छत्तीसगढ़ में आरटीआई अधिनियम : आरटीआई की आत्मा को मारती चुप्पी: करोड़ों का जुर्माना, पर वसूली नहीं, दोषी कौन?
Praveen Nishee Sat, Apr 5, 2025

अशोक श्रीवास्तव की कलम से
मनेंद्रगढ़। एमसीबी। छत्तीसगढ़ में आरटीआई अधिनियम को लेकर एक बेहद गंभीर और चिंताजनक स्थिति सामने आई है। यह केवल लापरवाही की कहानी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित प्रशासनिक उदासीनता की दास्तां है, जिसमें करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ, और जिम्मेदार अधिकारी आज़ाद घूम रहे हैं — जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
जन सूचना अधिकार अधिनियम (RTI Act) उस उम्मीद का नाम है जिससे आम आदमी को सिस्टम से जवाब मिलता है। लेकिन जब यही सिस्टम उस जवाबदेही को कुचलने लगे, तो सवाल उठाना लाज़िमी हो जाता है।
जुर्माना लगा, लेकिन वसूली रुकी — क्यों?
राज्य सूचना आयोग ने 2493 जन सूचना अधिकारियों पर 4.81 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। कारण साफ था — सूचना छुपाना, देर से देना या जानबूझकर टालना। लेकिन वसूली सिर्फ 42 लाख की? बाकी 4.39 करोड़ की रकम कहां गई?
सरकार के राजकोष से नहीं, ये रकम उन अफसरों से वसूल होनी थी जो कानून का मखौल बना रहे थे। लेकिन वसूली नहीं हुई। क्यों? क्या ये सीधी-सीधी शह नहीं?
जब आयोग के आदेश भी कागज़ बनकर रह जाएं...
राज्य सूचना आयोग ने वसूली के लिए विभागीय सचिवों, प्रमुखों, यहां तक कि सामान्य प्रशासन विभाग को पत्र पर पत्र लिखे। लेकिन सरकारी चुप्पी बोलती रही। जवाबदेही तय करने वाला तंत्र ही अब जवाब देने से बच रहा है।
मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की चुप्पी क्या इशारा कर रही है?
जब शासन का सर्वोच्च तंत्र भी इस लापरवाही पर मौन है, तो यह चुप्पी और खतरनाक हो जाती है। क्या मुख्यमंत्री कार्यालय को यह जानकारी नहीं? क्या मुख्य सचिव इस पर कार्रवाई नहीं कर सकते? या फिर सत्ता का तंत्र अब जवाबदेही से ऊपर हो गया है?
एक कानून जो उम्मीद था, अब मज़ाक बनता जा रहा है...
आरटीआई को कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माना गया था। लेकिन जब अफसर उस हथियार की धार को कुंद करने लगें, और सरकारें चुप बैठी रहें, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
अब भी वक्त है...
अगर सरकार अब भी नहीं जागी, तो यह मामला सिर्फ वसूली का नहीं रहेगा, बल्कि एक संवैधानिक और नैतिक विफलता का दस्तावेज़ बन जाएगा।
क्या आप भी सवाल पूछेंगे?
यदि आपको लगता है कि आरटीआई कानून की आत्मा बची रहनी चाहिए — तो सवाल उठाइए। सरकार से, अफसरों से, और खुद से भी।
क्योंकि एक लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध सवाल न पूछना होता है।
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