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: मालवीय रोड,फिलिप्स मार्केट, नगरपालिका,पोस्ट ऑफिस और भानजी भाई की पुड़िया..

Admin Tue, May 21, 2024

रायपुर का प्रमुख केन्द्र,पूर्ण विकसित बाजार मालवीय रोड दरअसल मदनमोहन मालवीय के नाम पर रखा गया था पर आजकल 'माल रोड', 'मालवीय रोड' के नाम पर ही चर्चा में है। आजादी के पहले इस प्रमुख मार्ग का नाम किसी अंग्रेज अफसर बेन्सली के नाम पर किया गया था,भारत आजाद हुआ,15 अगस्त 1947 को इस मार्ग को मदनमोहन मालवीय के नाम पर किया गया। यही नहीं मोतीबाग का नाम भी मोतीलाल नेहरू के नाम पर किया गया,पहले इस बगीचे को विक्टोरिया/कंपनी गार्डन कहा जाता था, छग के मुख्यालय रायपुर का हृदय स्थल जयस्तंभ से सिटी कोतवाली, एमजीरोड (महात्मा गांधी रोड) का भी अपना विशेष महत्व है। छग के प्रथम शहीद (हालांकि राज्य सरकार ने अभी तक उन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया है) वीर नारायण सिंह को जयस्तंभ में फांसी दी गई थी। उनका अपराध यही था कि इस जमींदार ने अकाल के संकट से उबारने एक बड़े व्यापारी के गोदाम से अनाज जबरिया निकाल कर गरीबों को बांट दिया था पुराने रायपुर में जयस्तंभ से कोतवाली की सड़क, आस पास के क्षेत्र का भी इतिहास रहा है,कभी वहाँ एक मुरम की सड़क थी उसके दोनों ओर कुछ दुकानें हुआ करती थी। रायपुर का इतिहास गवाह है कि पुरानी बस्ती का विकास कल्चुरियों के शासनकाल में हुआ था तो मराठों के शासन काल में ब्राम्हण पारा, तात्यापारा विकसित हुआ, मालवीय रोड और उससे लगे सदर बाजार, गोल बाजार, बैरनबाजार, बैजनाथ पारा आदि का विकास अंग्रेजों के शासन काल में हुआ जयस्तंभ के पास में ही जहां अभी स्टेट बैंक की मुख्य शाखा है वहां एम्पीरियल बैंक स्थापित था। पास में ही स्थित डाकघर का बड़ा भवन है। तहसील आफिस हुआ करता था। डाकघर की अभी जो इमारत बनी है वह बैंगलौर के भवन की अनुकृति है। यहां 100 से अधिक साल से डाकघर स्थापित है। वर्तमान में जहां रवि भवन के रूप में एक व्यवसायिक परिसर स्थापित है, बीच में पत्थरों का एक विशाल दरवाजा भी है जिसे महारानी विक्टोरिया को 'कैसर ए हिन्द' उपाधि देने की याद में 1877 में कुछ स्थानीय व्यापारियों के आर्थिक सहयोग से बनाया गया था।नगर निगम का पुराना कार्यालय था,वहां नगर पालिका का कार्यालय भी अंग्रेजों के शासनकाल से स्थापित था। कुछ आगे जाने पर एक बड़ा व्यवसायिक काम्पलेक्स हाल ही में बना है कभी यहां बाबू लाल टाकीज थी। टाकीज को देश की सबसे पुरानी टाकिजों में एक होने का भी गौरव प्राप्त था। यह 1896 में टूरिंग टाकीज के रूप में ग्रेड इंडियन बाईस्कोप कं. द्वारा संचालित थी। जहां जवाहिर मार्केट है, जहां मालवीय रोड में आने वाले लोग चौपहिया वाहन रखते हैं कभी फिलिप्स मार्केट कहलाता था। आजादी के बाद इसका नाम जवाहिर मार्केट कर दिया गया।थोड़ा आगे बढऩे पर चिकनी मंदिर मिलता है। यह भी करीब 100 साल पुराना है, किसी सोनार ने बनाया था। वह हलवाई लाईन मस्जिद के सामने रहता था। बताया जाता है कि वह महंत लक्ष्मी नारायणदास के मठ में कार्यरत था। कभी इस चिकनी मंदिर के सामने एक उर्दू प्राथमिक शाला होती थी, वहां भंसाली की कपड़ा दुकान है। मालवीय रोड से ही लगा आर्य निवास मंदिर है, इतिहास काफी पुराना है। शिलान्यास,पंजाब केसरी लाला लाजपत राय ने 1907 के आसपास किया था पर इसका निर्माण 1924 में हुआ निर्माण में लाला बैजनाथ का बड़ा योगदान रहा, बाद में उन्हीं के नाम पर बैजनाथ पारा का नामकरण हुआ। वैसे रायपुर के मालगुजार,गणेश राम शिवदत्त उनके पूर्वज तथा