: जिला शिक्षा अधिकारी का बेलबहरा में आकस्मिक निरीक्षण
Thu, Jan 2, 2025
मनेन्द्रगढ़। एमसीबी। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बेलबहरा में जिला शिक्षा अधिकारी के द्वारा आकस्मिक निरीक्षण किया गया। विद्यालय के संस्था प्रमुख बलराज पाल द्वारा पुष्प गुच्छ देकर जिला शिक्षा अधिकारी अजय मिश्रा का स्वागत किया गया। श्री मिश्रा के द्वारा सभी शिक्षकों का बैठक लेकर निर्देशित किया गया कि 10 जनवरी तक सभी अपने-अपने विषयों के पाठ्यक्रम को पूरा कर बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए सभी विषयों का पुनः अभ्यास कराना प्रारंभ कर दें जिससे कि शतप्रतिशत छात्र-छात्राएं अच्छे अंको से उत्तीर्ण हो। जिला शिक्षा अधिकारी ने छात्र हित में विशेष बातें कहते हुए कहा कि शिक्षकों को अपने-अपने विषयों में मूल्यांकन कार्य करते हुए यदि छात्र ने सही उत्तर लिखा है तो उसके नंबर ना काटते हुए पूर्ण अंक देना सुनिश्चित करें जिससे कि छात्र अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो सके। उन्होंने यह भी बतलाया कि सभी विद्यालयों को निर्देशित किया गया है कि बोर्ड परीक्षा में शतप्रतिशत छात्र- छात्राएं उत्तीर्ण हो तथा सभी कक्षा दसवीं एवं कक्षा 12वीं में कम से कम 40% प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हों। सभी लोग उक्त लक्ष्य को प्राप्ति हेतु मेहनत करें। बोर्ड परीक्षा में सुधार हेतु कक्षा दसवीं एवं कक्षा 12वीं का प्रथम मॉक टेस्ट 6 जनवरी से लेकर से लेकर 14 जनवरी 2025 तक निर्धारित किया गया है जिसमें विद्यार्थियों को बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए मदद मिलेगी और वह परीक्षा के लिए तैयार हो सकेंगे.इसके पश्चात 20 जनवरी से प्री बोर्ड परीक्षा और द्वितीय मोक टेस्ट लिया जाएगा। परीक्षा लेने का आशय यह है कि छात्र-छात्राएं पढ़ाई के साथ-साथ लेखन कौशल में भी निपुण हो जिससे कि अच्छे से अच्छा अंक प्राप्त कर सकें। उन्होंने यह भी कहा की सभी छात्र-छात्राओं का अपार आईडी बनाना भी सुनिश्चित करें और अपार आईडी बनाने में आधार कार्ड एवं जन्म प्रमाण पत्र से संबंधित यदि कोई परेशानी आ रही हो तो उसका निराकरण कर अपार आईडी के लिए भी निरंतर प्रयास करते रहें जिला शिक्षा अधिकारी के द्वारा सभी शिक्षकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं दी गई इस बैठक में प्राचार्य बलराज पाल, प्रभारी प्राचार्य पिपरिया विनोद पांडे, वरिष्ठ व्याख्याता माता प्रसाद द्विवेदी, व्याख्याता दादूराम राठौर, व्याख्याता निर्मल अग्रवाल व्याख्याता, अश्वनी कुमार दुबे, व्याख्याता कमलेश पांडे,व्याख्याता सुनीता मिश्रा, व्याख्याता सुषमा टोप्पो,व्याख्याता नित्यानंद द्विवेदी, व्याख्याता जयंत कुमार देवांगन, व्याख्यात माया वर्मा,व्याख्याता शोभा जयसवाल, व्याख्याता मंजू बघेल, सहायक शिक्षक सुनीता यादव,अतिथि शिक्षक नेहा सिंह उपस्थित थे.
: छत्तीसगढ़ के 'डमरू' में मिल चुके हैँ बुद्ध के छोटे पदचिन्ह..
