: मानव तस्करी का शिकार हुए 13 श्रमिकों की दर्दनाक दास्तां: सामाजिक तिरस्कार का भी कर रहे सामना
Admin Tue, Dec 31, 2024
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अमलीपदर। मैनपुर ब्लॉक के तेंदूपार्टी गांव से मानव तस्करी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। गांव के 13 लोगों को एक दलाल ने आंध्र प्रदेश के बोरा कुंडा गांव में 60,000 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से ईंट भट्टी में छह महीने के लिए बेच दिया।
अत्याचार की पराकाष्ठा
भट्टी में दिन-रात काम करते हुए इन श्रमिकों की तबीयत बिगड़ने लगी। अत्यधिक शारीरिक श्रम और अमानवीय परिस्थितियों से तंग आकर जब इन लोगों ने 24 घंटे के बजाय कम समय काम करने की बात कही, तो ठेकेदार ने फिल्मी अंदाज में पानी में डुबो-डुबोकर उन्हें धमकाना शुरू कर दिया। ठेकेदार ने साफ कहा कि या तो वे काम करें या पैसे वापस करें।
साहस से बचाई जान
इन श्रमिकों ने किसी तरह अपनी जान बचाई और वापस अपने गांव लौट आए। लेकिन, गांव लौटने पर उन्हें उम्मीद के उलट सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड़ा। दलाल के दबाव के कारण गांव वालों ने इन 13 लोगों का हुक्का-पानी बंद कर दिया और उन्हें दो विकल्प दिए—या तो वे वापस काम पर लौटें या गांव में उनका बहिष्कार जारी रहेगा।
दलाल की भूमिका
दलाल, जो इंदागांव का निवासी बताया जा रहा है, धान कटाई खत्म होते ही सक्रिय हो गया था। उसने गरीब और भोले-भाले श्रमिकों को पैसों का लालच देकर फंसाया और आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु के ईंट भट्टों में काम करने के लिए मजबूर किया।
मानव तस्करी का बढ़ता जाल
सर्दी के मौसम में छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के कई मानव तस्कर सक्रिय हो जाते हैं। वे पहले ही एडवांस के तौर पर गरीब मजदूरों को पैसे देकर उन्हें अपना शिकार बनाते हैं। इसके बाद बस और ट्रेनों के माध्यम से उन्हें दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है।
प्रशासन की निष्क्रियता
इस घटना ने प्रशासन की सुस्ती और लापरवाही को उजागर कर दिया है। ऐसे मामलों में श्रम और पुलिस विभाग की सतर्कता जरूरी है। हालांकि, इस दिशा में अब तक कोई ठोस कदम उठाए जाने की खबर नहीं है।
जरूरत है सख्त कार्रवाई की
सरकार और प्रशासन को चाहिए कि ऐसे दलालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करें और ग्रामीणों को जागरूक करें। मानव तस्करी के खिलाफ कड़े कानूनों को सख्ती से लागू करना और श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
सामाजिक तिरस्कार का भी कर रहे हैं सामना
मानव तस्करी का शिकार हुए इन 13 लोगों को न केवल शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी, बल्कि अपने ही गांव में तिरस्कार का सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति समाज के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।
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अमलीपदर। मैनपुर ब्लॉक के तेंदूपार्टी गांव से मानव तस्करी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। गांव के 13 लोगों को एक दलाल ने आंध्र प्रदेश के बोरा कुंडा गांव में 60,000 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से ईंट भट्टी में छह महीने के लिए बेच दिया।
अत्याचार की पराकाष्ठा
भट्टी में दिन-रात काम करते हुए इन श्रमिकों की तबीयत बिगड़ने लगी। अत्यधिक शारीरिक श्रम और अमानवीय परिस्थितियों से तंग आकर जब इन लोगों ने 24 घंटे के बजाय कम समय काम करने की बात कही, तो ठेकेदार ने फिल्मी अंदाज में पानी में डुबो-डुबोकर उन्हें धमकाना शुरू कर दिया। ठेकेदार ने साफ कहा कि या तो वे काम करें या पैसे वापस करें।
साहस से बचाई जान
इन श्रमिकों ने किसी तरह अपनी जान बचाई और वापस अपने गांव लौट आए। लेकिन, गांव लौटने पर उन्हें उम्मीद के उलट सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड़ा। दलाल के दबाव के कारण गांव वालों ने इन 13 लोगों का हुक्का-पानी बंद कर दिया और उन्हें दो विकल्प दिए—या तो वे वापस काम पर लौटें या गांव में उनका बहिष्कार जारी रहेगा।
दलाल की भूमिका
दलाल, जो इंदागांव का निवासी बताया जा रहा है, धान कटाई खत्म होते ही सक्रिय हो गया था। उसने गरीब और भोले-भाले श्रमिकों को पैसों का लालच देकर फंसाया और आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु के ईंट भट्टों में काम करने के लिए मजबूर किया।
मानव तस्करी का बढ़ता जाल
सर्दी के मौसम में छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के कई मानव तस्कर सक्रिय हो जाते हैं। वे पहले ही एडवांस के तौर पर गरीब मजदूरों को पैसे देकर उन्हें अपना शिकार बनाते हैं। इसके बाद बस और ट्रेनों के माध्यम से उन्हें दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है।
प्रशासन की निष्क्रियता
इस घटना ने प्रशासन की सुस्ती और लापरवाही को उजागर कर दिया है। ऐसे मामलों में श्रम और पुलिस विभाग की सतर्कता जरूरी है। हालांकि, इस दिशा में अब तक कोई ठोस कदम उठाए जाने की खबर नहीं है।
जरूरत है सख्त कार्रवाई की
सरकार और प्रशासन को चाहिए कि ऐसे दलालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करें और ग्रामीणों को जागरूक करें। मानव तस्करी के खिलाफ कड़े कानूनों को सख्ती से लागू करना और श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
सामाजिक तिरस्कार का भी कर रहे हैं सामना
मानव तस्करी का शिकार हुए इन 13 लोगों को न केवल शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी, बल्कि अपने ही गांव में तिरस्कार का सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति समाज के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।
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