“खून से लथपथ इंसान… और कैमरे के सामने ‘संवेदनहीन सिस्टम’! : 1000 रुपए देकर वन विभाग ने कराया फोटोशूट,पत्नी की चीखें भी नहीं पिघला सकीं दिल” मानवता को झकझोर देने वाली खबर
Praveen Nishee Tue, Mar 17, 2026
गरियाबंद। (रोशन लाल अवस्थी की कलम से ) छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिला से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने न सिर्फ प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि इंसानियत को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
यहां एक तरफ जंगल में भालू के हमले से गंभीर रूप से घायल व्यक्ति दर्द से कराह रहा था, तो दूसरी ओर वन विभाग के अधिकारी उसी घायल और उसकी रोती-बिलखती पत्नी के साथ फोटो खिंचवाने में व्यस्त नजर आए।
महुआ बीनने गया था, मौत से जूझता लौटा
घटना गरियाबंद वन मण्डल अंतर्गत सड़क परसूली वन परिक्षेत्र के कोचईमुड़ा गांव की है, जहां ग्रामीण (राम यादव) महुआ बीनने जंगल गया था। इसी दौरान एक खूंखार भालू ने उस पर अचानक हमला कर दिया।हमले में राम यादव के सिर, चेहरे और हाथ बुरी तरह जख्मी हो गए। खून से लथपथ हालत में उसे किसी तरह गांव लाया गया, जहां से परिजनों ने तत्काल वन विभाग को सूचना दी।
‘मदद’ के नाम पर फोटोशूट!
घायल को जिला अस्पताल लाया गया, लेकिन यहां जो हुआ उसने सबको स्तब्ध कर दिया।
वन विभाग की टीम ने प्राथमिक उपचार और बेहतर इलाज की व्यवस्था करने के बजाय ‘फौरी राहत’ के नाम पर मात्र 1000 रुपए (500-500 के दो नोट) थमाए—और फिर उसी दौरान घायल की रोती हुई पत्नी के साथ फोटो खिंचवाने लगी।
वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि एक ओर घायल दर्द से तड़प रहा है, वहीं दूसरी ओर अधिकारी कैमरे के सामने ‘मदद’ का प्रदर्शन कर रहे हैं।
“एंबुलेंस नहीं, इंतजार और पीड़ा”
परिजनों के मुताबिक, घायल करीब आधे घंटे तक तड़पता रहा, लेकिन एंबुलेंस मौके पर नहीं पहुंची।
परिवार लगातार बेहतर इलाज के लिए रायपुर रेफर करने की मांग करता रहा, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था की सुस्ती ने हालात और बिगाड़ दिए।
“गरीबी की मजबूरी, सिस्टम की बेरुखी”
गरियाबंद और आसपास के ग्रामीण इलाकों में महुआ बीनना लोगों के लिए शौक नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का जरिया है।
ऐसे में जंगल जाने वाले ग्रामीण हर दिन खतरे के बीच जीवन यापन करते हैं।
लेकिन इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि—
क्या सरकारी तंत्र की प्राथमिकता इंसान की जान है या सिर्फ कागजी ‘उपलब्धि’ दिखाना?
मानवता हुई शर्मसार
इस पूरे घटनाक्रम ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जहां एक ओर घायल व्यक्ति जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा था, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार अधिकारी संवेदनहीनता की हद पार करते नजर आए।
यह घटना सिर्फ एक लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की उस सोच को उजागर करती है, जहां ‘फोटो’ इंसान से ज्यादा अहम हो गया है।
गरियाबंद की यह घटना प्रशासन के लिए एक कड़ा संदेश है—
मदद दिखाने से नहीं, करने से साबित होती है,और जब सिस्टम संवेदनहीन हो जाए, तो सबसे बड़ा शिकार इंसानियत ही होती है।

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