: आज के चर्चित व्यक्तित्व - बीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव
Admin Thu, Dec 26, 2024
इस बार के चर्चित व्यक्तित्व बीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव अपने पर्यटन एवं पर्यावरण के साप्ताहिक लेखन के लिए इस समय काफी चर्चा में है इनका परिवार काशी बनारस के गौसपुर गांव से वर्ष 1920 में कोरिया आया था इनके दादा स्वर्गीय पुरुषोत्तम लाल श्रीवास्तव तत्कालीन कोरिया रियासत के राजा रामानुज प्रताप सिंह देव के शिकार दरोगा नियुक्त किए गए थे. उस समय शेरों का शिकार राजा की कीर्ति में शामिल होता था यही कारण था कि उस समय के घने जंगल ढुलकू बिहारपुर और बाहीं जैसे तीन गांव की जमीदारी का कार्य राजा साहब ने इन्हें इनाम में दिया था. पिता स्वर्गीय शिव शंकर श्रीवास्तव समृद्ध कृषक होने के बावजूद रोजी-रोटी के लिए वेटरनरी कंपाउंडर मनेन्द्रगढ़ की नौकरी पर पदस्थ थे. कृषि एवं बागवानी के शौक के कारण इन्हें 1964 में विकासखंड मनेन्द्रगढ़ के श्रेष्ठ बगीचे का सम्मान एवं शील्ड प्राप्त हुआ था.
30 जुलाई 1955 को मनेन्द्रगढ़ के सामान्य परिवार में जन्मे बीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव की प्राथमिक शिक्षा मनेन्द्रगढ़ में औसत छात्र के रूप में हुई अपने मिडिल स्कूल की शिक्षा के समय इन्हें तत्कालीन सांस्कृतिक शिक्षक आर जी कश्यप एवं डी पी भारद्वाज सर के प्रेरणा एवं प्रोत्साहन ने सर्वप्रथम 1965 में जय स्तंभ चौक (वर्तमान राम मंदिर परिसर) मनेन्द्रगढ़ में पहली कविता प्रस्तुति का मौका दिया और इसी के साथ इनकी साहित्यक यात्रा प्रारंभ हुई. यह कविता उनके अग्रज कैलाश नाथ श्रीवास्तव की लिखी हुई थी. 1971 में शास. उ.मा. विद्यालय मनेन्द्रगढ़ से हायर सेकेंडरी करने के बाद इस अंचल के सबसे पुराने कॉलेज लाहिड़ी महाविद्यालय चिरमिरी से इन्होंने बीएससी प्रथम वर्ष की परीक्षा पास की और आगे की शिक्षा के लिए शासकीय महाविद्यालय अंबिकापुर का रुख किया, जहां अपनी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक प्रतिभा का परिचय देते हुए शेक्सपियर द्वारा लिखित "ओथेलो" नाटक में भागीदारी करते हुए प्रथम स्थान प्राप्त किया. नाटक की यही भागीदारी अंबिकापुर आकाशवाणी में अनुमोदित रेडियो नाटक कलाकार चयन का आधार बनी और कई नाटकों में अपनी आवाज दी. छोटे-छोटे लेखन के साथ अपनी पहचान बनाने वाले बीरेंद्र श्रीवास्तव आकाशवाणी के प्रारंभिक काल 1976- 77 से ही युव-वाणी कार्यक्रम के साहित्यकार से सामान्य वार्ता के साहित्यकार का सफर तय किया और धीरे-धीरे कविता, कहानी, व्यंग के एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में उभर कर अंचल में अपनी पहचान बनाई.
