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मनरेगा में पारदर्शिता का मॉडल बन रहा : छग का क्यूआरकोड, जीआईएस तकनीक का उपयोग...

Praveen Nishee Sun, Sep 14, 2025

रायपुर।(gdnews) महात्मा गांधी नरेगा कार्यों में पार दर्शिता के लिए डिजिटल क्रांति की शुरुआत हो गई है। इसे और सुलभ बनाने क्यू आर कोड, जीआईएस तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इससे ग्रामीण एक साधारण स्कैन से मनरेगा के तहत स्वीकृत कार्यों, परियोजनाओं व खर्च पर नजर रख सकते हैं। पंचायत व ग्रामीण विकास तथा आईटी विभाग की प्रमुख सचिव निहारिका बारिक सिंह ने बताया कि छग सरकार ने सुशासन की ओर एक कदम और बढ़ाते हुए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना पारदर्शिता बढ़ाने नई तकनीकी पहल शुरू की है। अब हर ग्राम पंचायत के लिए क्यूआर कोड बनाए गए हैं।पंचायत भवन और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर यह क्यूआर कोड लगे हैं। इसके जरिए ग्रामीण अपने स्मार्टफोन से कोड स्कैन कर पिछले तीन वर्षों में उनके गांव में किए गए मनरेगा कार्यों की पूरी जानकारी और खर्च का विवरण आसानी से देख सकेंगे।

*क्यूआर कोड तैयार करने का विचार जमीनी स्तर पर आया....

छत्तीसगढ़ के मनरेगा आयुक्त तारण प्रकाश सिन्हा के मुताबिक, पंचायतों में क्यूआर कोड तैयार करने का विचार किसी बोर्डरूम से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर आया है। प्रमुख सचिव के साथ ग्रामीण क्षेत्रों के दौरे के दौरान, यह स्पष्ट हो गया कि क्यूआर कोड गांवों में पहले से ही एक जाना-पहचाना उपकरण था, जिसका व्यापक रूप से डिजिटल भुगतान और छोटे व्यावसायिक लेन- देन के लिए उपयोग किया जाता है। सिन्हा बताते हैं कि ग्रामीणों ने क्यूआर कोड पर भरोसा किया। इस अंतर्दृष्टि और प्रशासन द्वारा सुशासन और पारदर्शिता के लिए निरंतर प्रयासों के संयोजन से एक अभूतपूर्व विचार सामने आया कि मनरेगा डेटा तक पहुंच खोलने के लिए क्यूआर कोड का उपयोग क्यों न किया जाए? इसके बाद इस परियोजना को हरी झंडी दी गई और इसे अब पूरे राज्य में लागू किया जा रहा है।

*इस तरह काम करता है सिस्टम....

अब प्रत्येक ग्राम पंचायत के लिए क्यूआर कोड तैयार किए जा रहे हैं। ये कोड पंचायत की दीवारों और गांवों में अन्य प्रमुख स्थानों पर प्रदर्शित किए जाते हैं। कोई भी ग्रामीण जिसके पास एक साधारण स्मार्टफोन है,कोड को स्कैन कर जानकारी प्राप्त कर सकता है। इनमें पिछले तीन वर्षों में पूरी की गई मनरेगा परियोजनाओं की सूची, स्वीकृत और खर्च की गई धनराशि, चल रहे कार्यों की प्रगति शामिल हैं। यह डेटा, पहले केवल जिला कार्यालयों या आधिकारिक वेबसाइटों के माध्यम से तकनीकी भाषा या अंग्रेजी में ही उपलब्ध था, अब ग्रामीण नागरिकों की उंगलियों पर है।

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