Advertisment

25th June 2026

BREAKING NEWS

प्रदेश में कानून व्यवस्था पूरी तरह विफल- स्वप्निल सिन्हा

हर्षोल्लास के साथ मनाया गया शाला प्रवेश उत्सव

1975 को लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय है, जिसे देश कभी नहीं भूल सकता-कृष्ण बिहारी जायसवाल

विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने नशे से दूर रहने और समाज को जागरूक करने का लिया संकल्प

दूरस्थ क्षेत्रों तक चिकित्सा शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करना है सरकार का संकल्प: श्याम बिहारी जायसवाल

: मास्टरजी,पदुमलाल पुन्ना लाल बख्शी..., शिक्षक से साहित्य साधना तक

Admin Wed, Oct 16, 2024

पदुमलाल पुन्नालाल का जन्म 27 मई,1894 को खैरागढ़,राजनांदगांव, छत्तीसगढ़,में हुआ था। पिता पुन्नालाल बख्शी 'खैरागढ़' के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे।पदुम लाल पुन्नालाल बख्शी, चंद्र कांता संतति उपन्यास के प्रति विशेष आसक्ति के कारण स्कूल से भाग खड़े हुए, हेडमास्टर पं. रविशंकर शुक्ल (मप्र के प्रथम सी एम) द्वारा जमकर बेतों से पीटे गये।14वीं शताब्दी में बख्शी के पूर्वज लक्ष्मीनिधि राजा के साथ मण्डला से खैरागढ़ आये थे, तब से यहीं बस गये। पूर्वज फतेह सिंह और उनके पुत्र राजा उमराव सिंह दोनों के शासन काल में उमराव बख्शी,राज कवि थे।पदुमलाल बख्शी की प्राइमरी की शिक्षा खैरागढ़ में हुई,1911 में मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में बैठे । हेड मास्टर एन.ए. ग़ुलाम अली के निर्देशन पर नाम के साथ पिता का नाम पुन्ना लाल लिखा गया तब से पूरा नाम पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी लिखने लगे । मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गये।उसी वर्ष 1911 में साहित्यजगत में प्रवेश किया। 1912 में मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास की,उच्च शिक्षा के लिए बनारस के सेंट्रल हिन्दू कॉलेज में प्रवेश लिया। 1916 में ही इनकी नियुक्ति स्टेट हाईस्कूल राजनाँदगाँव में संस्कृत अध्यापक के पद पर हुई। 1913 में लक्ष्मीदेवी से उनका विवाह हो गया। 1916 में उन्होंने बी.ए. की उपाधि प्राप्त की। पदुम लाल पुन्नालाल बख्शी बी.ए. तक शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ साहित्य सेवा के क्षेत्र में आये,सरस्वती में लिखना प्रारम्भ किया। इनका नाम द्विवेदी युग के प्रमुख साहित्यकारों में लिया जाता है।1911 में जबलपुर से निकलने वाली ‘हितकारिणी’ में बख्शी की कहानी ‘तारिणी’ प्रकाशित हो चुकी थी। पदुमलाल ने राजनांदगाँव के स्टेट हाई स्कूल में सर्वप्रथम 1916 से 1919 तक संस्कृत शिक्षक के रूप में सेवा की। पदुमलाल पुन्ना लाल बख्शी ने साहित्यिक जीवन का शुभारम्भ कवि के रूप में किया था।1916 से लेकर लगभग 1925 तक इनकी स्वच्छन्दता वादी प्रकृति की फुटकर कविताएँ तब पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं।बाद में 'शतदल' नाम से इनका एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ। बख्शी को वास्तविक ख्याति, आलोचक,निबन्धकार के रूप में मिली। 