800 से 1000 एकड़ हिस्सा पूरी तरह उजाड़ दिया गया : पेड़ लगाने के नारे, जंगल उजाड़ने की तैयारी कोतरा डंगरी में सिस्टम के संरक्षण में पनपता ‘हरा घोटाला’
Praveen Nishee Sun, Dec 21, 2025
अमलीपदर। गरियाबंद। देशभर में “एक पेड़ माँ के नाम” जैसे अभियानों की गूंज है। सरकारी मंचों से हरियाली बचाने की कसमें खाई जा रही हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के अमलीपदर अंचल से सामने आई तस्वीरें इन अभियानों को आइना दिखाने के लिए काफी हैं।
हम बात कर रहे हैं कोतरा डंगरी और खरीपथरा क्षेत्र की—जो आधिकारिक तौर पर संरक्षित वन क्षेत्र के दायरे में आता है। यह वही इलाका है, जहां कुछ साल पहले तक सघन जंगल, वन्य जीव और जैव विविधता की भरमार थी। आज उसी जंगल का करीब 800 से 1000 एकड़ हिस्सा पूरी तरह उजाड़ दिया गया है। जंगल नहीं, अब खेत और कॉलोनी दिखाई देती है
जहां कभी साल, सागौन और महुआ के पेड़ खड़े थे, वहां अब मक्का और उड़द की खेती,पक्की-पगडंडियां और सड़कें,बड़े-बड़े अनाज कोठार और जंगल की ज़मीन पर उगते अवैध गांव सब कुछ खुलेआम दिखाई देता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वन विभाग का दावा है—“हमें जानकारी नहीं थी।” लेकिन इतने बड़े पैमाने पर हो रहे इस विनाश पर “अनजान” होना, खुद में कई सवाल खड़े करता है।
किसके इशारे पर बसे जंगल के बीच गांव?
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि उड़ीसा के नवरंगपुर और छत्तीसगढ़ के बस्तर–जगदलपुर इलाकों से लोगों को योजनाबद्ध तरीके से जंगल की ज़मीन पर बसाया गया।आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में कुछ स्थानीय बिचौलिये और वन विभाग के निचले स्तर के कर्मचारी एक सुनियोजित नेटवर्क के रूप में काम कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि जंगल काटकर की जा रही खेती से हर साल मोटी रकम ‘कमीशन’ के रूप में वसूली जा रही है।
यानी—
जंगल कटे, फसल उगे, पैसा बने… और सिस्टम मौन रहे। 20 किलोमीटर का सफर, 20 साल का विनाश, कोतरा डंगरी से बंदपारा चौक तक करीब 20–25 किलोमीटर क्षेत्र का जायजा लिया। जो दृश्य सामने आया, वह किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोर सकता है। दोनों ओर कटे हुए जंगल, नई बनी सड़कें ,दूर-दूर तक फैले मक्का के खेत और सबसे डरावना—पूरे रास्ते में न कोई पक्षी, न कोई जानवर, न कोई प्राकृतिक आवाज़। यह इलाका अब ‘साइलेंट ज़ोन’ बन चुका है।
कटाई चल रही थी, निगरानी गायब
टीम के दौरे के दौरान ही कई स्थानों पर जंगल की अवैध कटाई प्रत्यक्ष रूप से होती दिखी। लेकिन इतने बड़े क्षेत्र में न कोई वनरक्षक,न बीट गार्ड और न कोई निगरानी देखने को मिली । यह सवाल अपने आप में बड़ा है कि संरक्षित वन क्षेत्र आखिर किसके संरक्षण में उजड़ रहा है?एक परिवार, 20 एकड़ जंगल साफ सूत्रों के अनुसार, इन अवैध बस्तियों में रहने वाले परिवारों ने औसतन 5 से 7 एकड़ और कई मामलों में 15 से 20 एकड़ तक जंगल साफ कर ज़मीन पर कब्जा कर लिया है।
अनुमान है कि 3–4 अवैध गांव, 200 से अधिक परिवार और हजारों एकड़ जंगल लगातार खत्म किया जा रहा है—वह भी 2009 से अब तक। शिकार और सन्नाटा,एक और गंभीर आरोप यह भी है कि इन इलाकों में वन्य प्राणियों का शिकार किया जा रहा है। यही वजह है कि कभी जीवंत रहा जंगल आज पूरी तरह खामोश है।
मक्का की बंपर खेती, जंगल की कीमत पर
अमलीपदर क्षेत्र में मक्का की खेती में अचानक आई तेजी ने स्थानीय व्यापारियों को भी चौंकाया। जांच में साफ हुआ कि यह बढ़ोतरी सीधे-सीधे जंगल काटकर खेती करने से जुड़ी है। सरपंच का बयान_ दस्तावेज़ों में गांव ही नहीं खरीपथरा के सरपंच पुनीत ध्रुव बताते हैं—“10–15 साल पहले यहां घना जंगल था। आज वहां खेती और बसाहट है। हैरानी की बात यह है कि जिन गांवों की बात हो रही है, वे किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हैं, फिर भी कहीं सोलर प्लेट, कहीं राशन जैसी सुविधाएं पहुंच रही हैं।”अधिकारी बोले—जांच कराएंगे सामान्य वन मंडल के जिला अधिकारी सच्चिगानंद के. का कहना है— “एसडीओ के माध्यम से जांच कराई जाएगी कि कहां-कहां अवैध खेती और बसाहट है।” लेकिन असली सवाल यही है— जब सालों से जंगल कट रहा था, तब जांच क्यों नहीं हुई? पट्टा बना जंगल उजाड़ने का हथियार सूत्र बताते हैं कि यहां एक पुराना पैटर्न चलता आ रहा है— पहले जंगल काटो , कब्जा करो ,केस झेलो किसी तरह पट्टा पाओ और फिर अगली पीढ़ी के लिए नया जंगल काट दो।
इस खेल में
जहां जंगल हार रहा है,वन्य जीव खत्म हो रहे हैं और पर्यावरण की कीमत चुकाई जा रही है। अब सवाल लाजिमी हैं— क्या वन विभाग सच में अनजान है? या जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है? कब होगी इन अवैध गांवों की पहचान और बेदखली? और कब रुकेगा जंगल को खेत और कॉलोनी में बदलने का यह खेल? कागज़ों में पर्यावरण बचाने की योजनाएं हैं, लेकिन ज़मीन पर जंगल रोज़ कट रहे हैं।
अब देखना यह है कि
कोतरा डंगरी और खरीपथरा की यह कहानी सिर्फ खबर बनती है— या फिर जंगल को इंसाफ़ मिलता है ।

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