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: छत्तीसगढ़ के 'डमरू' में मिल चुके हैँ बुद्ध के छोटे पदचिन्ह..

Admin Thu, Jan 2, 2025

छग के बलौदाबाजार जिले से 14 किमी दूर स्थित ग्राम डमरू की पुरातात्विक खुुदाई के दौरान पहली बार ही भगवान बुद्ध के चरणों का चिन्ह मिला है। चिन्ह मध्यभारत में पहली बार मिला है। पुरातत्वविदों की मानें तो बौद्ध धर्म हीनयान समुदाय के लोग यह पद चिन्ह पहली से पांचवीं सदी के बीच बना उसकी पूजा करते थे, भगवान बुद्ध के पदचिन्ह मिलना इस बात का प्रमाण है कि पहली से पांचवीं सदी के बीच डमरू हीनयान समुदाय का प्रमुख केंद्र रहा होगा। डमरू में कुछ बरस से खुदाई चल रही है।बौद्ध धर्म हीनयान -महायान में बंटा हुआ था। बुद्ध निर्वाण के बाद सबसे पहले हीनयान समुदाय की शुरुआत हुई। इस समुदाय के लोग बुद्ध की प्रतिमा नहीं बनाते थे, बल्कि बुद्ध से संबंधित प्रतीक चिन्हों, स्तूप,त्रिरत्न और पदचिन्हों का निर्माण कर उपासना, पूूजा की जाती थी। यह भारत के साथ हीनयान परंपरा को माननेवाले श्रीलंका में भी मिलता है। बोधिवृक्ष की पत्तियों पर उकेरा गया ... बोध गया स्थित बुद्ध मंदिर में पद्मपीठ पर भगवान बुद्ध के चरण चिन्ह उकेरे गए हैं, लेकिन डमरू में मिले चरण चिन्ह बिल्कुल अलग हैें। ये स्थानीय स्तर पर मिले प्रस्तर खंड में बने हैं।गोलाकार प्रस्तर पर बोधिवृक्ष की 12 पत्तियों के बीच बुद्ध के पद चिन्हों को उकेरा गया है। पदचिन्हों के दोनों पार्श्व में मछलियों को कलात्मक ढंग से उकेरा गया है। पद चिन्हों के निचले भाग में प्रतीकात्मक रूप से धर्मचक्र उकेरा गया है। बाजुओं में उकेरी गई मछलियां, धर्म चक्र मिल कर अंग्रेजी के डब्ल्यू अक्षर का आकार बनाते हैं, जिसे बौद्ध धर्म के त्रिरत्न चिन्ह से समीकृत किया जाता है। दूसरी सदी ईसा पूर्व से पांचवीं सदी के बीच भारत में भगवान बुद्ध के पदचिन्हों के निर्माण की परंपरा दूसरी सदी ईसवी पूर्व से पांचवीं शताब्दी तक होती रही है। इस लिहाज से डमरू में चरणचिन्ह मिलना इस स्थान को पहली शता ब्दी से पांचवीं शताब्दी के बीच हीनयान बौद्ध धर्म के बड़े केंद्र के रूप में ही प्रमाणित करता है। यात्राओं में होता रहा होगा उपयोग... डमरू में मिला भगवान बुद्ध का पदचिन्ह अब तक मिले पद चिन्हों में सबसे छोटा है।छोटे आकार को देखकर अनुमान लगाया जा रहा है कि पदचिन्ह का उपयोग बौद्ध भिक्षुओं द्वारा धार्मिक यात्रा के दौरान उपा सना के लिए किया जाता रहा होगा। पहले मिले बुद्ध के पदचिन्ह इतने अधिक बड़े हैं कि कहीं ले जाया नहीं जा सकता। डमरू में मिले भगवान बुद्ध के चरण चिन्हों के मिलने से छत्तीसगढ़ के इतिहास की महत्व पूर्ण कड़ियां जुड़ रही हैं। यह शोधार्थियों और विषय विशेषज्ञों के लिए अत्याधिक महत्वपूर्ण है।पहले मध्य भारत में अलग से तथागत के पद कहीं नहीं मिले। यह छत्तीसगढ़ के पुरातात्विक केंद्र को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए पर्याप्त है!

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