1920 में पत्रिका सरस्वती के सहायक संपादक के रूप में नियुक्त किये गये, एक वर्ष के भीतर ही 1921 में सरस्वती के प्रधान संपादक बनाये गये जहाँ वे अपने स्वेच्छा से त्यागपत्र देने (1925) तक उस पद पर बने रहे।1929 से 1949 तक खैरागढ़ के विक्टोरिया हाईस्कूल में अंग्रेज़ी शिक्षक के रूप में रहे,कांकेर में भी कुछ समय तक शिक्षक के रूप में काम किया। तब ‘सरस्‍वती’ हिन्दी की एक मात्र ऐसी पत्रिका थी जो हिन्‍दी साहित्‍य की आमुख पत्रिका थी। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में प्रारंभ इस पत्रिका के संबंध में सभी पाठक जानते हैं। 1921 में वे ‘सरस्‍वती’ के प्रधान संपादक बने, विषम परिस्थितियों में हिन्‍दी के स्‍तरीय साहित्‍य को संकलित कर ‘सरस्‍वती’ का प्रकाशन प्रारंभ किया 'साहि त्य वाचस्पति' पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी' का प्रवेश सर्वप्रथम कवि के रूप में हुआ था। कवि का व्यक्ति त्व जितना सर्वोपरि होगा साहित्य के लिए उतना ही महत्त्वपूर्ण भी। बख्शी जी इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। रचनाओं व्यक्तित्व स्पष्ट परिलक्षित होता है।बख्शी मनसा,वाचा, कर्मणा से विशुद्ध साहित्यकार थे। मान प्रतिष्ठा,पद या कीर्ति की लालसा से कोसों दूर निष्काम कर्मयोगी की भाँति पूरी ईमानदारी और पवित्रता से निश्छल भावों की अभिव्यक्ति को साकार रूप देने की कोशिश में निरन्तर साहित्य सृजन करते रहे। उपन्यास के प्रेमी पाठक होने पर भी खुद को असफल कहते थे, लेकिन इनके उपन्यासों को पढ़ कर कोई यह नहीं कह सकता कि बख्शी असफल उपन्यासकार हैं। प्रसिद्ध कृतियाँ महाकौशल के रविवासरीय अंक का संपादन कार्य भी मास्टरजी ने 1952 से 19 56 तक किया तथा 1955 से 1956 तक खैरागढ़ में रहकर ही सरस्वती का संपादन कार्य किया। तीसरी बार यह 20 अगस्त, 1959 में दिग्विजय कॉलेज राजनांदगांव में हिन्दी के प्रोफेसर बने और जीवन पर्यन्त वहीं शिक्षकीय कार्य करते रहे। इसी मध्य 1949 से 1957 के दरमियान ही मास्टरजी की महत्त्वपूर्ण संग्रह- कुछ, और कुछ, यात्री, हिन्दी कथा साहित्य, हिन्दी साहित्य विमर्श, बिखरे पन्ने, तुम्हारे लिए, कथानक आदि प्रकाशित हो चुके थे। 1968 का वर्ष उनके लिए अत्य़न्त महत्त्वपूर्ण रहा क्योंकि इसी बीच उनकी प्रमुख, प्रसिद्ध निबंध संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें हम- मेरी अपनी कथा, मेरा देश, मेरे प्रिय निबंध, वे दिन, समस्या और समाधान, नव रात्र, जिन्हें नहीं भूलूंगा, हिन्दी साहित्य एक ऐतिहासिक समीक्षा,अंतिम अध्याय को गिना सकते हैं बख्शी की एक पुस्तक 'यात्री' नाम से प्रकाशित हुई है। यह एक यात्रा वृत्तान्त है और इसमें 'अनन्त पथ की यात्रा' का रोचक वर्णन प्रस्तुत किया गया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की सेवाएँ उल्लेखनीय हैं। इन्होंने 1920 ई. से 1927 तक 'सरस्वती' का सम्पादन किया। कुछ वर्षों तक छाया (इलाहाबाद) के सम्पादक रहे।सहज,सरल,आत्मीय व्यक्तित्व के प्रतिमान साहित्यकार बख्शी ने 28 दिसम्बर 1971 को पूर्वान्ह 11: 25 बजे रायपुर के डी. के. हॉस्पिटल में अंतिम सांसे लीं।

विज्ञापन

जरूरी खबरें