1974 में शास. महाविद्यालय अम्बिकापुर से बीएससी शिक्षा पूर्ण करने के बाद कोल इंडिया द्वारा स्थापित माइनिंग डिप्लोमा कॉलेज विश्रामपुर (आर टी आई) में चयनित हो जाने के कारण इन्होंने 1976 से 1979 के बैच में अपना माइनिंग डिप्लोमा पूरा किया और 1981 से एसईसीएल हसदेव क्षेत्र मे जूनियर माइनिंग इंजीनियर की नौकरी ज्वाइन कर ली. लेकिन कोल इंडिया की नौकरी के बाद भी सतत रूप से साहित्य सेवा में भी लगे रहे और तत्कालीन दौर में लघु पत्रिका आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए 1980 में "शुरुआत" नाम की पत्रिका का संपादन माता चरण मिश्रा के साथ संयुक्त संपादन में शुरू किया पहले अंक के बाद स्वयं के संपादन मे लगातार प्रकाशित यह पत्रिका 1995 तक प्रकाशित होने के बाद बंद हो गई. यह पत्रिका अपनी उपलब्धियां में जहां स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जैसे साहित्यकारों को अपने पाठकों में शामिल करती थी, वहीं देश के महानगरों सहित अंचल के साहित्यिक चेतना की एक अग्रणी पत्रिका बन चुकी थी. यही कारण है कि इसमें आज के वर्तमान ख्याति प्राप्त रचनाकार गिरीश पंकज, सतीश जायसवाल, विजय सिंह, विजय गुप्त, अनिल जन्मेजय, कुंवर रविंद्र, डॉ. सतीश देशपांडे, नारायण लाल परमार, बनाफर चंद्र, एवं डा. जयंती भट्टाचार्य जैसे रचनाकारों की रचनाओं को भी स्थान दिया गया.
अपनी चर्चित साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों के कारण बीरेन्द्र श्रीवास्तव 1990 में अविभाजित सरगुजा जिले (वर्तमान सरगुजा संभाग) के साक्षरता अभियान के लिए (ब्रांड एंबेसडर) साक्षरता दूत नियुक्त किए गए. राष्ट्रीय साक्षरता मिशन नई दिल्ली द्वारा नियुक्त इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए एसईसीएल से इनकी सेवाएं वेतन सहित 06 महीने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा मिशन नई दिल्ली को सौंप दी गई थी. सरगुजा जिले के सौ गांवों मे प्रस्तुति एवं रविंद्र भवन ऑडिटोरियम भोपाल के मंच पर सरगुजा जिले के साक्षरता गीतों की प्रस्तुति हेतु तत्कालीन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री सुंदरलाल पटवा जी द्वारा सराही एवं सम्मानित की गई.
सुदीर्घ आजीवन साहित्य सेवा के लिए वागीश सम्मान 2024 से सम्मानित बीरेन्द्र श्रीवास्तव की कलम ने अब तक दो काव्य संग्रह "बरगद की चिंता" वर्ष 1995 मे एवं "आज का एकलव्य" वर्ष 2019 से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है, जो मेघ प्रकाशन एवं ब्लूरोज पब्लिकेशन नई दिल्ली से प्रकाशित है. यह मनेन्द्रगढ़ का गौरव है कि इनकी कविता संग्रह आज का एकलव्य प्रधानमंत्री के निजी संग्रहालय में शामिल है. आगामी फरवरी 2025 में न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से "बीरेंन्द्र श्रीवास्तव, चुनी हुई कविताएं" शीर्षक से एक काव्य संग्रह 6 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय दिल्ली पुस्तक मेला 2025 में लोकार्पित होने जा रही है. मनेन्द्रगढ़ जिले के जाने अनजाने पर्यटन, पिकनिक स्पाट एवं पर्यावरण पर केंद्रित पुस्तक "उत्तरांचल छत्तीसगढ़ का पर्यटन" जिसमें मनेन्द्रगढ़ जिले के जाने अनजाने पर्यटन एवं पिकनिक स्पॉट के ऐतिहासिक दस्तावेजों की जानकारी सहित पुस्तक के जल्द ही प्रकाशन की संभावना है. इसी तरह मनेन्द्रगढ़ के 100 साल के ऐतिहासिक दस्तावेज में कारीमाटी से मनेन्द्रगढ़ तक के उदय और व्यापारिक विकास के ऐतिहासिक दस्तावेज की पुस्तक "छत्तीसगढ़ की कारी माटी मनेन्द्रगढ़" जल्दी ही आपके हाथों में होगी. जो मनेन्द्रगढ़ के उत्थान और पतन की एक अनजानी गाथा होगी वही वर्तमान एवं भविष्य के छात्रों के शोध के लिए संचित सामग्री के रूप में एक धरोहर साबित होगी. वर्तमान में अंचल के पर्यावरण एवं पर्यटन पर लगातार साप्ताहिक लेख लिखने वाले बीरेंन्द्र श्रीवास्तव अपनी लेखन शैली के कारण एक अलग पहचान बना चुके हैं .
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