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मानव अधिकार दिवस 10 दिसंबर पर विशेष : मानव अधिकार आयोग और छत्तीसगढ़

Praveen Nishee Wed, Dec 10, 2025

मनेंद्रगढ़। एमसीबी। छत्तीसगढ़ मानव अधिकार आयोग राज्य की मानव अधिकारों की सुरक्षा एवं निगरानी रखने की स्वास्थ्य संस्था के रूप में कार्यरत है। इसकी स्थापना 16 अप्रैल 2001 को हुई थी। मानव अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित किसी भी शिकायत, जागरूकता, सुधारात्मक उपाय का कार्य कर सकता है साथ ही समाचार पत्र व सोशल मीडिया या अन्य स्रोतों से प्राप्त जानकारी लेकर स्वयं संज्ञान लेता है

शिक्षाविद डॉ विनोद पांडेय बताते हैं कि अधिकारों की कानूनी मान्यता ऐतिहासिक रूप से लगभग 800 वर्ष पुरानी है सबसे पहले इंग्लैंड में वहाॅ के राजा ने सन 1215 में एक अधिकार पत्र को कानूनी रूप से स्वीकार किया। जिसे मैग्नाकार्टा (अधिकार पत्र) कहा जाता है इसके उपरांत अधिकारों का अधिनियम 1688, अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा 1776, मनुष्य के अधिकारों की घोषणा 1789, सुधार अधिनियम 1932लीग ऑफ नेशंस 1920 की स्थापना के साथ मानव अधिकार के इतिहास में एक नई सदी का शुभारंभ हुआ, सान फ्रांसिस्को में 1945 में यूनाइटेड नेशंस की घोषणा पत्र में मानव अधिकार के संबंध में उल्लेख किया। गया तत्पश्चात विश्व मानव अधिकार की घोषणा 10 दिसंबर 1948 में की गई इस घोषणा में 30 धाराएं थी जो समस्त विश्व के मानव की सर्वोच्चता एवं सुरक्षा को निर्धारित करती थी भारतीय विद्वान और मानवाधिकार से जुड़े बुद्धिजीवी भारत के 5000 साल के गौरवशाली और स्वर्णिम इतिहास की और इंगित करते हैं और आग्रह करते हैं इसे पुनर्जीवित करके ही हमें कैसे भारत का निर्माण कर सकते हैं जहां सहिष्णुता, अहिंसा, सभी से मित्रता, समानता, मानव का सम्मान, मानव गरिमा तथा अधिकार और स्वतंत्रता जैसे मूल्यों का पालन और संरक्षण होगा भारत की सांस्कृतिक विरासत की इस जटिलता के कारण यह सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार की परंपराओं का साथ-साथ बने रहना संभव हुआ है और इसी सह अस्तित्व ने भारत की पारंपरिक धरोहर को बहुरंगी आयाम प्रदान किया है। हमारी शताब्दियों पुरानी इस परंपराएं हमारे साथ अभी तक बनी हुई है हमारी सांस्कृतिक विरासत में सकारात्मक तथा नकारात्मक विशेषताओं को याद रखना तथा उसे पर गर्व करना तो महत्वपूर्ण है लेकिन जब हम धर्मग्रंथो पर मानव अधिकार की बात करते हैं तो इससे जुड़े शब्दों की मार्मिकता एवं उसमें विहित अर्थों को समझना बहुत जरूरी हो जाता है मानव शब्द अपने आप में इतना संवेदनशील है कि इसको मात्र वैधानिक या संवैधानिक सीमा में नहीं बांधा जा सकता मानव को किसी भी प्रकार से पीड़ा पहुंचाना ही उसके अधिकारों का हनन है ।

स्वतंत्र भारत सरकार की दिसंबर 1993 में कानून के द्वारा एक स्वतंत्र राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया गया आयोग में सेवानिवृत न्यायाधीश नियुक्त किए जाते हैं यह आयोग स्वयं किसी को दंड नहीं दे सकता लेकिन मानव अधिकार के उल्लंघन के किसी मामले में स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच करता है मानव अधिकारों को वास्तविकता में सच्चाई से लागू करने में हमें कानून में बदलाव की आवश्यकता होगा। सही ढंग से लागू करने में सरकारी संगठनों का सहयोग लेना पड़ेगा साथ ही अधिकारों के प्रति स्कूल स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तथा नागरिक के मन में मानव अधिकारों के प्रति चेतना पैदा करनी होगी तथा न्यायपालिका को सरल बनाने के लिए इसका विस्तार करना होगा। हमें मानवाधिकार को एक कानूनी बहस न बनाकर 'लोक कल्याण' की भावना का संवाहक बनाना चाहिए ।

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