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5th March 2026

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: प्रदूषित हो रही सिद्ध बाबा की आध्यात्मिक पहाड़ियाँ

सिद्ध बाबा की आध्यात्मिक पहाड़ियों को निगलते हम और हमारी पीढ़ी कितनी दोषी? सतपुड़ा के घने जंगल, नींद में डूबे हुए से, उंधते अनमने  जंगल झाड़ ऊंचे और नीचे चुप खड़े हैं आंख मींचे घास चुप है काँस चुप है मूक साल पलाश चुप हैं बन सके तो धसों इसमें कर सको, कुछ करो मंगल सतपुड़ा के घने जंगल उँघते अननमने जंगल जी हां, कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने तन मन धन से न्यौछावर होने को तत्पर इन सतपुड़ा की पहाड़ियों के घने साल वनों पर मुग्ध होकर यह पंक्तियाँ लिखी होंगी.  इसी सतपुड़ा की  घाटियों मैं बसा है हमारा मनेन्द्रगढ़.  जिसके आँँचल मे बीता है हमारा बचपन .  इन वनोंं के साथ स्मृतियों की कई कहानियां जुड़ी हैं. जो यादों के झरोखों से कभी भी  हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती हैं.  कहती हैं मेरे साथ यह अन्याय क्यों ? मनेन्द्रगढ़ के दक्षिण दिशा एवं छत्तीसगढ़ राज्य के पश्चिमी द्वार पर प्रहरी की तरह मनेन्द्रगढ़ की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर सिद्ध बाबा पर हमें गर्व है लोगों की आस्था का केंद्र भगवान भोलेनाथ का मंदिर अब इन आस्थाओं के साथ भी जुड़ गया है कि सिद्ध बाबा मंदिर का कायाकल्प और समृद्धि पर ही मनेन्द्रगढ़ की प्रगति निर्भर है.  आपको जानकारी होगी कि सिद्बबाबा की  यह पहाड़ी मध्य भारत की चर्चित सतपुड़ा की पहाड़ियों की श्रृंखला का एक हिस्सा है.  पूर्व में छोटा नागपुर तक अपना आंचल फैलाए साल वनों एवं सांस्कृतिक विरासतों के रिश्तों में बँधी यह सतपुड़ा पहाड़ी आगे मैकल पर्वत श्रेणी से  मिलकर पवित्र सोन एवं नर्मदा नदी को जन्म देती है. इसी की दरारों और घाटियों में बसा मनेन्द्रगढ़ का यह हिस्सा एक आध्यात्मिक कॉरिडोर का निर्माण करती है,  जिसमें साल ( सरई) , गुड़मार, पलाश,(टेसु) , हर्रा, बहेरा,आंवला, चिरायता,लट्मार, कुल्लू, संजीवनी बूटी  सहित जाने कौन-कौन पेड़ों के मिश्रित वनों से समृद्ध भोले बाबा का सिद्ध बाबा मंदिर के साथ-साथ जड़ी बूटियां से परिपूर्ण यह जंगलों की एक लंबी श्रृंखला धीरे-धीरे आगे बढ़ती है. मनेन्द्रगढ़ के सिद्ध बाबा मंदिर तक पहुंचने के लिए साँप की तरह टेढ़े मेढ़े  आकार के राष्ट्रीय राजमार्ग एवं उसके आसपास फैले साल वनों के जंगलों का मोहक दृश्य और  पहाड़ियौं की लंबी श्रंखलायें हमें आकर्षित करती रही हैं. हालांकि सघन वनों का यह क्षेत्र धीरे-धीरे उजड़ता जा रहा है.  अब इसके चट्टानी इलाकों में पौधे नहीं उगते और उसकी दरारों  में पनपने वाले पुराने पेड़ काटे जा चुके हैं.  इतना ही नहीं मुख्य मार्ग के भीतरी हिस्सों में यह कटाई आज भी जारी है. एक लुटेरे हत्यारे की तरह पहले पेड़ों को नीचे एक मीटर उंचाई  तक छील दिया जाता है, फिर उनके सूखने का इंतजार करते हैं. टुकड़े टुकड़े में मरते वृक्ष की पत्तियां, डाल, एक-एक कर सूख कर जब  नीचे गिर जाती है तब  उन्हें काट लिया जाता है.  वैसे तो इन वनों की रखवाली के लिए वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग जैसी शासकीय संस्थाएं है जो शायद इस तरह के कटाव कार्य को देखते-देखते अब थक चुकी हैं और इस बिरले हो चुके जंगलों की गहराइयों और दरारों  को नगर पालिका एवं  इससे जुड़ी  संस्थाओं को कचरा डंप करके  प्रदूषित जलवायु परिवर्तन के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं. नगर के बुजुर्गों का कहना है कि उन्नीसवीं शदी के आठवें दशक तक पहले मनेन्द्रगढ़ नगर से बाहर निकलते ही सिद्ध बाबा पहाड़ी के पास इतने घने जंगल थे कि  घने जंगलों की हवा की  सरसराहट शाम के अंधेरे के पैर  पसारते  ही एक डर पैदा कर देती थी.  