का जीवन खतरे में है, बल्कि ग्रामीणों की सुरक्षा भी दांव पर लगी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस रणनीति नहीं बनाई गई, तो ऐसी घटनाएँ और बढ़ेंगी।
अब ये सवाल ज़रूरी —
जंगल में शिकारी जाल कैसे लगाए जा रहे हैं?
वन विभाग की नियमित गश्त और निगरानी क्यों नाकाम रही?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?
भविष्य में वन्यजीवों और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे?
निष्कर्ष —
गरियाबंद के जंगल से आई यह तस्वीर केवल एक तेंदुए के दर्द की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही, कमजोर निगरानी तंत्र और विफल संरक्षण व्यवस्था की डराने वाली तस्वीर है। अब ज़रूरत है कि प्रशासन केवल रेस्क्यू तक सीमित न रहे, बल्कि अवैध शिकार पर कठोर कार्रवाई कर जवाबदेही तय करे — ताकि जंगल भी सुरक्षित रहें और इंसान भी।
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