Thu, Jan 2, 2025
छग के बलौदाबाजार जिले से 14 किमी दूर स्थित ग्राम डमरू की पुरातात्विक खुुदाई के दौरान पहली बार ही भगवान बुद्ध के चरणों का चिन्ह मिला है। चिन्ह मध्यभारत में पहली बार मिला है। पुरातत्वविदों की मानें तो बौद्ध धर्म हीनयान समुदाय के लोग यह पद चिन्ह पहली से पांचवीं सदी के बीच बना उसकी पूजा करते थे, भगवान बुद्ध के पदचिन्ह मिलना इस बात का प्रमाण है कि पहली से पांचवीं सदी के बीच डमरू हीनयान समुदाय का प्रमुख केंद्र रहा होगा। डमरू में कुछ बरस से खुदाई चल रही है।बौद्ध धर्म हीनयान -महायान में बंटा हुआ था। बुद्ध निर्वाण के बाद सबसे पहले हीनयान समुदाय की शुरुआत हुई। इस समुदाय के लोग बुद्ध की प्रतिमा नहीं बनाते थे, बल्कि बुद्ध से संबंधित प्रतीक चिन्हों, स्तूप,त्रिरत्न और पदचिन्हों का निर्माण कर उपासना, पूूजा की जाती थी। यह भारत के साथ हीनयान परंपरा को माननेवाले श्रीलंका में भी मिलता है।बोधिवृक्ष की पत्तियों
पर उकेरा गया ...बोध गया स्थित बुद्ध मंदिर में पद्मपीठ पर भगवान बुद्ध के चरण चिन्ह उकेरे गए हैं, लेकिन डमरू में मिले चरण चिन्ह बिल्कुल अलग हैें। ये स्थानीय स्तर पर मिले प्रस्तर खंड में बने हैं।गोलाकार प्रस्तर पर बोधिवृक्ष की 12 पत्तियों के बीच बुद्ध के पद चिन्हों को उकेरा गया है। पदचिन्हों के दोनों पार्श्व में मछलियों को कलात्मक ढंग से उकेरा गया है। पद चिन्हों के निचले भाग में प्रतीकात्मक रूप से धर्मचक्र उकेरा गया है। बाजुओं में उकेरी गई मछलियां, धर्म चक्र मिल कर अंग्रेजी के डब्ल्यू अक्षर का आकार बनाते हैं, जिसे बौद्ध धर्म के त्रिरत्न चिन्ह से समीकृत किया जाता है।दूसरी सदी ईसा पूर्व से
पांचवीं सदी के बीचभारत में भगवान बुद्ध के पदचिन्हों के निर्माण की परंपरा दूसरी सदी ईसवी पूर्व से पांचवीं शताब्दी तक होती रही है। इस लिहाज से डमरू में चरणचिन्ह मिलना इस स्थान को पहली शता ब्दी से पांचवीं शताब्दी के बीच हीनयान बौद्ध धर्म के बड़े केंद्र के रूप में ही प्रमाणित करता है।यात्राओं में होता रहा
होगा उपयोग...डमरू में मिला भगवान बुद्ध का पदचिन्ह अब तक मिले पद चिन्हों में सबसे छोटा है।छोटे आकार को देखकर अनुमान लगाया जा रहा है कि पदचिन्ह का उपयोग बौद्ध भिक्षुओं द्वारा धार्मिक यात्रा के दौरान उपा सना के लिए किया जाता रहा होगा। पहले मिले बुद्ध के पदचिन्ह इतने अधिक बड़े हैं कि कहीं ले जाया नहीं जा सकता। डमरू में मिले भगवान बुद्ध के चरण चिन्हों के मिलने से छत्तीसगढ़ के इतिहास की महत्व पूर्ण कड़ियां जुड़ रही हैं। यह शोधार्थियों और विषय विशेषज्ञों के लिए अत्याधिक महत्वपूर्ण है।पहले मध्य भारत में अलग से तथागत के पद कहीं नहीं मिले। यह छत्तीसगढ़ के पुरातात्विक केंद्र को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए पर्याप्त है!