: आज के चर्चित चेहरे, नगर के सुख्यात कवि, साहित्यकार गंगा प्रसाद मिश्र, जो बचपन से ही शिक्षक और सैनिक बनना चाहते थे
Admin Wed, Dec 11, 2024
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मनेन्द्रगढ़/बहुत कम लोग हैं जो बचपन में जो बनना चाहते थे वही बने ऐसे ही नगर के सुख्यात कवि, साहित्यकार गंगा प्रसाद मिश्र हैं जो बचपन से ही शिक्षक और सैनिक बनना चाहते थे जिनका जन्म 30 जुलाई 1951को रीवा के सुदूर गांव खामडीह के कृषक परिवार में हुआ था प्राथमिक शिक्षा गांव में ही हुई और शेष शिक्षा गूढ़ कस्बे में हुई शुरुआत में ही उनका चयन मनचाहा हो गया था एएमसी(सेना का चिकित्सा विभाग) लेकिन पारिवारिक विरोध के कारण वहां नहीं जा सके फिर 18/04/1972 को शिक्षक पद के लिए इनका चयन हुआ मनेन्द्रगढ़ के कोड़ा (नेवरी) गांव में और तब से मनेन्द्रगढ़ में ही बस गए हैं सेवानिवृत्त से पहले ही घर बनवा लिया था,आज रामायण आदि ग्रंथ पढ़ने वाले कम हैं लेकिन वे कक्षा दूसरी से ही रामायण पढ़ रहे हैं और जब तक नेत्र ज्योति ठीक रही तब तक निरंतर पढ़ते रहे,बचपन से ही पहलवान बनने का शौक था तब एक सांस में 100 दण्ड मार लेते थे, लम्बी कूद में 24.5 फीट कूद लेते थे कक्षा सातवीं से ही योगासन की ओर रुझान बढ़ा तो चार्ट, पम्पलेट देखकर सीखा जो निरंतर जारी है और यही उनके स्वास्थ्य का कारण है आत्मविश्वास और जिद ऐसी है कि सेवानिवृत्त के बाद वर्ष 2005 में पथरी, शुगर आदि के कारण बीमार हुए जांच (सोनोग्राफी वगैरह)के बाद डाक्टर ने कहा कि अब आपके पास अधिक से अधिक तीन माह का समय है इससे अधिक आपका जीवन नहीं बचा है लेकिन आत्मविश्वास और जीवट जिजीविषा से भरे गंगा प्रसाद जी को ये चुनौती लगी फिर योगाभ्यास, प्राकृतिक चिकित्सा, नियमित दिनचर्या से मृत्यु को अभी तक पछाड़ रहे हैं कहां तीन माह और कहां बीस साल वर्तमान शिक्षा व्यवस्था से निराश हैं उनका कहना है शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को कठिन बनाया जाना चाहिए और आरक्षण से मुक्त रखना चाहिए ऐसे शिक्षकों की भर्ती हो जो शिक्षक ही बनना चाहते हैं, आरक्षण से आने वाले शिक्षक हमेशा योग्य हों ऐसा संभव नहीं है
शिक्षक बनने के बाद साहित्य में रुचि जागृत हुई तो कविता संग्रह, नाटक संग्रह सहित वैचारिक निबंधों की अब तक आठ किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं इसी संदर्भ में उनके एक आलेख में उन्होंने कहा कि "चुनाव प्रचार भी भ्रष्टाचार का जनक है,जो प्रत्याशी करोड़ों रुपए खर्च करके चुनाव जीतेगा वह सबसे पहले अपने खर्च की भरपाई करेगा जो बिना भ्रष्टाचार के संभव नहीं है"
साहित्यकारों के लिए उनका मानना है कि जिसकी कथनी (यानी लेखनी)करनी में अंतर है वह साहित्यकार नहीं है बल्कि पाखंडी है।
क्षेत्र के समकालीन साहित्यकारों में नेसार नाज (बैकुंठपुर) की कहानियां,भोला प्रसाद मिश्र (बैकुंठपुर)की कविताएं और जगदीश पाठक (मनेन्द्रगढ़)के व्यंग्य बहुत पसंद हैं ।
