: विंद्रानावागढ़, फिंगेश्वर जमींदारी और गोद लिये गये महेंद्रबहादुर सिंह.
Admin Thu, Dec 19, 2024
बिंद्रानवागढ जमींदारी का इतिहास शुरु होता है लांजी गढ के राजकुमार सिंघल शाह के छुरा में आकर बसने से...उस समय यहां भुंजिया जाति के राजा चिंडा भुंजिया का शासन था। जमींदारी मरदा जमींदारी कहलाती थी। राजकुमार सिंघलशाह चूंकि राजपुत्र थे, छुरा में बसने से चिंडा भुंजिया को अपना साम्राज्य छिन जाने का भय हुआ,एक दिन राज कुमार को भोजन पर आमंत्रित किया उसको धोखे से विष दे दिया।कुमार सिंघल शाह की मृत्यु हो गई। जब इस घटना की जानकारी उसकी पत्नी को हुई तो वह गर्भस्थ शिशु की प्राण रक्षा के लिए ओडिशा के पटनागढ राज्य में चली गई। वहां एक ब्राम्हण के यहां आश्रय लिया,पहचान छुपाकर रहने लगी। ब्राम्हण,रानी लालन- पालन करने लगा।रानी ने एक बालक को जन्म दिया। जिसका नाम था-कचना धुरवा। पटनागढ में राजा तब रमई देव का शासन था। शनै:शनै:बालक बढता गया उसने अप्रतिम शौर्य,वीरता के कारण राजा की सेना में पहले सैनिक, बाद में सेनापति का पद प्राप्त किया।इस दौरान उसकी माता कचना धुरवा को अतीत के बारे में जानकारी देती रही। कचना धुरवा ने राजा का विश्वास जीता,राजा उसकी बहादुरी पर मुग्ध था। उसके सेवा के बदले में वह कचना धुरवा को कोई बड़ा ईनाम देना चाहता था,समय पाकर कचना ने राजा से मरदा की जमींदारी मांगी।राजा ने भी मरदा की जमींदारी दे दी।फिर कचना धुरवा मरदा आया, चिंडा भुंजिया को मारकर पिता की मृत्यु का बदला लिया। साथ ही एक नई जमींदारी की नींव रखी, नवागढ जमींदारी चूंकि वन बाहुल्य क्षेत्र में स्थित थी, बंदरों से प्रभावित थी, इस लिए कालांतर में नाम नवागढ़ से बेंदरानवागढ (बिन्द्रा नवागढ़) प्रचलित हो गया। बिंद्रानवागढ वैसे एक गांव का नाम है,आज भी मौजूद है। जैसे बस्तर नाम के एक छोटे से गांव के नाम पर बस्तर जिला है वैसे ही बिन्द्रानवागढ़ के नाम पर एक विशाल विधान सभा क्षेत्र बना था।रायपुर गजे टियर के अनुसार इस जमींदारी के अंतर्गत कुल 446 गांव आते थे, यह 1559 वर्ग मील तक फैली थी। 19 01 में यहां की जनसंख्या 61174 थी, गरियाबंद इस जमींदारी का सबसे बड़ा गांव था। इस जमींदारी में गोंड - कमार जनजाति के लोग ही अधिक निवासरत थे।अन्य जाति वर्ग के लोग काफी बाद में आए। कमार जनजाति के लोग बीहड़ वनों में रहना अधिक पसंद करते थे।इस जमींदारी का संबंध भारत के स्वतंत्रता संग्राम से भी रहा है,1857 में देश में स्वतंत्रता संग्राम का आरंभ हुआ। इसके पहले 1856 में छत्तीसगढ़ के सोनाखान क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा,तब वहां के जमींदार वीरनारायण सिंह ने अपनी प्रजा के लिए कसडोल के व्यापारी से अनाज मांगा। जब अनुनय-विनय करने पर भी व्यापारी नहीं माना तो उसके गोदाम को लूट लिया, अनाज गरीब जनता में बांट दिया। इसकी शिकायत उस व्यापारी ने अंग्रेजों से कर दी, अंग्रेज उसकी गिरफ्तारी के लिए आए।नारायण ने विद्रोह कर दिया अंग्रेजों का दुश्मन बन गया। तब अंग्रेज अधिकारियों ने नारायण सिंह को पकड़ने के लिए सैनिक टुकड़ी भेजी। सोनाखान को उजाडकर आग लगा दी गई।इस लड़ाई में दुर्भाग्य ये रहा कि इसमें देवरी,भटगांव,बिलाईगढ और कटगी के जमींदारों ने नारायण सिंह को सहयोग देने के बजाय अंग्रेजों का सहयोग दिया।संबलपुर के जमींदार सुरेंद्र साय ने तो अंग्रेजों का सहयोग नहीं किया।प्रजा पर अंग्रेजों के अत्याचार पर नारायण सिंह ने आत्म समर्पण कर दिया। इस लडाई में देवरी के जमींदार महराजसाय की अहम भूमिका थी। वह रिश्ते में नारायण सिंह के चाचा थे,मगरनिजी शत्रुता निभाने के अंग्रेजों का सहयोग किया,नारायण सिंह को अपराधी मानते हुए ब्रिटिश सरकार ने 10 दिसंबर 1857 को रायपुर में मौत की सजा दी। एक तथ्य यह है कि बिंद्रानवागढ़ का गोंड़ राजवंश था।1915 में चंद्रकांत पाठक द्वारा 'श्रीमद्रा जी वलोचन महात्म्य' ग्रंथ संस्कृत का हिंदी टीका सहित प्रकाशित किया था ग्रंथकार के अनुसार उन्हें फिंगेश्वर के तब के जमींदार दलगंजन सिंह ने जीर्ण हालत में ग्रंथ दिया था,उसे सुधार,व्यवस्थित कर उन्होंने इस महात्म्य को बनाया है। ग्रंथ में वर्णित कहानी के अनुसार गोंड़ राजवंश के पूर्वज देवगढ़ के शासक थे जिन्हें चौहान राजवंश ने पराजित किया था, वे चौहानों के सामंत के रूप में रहते थे।वर्षों बाद देवगढ़ में मुस्लिम आक्रमण हुआ,चौहान पराजित हुए, दो गर्भवती रानियां (एक चौहान और एक गोंड़) वहां भागकर वर्तमान ओडिशा के भवानीपटना (पटनागढ़) पहुंची,दोनों ने एक-एक पुत्र को जन्म दिया, बड़े होकर चौहान के पुत्र रमई सिंहदेव पटनागढ़ के राजा और गोंड़ के पुत्र कचना धुरवा, बिंद्रा नवागढ़ के शासक बने, इस के पूर्व इस राज्य में भुंजिया जाति के शासक थे जिसे कचना धुरवा ने पराजित किया था।कचना धुरवा के तीन पुत्र हुए जो क्रमशः बिंद्रानवागढ़, छुरा और फिंगेश्वर के शासक हुए, दल गंजन सिंहदेव इस राजवंश के17 वीं पीढ़ी के थे, मुगल और मराठा काल में इस वंश का शासन था यह सत्य है।इस वंश का फुलझर के गोंड़ राजपरिवार से वैवाहिक संबंध थे,दलगंजन सिंहदेव के पुत्र न होने के कारण रानी श्यामकुमारी देवी में फुलझर कुमार महेंद्र बहादुर सिंह को गोद लिया था,जो सांसद,विधायक, मंत्री सहित छ्ग राज्य बनने पर प्रोटेम स्पीकर भी बने थे।(यहां यह बताना जरुरी है कि फिंगेश्वर मेरा जन्म स्थान है)
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