Advertisment

22nd June 2026

BREAKING NEWS

वसुंधरा क्लब, हसदेव क्षेत्र में 12वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का गरिमामयी आयोजन

जागृति महिला समिति द्वारा आयोजित चार दिवसीय योग कार्यशाला का गरिमामय समापन

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर योग प्रतियोगिता आयोजित, प्रतिभागियों ने किया उत्कृष्ट प्रदर्शन

स्व.श्री लल्ला सिंह को श्रद्धांजलि, निष्पक्ष जांच और न्याय की मांग

योग प्रतियोगिता में यूनिवर्सल पब्लिक स्कूल ने फिर मारी बाजी; नए सत्र की शुरुआत 'विजयी' आगाज़ के साथ!

: जटायु शिला,रावण से युद्ध और बस्तर में राम का वनागमन..

Admin Tue, Mar 11, 2025

आश्रम में वापस आकर, व्याकुल राम और लक्ष्मण सीता की तलाश में दंडक वन में खोजबीन करने लगे। उस खोज के दौरान,उनकी मुलाकात मरते हुए जटायु से हुई। पक्षीराज जटायु, जिसने सीता के अपहरण की बात राम को बताने के लिए अपनी जान बचाई थी, कैसे रावण ने सीता का अपहरण किया था। जटायु ने बताया कि उसने सीता को बचाने की पूरी कोशिश की, उसने राम को बताया कि कैसे उसने रावण के रथ और उसे खींचने वाले शक्ति शाली खच्चरों को नष्ट कर दिया। हालाँकि,जब राम ने जटायु से पूछा कि सीता कहाँ हो सकती है, सवाल का जवाब देने से पहले ही पक्षी मर गया।क्या छ्ग में रहते थे जटायु, क्या यहां आए थे श्रीराम...!फरस गांव के आगे करीब दो किमी दूर जगदलपुर रोड पर हाईवे 30से नीचे उतर कर दायीं ओर जंगल में 600 मीटर भीतर यह स्थान है,जिसे जटायु शिला कहते हैं। जटायु वही विशालकाय पक्षी है, जिन्होंने रावण के चंगुल से सीता को छुड़ाने का प्रयास करते अपना बलिदान दिया था। माना जाता है कि जिस जगह जटायु रहते थे,जहां रावण से युद्ध हुआ था, वह जगह तब कोशल प्रदेश के दण्डकारण्य और अब के छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में मौजूद है। फरस गांव करीब दो किलोमीटर दूर यह स्थान है,जिसे जटायु शिला कहते हैं।जंगल से घिरे इस क्षेत्र में विशालकाय चट्टान, उस पर अनेक बड़े पत्थर रहस्यमयी ढंग से एक-दूसरे से सटे या खड़ी बनावट में देखने को मिलते हैं। यहां का रास्ता कोई बताता नहीं,यहां कोई संकेतक भी नहीं लगा है। घने जंगल में खोजते आगे बढऩा पड़ता है। यह जंगल में एक ऐसी जगह है, जहां दिन में भी जाने में डर लगे। लोग यहां समूह में ही जाना पसंद करते हैं।घने वन और मनोरम घाटी के बीच छोटी पहाड़ी पर एक सपाट-सी बहुत बड़ी शिला है, विशाल शिला पर अनेक विशाल पत्थर एक दूसरे से सटा कर रखे लगते हैं। देखने से ऐसा लगता है, किसी समय जटायु जैसे बड़े पक्षियों के छिपने के लिए यह जगह गुफा की तरह इस्तेमाल होती होगी।अगर यह शिला जटायु से जुड़ी है, तो यहीं रावण से उनका युद्ध हुआ होगा और यहीं उन्होंने प्राण त्याग होंगे। रामायण में यह विवरण है कि जटायु ने राम की गोद में प्राण त्याग थे, भक्त जटायु का अंतिम संस्कार श्रीराम- लक्ष्मण ने ही किया था।जटायु शिला के दूसरी ओर खाई की दिशा में मां दंतेश्वरी का एक मंदिर भी है। इसे स्थानीय लोग मां दंतेश्वरी की 6 बहनों में से एक मानते हैं, लेकिन इसे भी मां दंतेश्वरी ही कहा जाता है। स्थापित प्रतिमा की खासियत यह है कि मां दंतेश्वरी रूप में विराजमान हैं। मंदिर में महाशिवरात्रि के दिन विशेष पूजा-अर्चना होती है,यहां मेला लगता है। वहीं मुख्य सड़क की ओर एक शिवलिंग भी स्थापित है,जहां मंदिर निर्माणाधीन है। शिवलिंग को स्थानीय निवासी भैरव बाबा के तौर पर भी पूजते हैं। यहां मंदिर का निर्माण जनसहयोग से किया जा रहा है, जटायु शिला के पास ही बसे गांव में पजारीपारा है। जहां रहने वाला पोयाम परिवार जटायु शिला स्थित मां दंतेश्वरी की पूजा के लिए अधिकृत है। यही परिवार शिव मंदिर (भैरव बाबा) की पूजा भी करता है। यहां आदिवासी जटायु शिला के बारे में सुनते जरूर आए हैं,लेकिन कोई ठोस जानकारी नहीं दे पाते हैं।

विज्ञापन

जरूरी खबरें