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: दीपावली की रौनक में गुम होती गरीबों की उम्मीदें

Admin Wed, Oct 30, 2024

अयोध्या के 14 वर्ष वनवास के बाद भगवान श्रीराम की वापसी का जश्न मनाने के प्रतीक दीपावली का त्योहार देशभर में रोशनी से जगमगा उठता है। हर साल मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की धूम होती है, परिवार और दोस्तों के बीच खुशियां बांटी जाती हैं। हर साल दीपावली के मौके पर बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों का खास ख्याल रखती हैं, बोनस, उपहार और पर्व की बधाइयां देते हैं। लेकिन इस चकाचौंध में अक्सर कुछ ऐसे लोग रह जाते हैं जिनके पास खुशियों की चमक तो दूर, दीये जलाने के लिए तेल तक नहीं होता। देश में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की संख्या बहुत बड़ी है। ये वो लोग हैं जो न तो अपने बच्चों के लिए नए कपड़े ला सकते हैं, न ही मिठाइयों का इंतजाम कर सकते हैं। ऐसे में दीपावली उनके घरों में एक साधारण दिन की तरह गुजर जाती है। समाज के इस तबके तक खुशियां पहुंचाने वाला कोई नहीं है। चुनाव के समय तो सफेदपोश नेता हर गली-कूचे में नजर आते हैं, हर किसी से वादे करते हैं, गरीबों का हाल जानने की बात करते हैं, लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होता है, उनकी नजरें फिर इन्हीं कमजोर तबकों से हट जाती हैं। गरीब बच्चों के लिए दीपावली का मतलब अपने पिता का इंतजार करना होता है, उम्मीद होती है कि शायद कुछ मिठाई या एक छोटा सा खिलौना घर आ जाए। ये मासूम चेहरों पर खुशियों की लकीर लाने की जिम्मेदारी सिर्फ पिता पर होती है, लेकिन कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण वो भी निराशा के सिवा कुछ नहीं ला पाते। राजनेता अक्सर दीपावली के मौके पर बड़ी-बड़ी पार्टियों में शामिल होते हैं, समाज के उच्च वर्ग के बीच पहुंचते हैं, परंतु गरीब बस्तियों की ओर शायद ही उनका ध्यान जाता है। यदि इस त्यौहार पर इन मासूमों और गरीबों के बीच भी समाज के उच्च वर्ग के लोग पहुंचते, तो शायद दीपावली की असल रोशनी हर घर तक पहुंच पाती। ये समाज का कर्तव्य है कि वो अपने आसपास के कमजोर तबके को भी इस खुशी में शामिल करे, ताकि धन और साधनों के बिना भी हर घर में दीपावली की खुशी महसूस की जा सके।

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