अक्सर खोगापानी जाने वाले गोरखपुरी कैम्प के मजदूर, सामान ढोने वाली बैलगाड़ियों में बैठे हरवाह और  उस मार्ग से गुजरने वाले यात्री और नागरिक  सड़क की उस ऊंचाई पर पहुंचकर बजरंगबली को याद कर एक पत्थर वहीं फेंक दिया करते थे,  यह कहते हुए कि आपने हमें यहां तक सुरक्षित पहुंच दिया.  अब वहीं पर कुछ सन्यासियों  ने जन सहयोग से हनुमान जी का एक मंदिर बना दिया गया है.  इस मंदिर के किनारे अब मंदिरों की श्रृंखला में  एक माता जी  का मंदिर भी स्थान ले चुका है.  अभी तक जबहम सभी मनेन्द्रगढ़ के पश्चिमी द्वार से आगमन के लिए इसी राष्ट्रीय राजमार्ग के घुमावदार रास्ते से आते थे. तब लोग अपने कार की खिड़कियां खोलकर इन्ही सतपुड़ा की पहाड़ियों का आनंद लेते थे.  बसंत ऋतु मे साल वनों के साथ-साथ महुआ एवं पलाश के फूलों की सुगंध आपको भीतर तक आनंदित कर देती थी और एक जोर की सांस लेकर फेफड़ों को और मजबूत करने की प्रेरणा देती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है यदि आप जंगलों की छवि देखने के लिए अपनी  कार के कांच खोलेंगे, तब एक बदबूदार हवा का झोंका आपके फेफड़ों में भर जाएगा.  दो पहिया वाहन से चलने वाले यात्री एवं नागरिक तब मुंह में रुमाल या गमछा बांधना प्रारंभ कर चुके हैं.  प्राकृतिक सौंदर्य के स्थान पर अब कचरे के ढेर में मुंह मारते कुत्ते और गाय बैल और  जानवरों के साथ गंदगी में चोंच मारते की चील, कौवे, बगुला के कई  झुंड मिल जाएंगे.आप जरा हिम्मत करके रोड से किनारे गहराई की ओर जाने की हिम्मत जुटायेंगे तब आपको घुमावदार रोड पर सड़क से उत्तर दिशा की ओर जरा गड्ढे में उतरने पर लगभग 1 किलोमीटर तक कचरे के ढेर की लंबी श्रृंखला मिल जाएगी. जगह जगह मक्खियों की नई  प्रजातियों के झुंड  बिना किसी शोध के मिल जाऐंगे. हमारी इसी रिपोर्ट की फोटोग्राफी करके लौटते समय मनेन्द्रगढ़ नगर पालिका की कचरा गाड़ी कचरा डंप करने हेतु ऊपर जाती हुई जब दिखाई पड़ी, तब हवा के झोंके ने इस जलवायु परिवर्तन के सम्पूर्ण किस्से कहानियों की किताब  के कई पन्ने एक साथ पलट कर रख दिए. आज चलती कलम कई प्रश्न लेकर खड़ी है किससे करें शिकायत?  कौन दोषी?  साफ सफाई में अपने नगर का अवार्ड पाने वाली नगर पालिका मनेन्द्रगढ़ से , या छत्तीसगढ़ वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग मनेन्द्रगढ़ के अधिकारियों से या जिले के मुखिया जिला कलेक्टर से सभी जगह से एक मौन के सिवाय कुछ सुनाई नहीं देता?

पर्यावरण चिंतक की कलम लिखने को बाध्य है की प्रकृति ने हमें जीने और जीवन को बचाने के लिए हवा (आक्सीजन) दिया है. आनंद की प्राप्ति के लिए प्राकृतिक दृश्य, फूल, फल और सुगंधित हवाएं दी है. जीवन के उपचार के लिए वन औषधीयाँ दी है. पीने के पानी के लिए नदियां, तालाब और झरने दिए हैं. प्राकृतिक वातावरण और आनंद के लिएवनों से भरी उँची नीची पहाड़ियों की अकूत प्राकृतिक संपदा दी है.  विवेक और बुद्धि भी दिया है. लेकिन जब हम स्वयं उसे टुकड़े-टुकड़े में नष्ट करने पर तुले हुए हैं तब मानव जीवन को समाप्त करने वाले इस दुस्साहस को हम आत्महत्या के सिवाय और क्या नाम दे सकते हैं? क्या कहूं,  किससे कहूं,  बस इतना ही कहना चाहूंगा कि- *इस घर को आग लग गई, घर के चिराग से* शेष अगले अंक में --–---

https://youtube.com/shorts/XBA1mfeuLJs?si=yz0xfNf_shqMkCBQ

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