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मनेन्द्रगढ़/बहुत कम लोग हैं जो बचपन में जो बनना चाहते थे वही बने ऐसे ही नगर के सुख्यात कवि, साहित्यकार गंगा प्रसाद मिश्र हैं जो बचपन से ही शिक्षक और सैनिक बनना चाहते थे जिनका जन्म 30 जुलाई 1951को रीवा के सुदूर गांव खामडीह के कृषक परिवार में हुआ था प्राथमिक शिक्षा गांव में ही हुई और शेष शिक्षा गूढ़ कस्बे में हुई शुरुआत में ही उनका चयन मनचाहा हो गया था एएमसी(सेना का चिकित्सा विभाग) लेकिन पारिवारिक विरोध के कारण वहां नहीं जा सके फिर 18/04/1972 को शिक्षक पद के लिए इनका चयन हुआ मनेन्द्रगढ़ के कोड़ा (नेवरी) गांव में और तब से मनेन्द्रगढ़ में ही बस गए हैं सेवानिवृत्त से पहले ही घर बनवा लिया था,आज रामायण आदि ग्रंथ पढ़ने वाले कम हैं लेकिन वे कक्षा दूसरी से ही रामायण पढ़ रहे हैं और जब तक नेत्र ज्योति ठीक रही तब तक निरंतर पढ़ते रहे,बचपन से ही पहलवान बनने का शौक था तब एक सांस में 100 दण्ड मार लेते थे, लम्बी कूद में 24.5 फीट कूद लेते थे कक्षा सातवीं से ही योगासन की ओर रुझान बढ़ा तो चार्ट, पम्पलेट देखकर सीखा जो निरंतर जारी है और यही उनके स्वास्थ्य का कारण है आत्मविश्वास और जिद ऐसी है कि सेवानिवृत्त के बाद वर्ष 2005 में पथरी, शुगर आदि के कारण बीमार हुए जांच (सोनोग्राफी वगैरह)के बाद डाक्टर ने कहा कि अब आपके पास अधिक से अधिक तीन माह का समय है इससे अधिक आपका जीवन नहीं बचा है लेकिन आत्मविश्वास और जीवट जिजीविषा से भरे गंगा प्रसाद जी को ये चुनौती लगी फिर योगाभ्यास, प्राकृतिक चिकित्सा, नियमित दिनचर्या से मृत्यु को अभी तक पछाड़ रहे हैं कहां तीन माह और कहां बीस साल वर्तमान शिक्षा व्यवस्था से निराश हैं उनका कहना है शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को कठिन बनाया जाना चाहिए और आरक्षण से मुक्त रखना चाहिए ऐसे शिक्षकों की भर्ती हो जो शिक्षक ही बनना चाहते हैं, आरक्षण से आने वाले शिक्षक हमेशा योग्य हों ऐसा संभव नहीं है
शिक्षक बनने के बाद साहित्य में रुचि जागृत हुई तो कविता संग्रह, नाटक संग्रह सहित वैचारिक निबंधों की अब तक आठ किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं इसी संदर्भ में उनके एक आलेख में उन्होंने कहा कि "चुनाव प्रचार भी भ्रष्टाचार का जनक है,जो प्रत्याशी करोड़ों रुपए खर्च करके चुनाव जीतेगा वह सबसे पहले अपने खर्च की भरपाई करेगा जो बिना भ्रष्टाचार के संभव नहीं है"
साहित्यकारों के लिए उनका मानना है कि जिसकी कथनी (यानी लेखनी)करनी में अंतर है वह साहित्यकार नहीं है बल्कि पाखंडी है।
क्षेत्र के समकालीन साहित्यकारों में नेसार नाज (बैकुंठपुर) की कहानियां,भोला प्रसाद मिश्र (बैकुंठपुर)की कविताएं और जगदीश पाठक (मनेन्द्रगढ़)के व्यंग्य बहुत पसंद हैं ।
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