दीक्षित परिवार मालवीय रोड में ही रहते थे। कोतवाली की ऐतिहासिक इमारत भी थी, कोतवाली से वर्तमान गंज थाने, आमा पारा तक देखा जाता था। कहा जाता है कि दुश्मनों की फौज के आने की पूर्व सूचना मिले इसी तकनीकी दृष्टि से यह इमारत बनी थी, अबअवैध कब्जा के कारण 100 मीटर भी देखा नहीं जा सकता है। मालवीय रोड में इमदादी शॉप 1908- 09 में स्थापित की गई थी तब मो. रजब अली, तैय्यब संचालक थे। भानजी भाई की दुकान की स्थापना भी 1905 में हुई थी, दुकान की स्थापना को लगभग 120 साल हो चुके हैं। कुछ साल पहले लंबी हॉकने वाले एक युवक पर उसके साथी ने जुमला दाग दिया था कि 'क्यूं भानजी भाई की पुडिय़ा मार रहा है' तब से यह जुमला रायपुर में तो मुहावरा बन चुका है। भानजी भाई की तीसरी- चौथी पीढ़ी आज भी दुकान का संचालन कर रही है।गोलबाजार से चिकनी मंदिर तक कभी टांगा स्टैण्ड हुआ करता था, मालवीय रोड में अहमदजी भाई की दुकान के सामने एकमात्र पेट्रोल टंकी हुआ करती थी जो वर्मा सेल्स कंपनी की थी वैसे पहले मालवीड रोड में मिट्टी तेल की चिमनी होती थी। रोज चिमनी में नगर पालिका के लोग कपड़े की चिंदी से बनी बाती लगाकर मिट्टी तेल डालते थे। तेल या बत्ती में से देर तक दोनों में एक खत्म होने तक जलती रहती थी। ट्यूब लाईट मालवीय रोड में 1955 में लगी,आजकल सोडियम लेम्प लग चुके हैं। अहमदजी भाई की दुकान पहले कीका भाई की दुकान कहलाती थी, पहले मिट्टी तेल बेचा जाता था जो चार गैलन के पैक में आता था तब कीमत सवा रुपये हुआ करती थी। मालवीय रोड उस समय 24 फीट चौड़ी होती थी, यह सबसे चौड़ी सड़क थी। 1937 में 50 किलो सीमेण्ट दो रुपये दो आने में बेचा जाता था। बहरहाल मालवीड रोड का भी अपना महत्व इतिहास में रहा है।अंग्रेजों के जमाने से नया छत्तीसगढ़ राज्य बनने तक महत्वपूर्ण सड़क होने के साथ ही प्रमुख व्यवसायिक केन्द्र रहा है। सड़क सिमटती गई,कब्जे बढ़ते गये और अब तो मालवीय रोड में कभी-कभी पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।छत्तीसगढ़ की संस्कृति की रक्षा के लिए कुछ और किया जाना अभी भी शेष है।शहर की एक सड़क का नाम एमजी रोड है कौन एमजी है यह अधिकांश लोगों को पता नहीं है दरअसल एमजी, महात्मा गांधी रोड है वहीं मालवीय रोड का नामकरण किस मालवीय के नाम पर किया गया है यह भी अधिकांश लोगों को पता नहीं है,सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि नगर निगम के रिकार्ड में भी एमजी रोड, मालवीय रोड ही दर्ज है। महात्मा गांधी, महामना मदनमोहन मालवीय का नाम विलुप्त सा हो गया है। मालवीय रोड में तवायफ लाईन भी कभी थी। तब अंग्रेज अफसर, जमींदार यहां मनोरंजन के लिए आया करते थे। तब उनके सुरक्षाकर्मी, कोचवान, चालक आदि ने ही बाबू लाल गली की स्थापना की जहां काफी सालों तक जिस्म फरोशी चलती रही।
  • मुंबई तब बम्बई में पहली मूकी फिल्म प्रदर्शित हुई थी तब बाबूलाल टूरिंग टाकीज में उसी दिन फिल्म प्रदर्शित की गई थी।
  • 1901 में रायपुर शहर की जनसंख्या 32 हजार 111 थी जो 1961 में एक लाख 39 हजार 792 तथा वर्तमान में करीब 10 लाख के आसपास हो गई है।
  • 1927 जब नगर पालिका बनी थी तब नगर का क्षेत्र फल मात्र 20 किलोमीटर था तब रायपुर में 26 तालाब हुआ करते थे।
  • 20 दिसंबर 1946 को मेहर सिनेमा के नाम पर व्ही शांताराम ने वर्तमान राज टाकीज की स्थापना की थी। तब इसका शिला न्यास महालक्ष्मी सेठ पत्नी के बी एल सेठ (आईसीएस) कमिश्नर छत्तीसगढ़ डिवीजन ने किया था।
  • छत्तीसगढ़ में रेल का सफर 1882 में शुरू हुआ था।1889 में रायपुर -धमतरी रेल लाईन बनते लोगों ने देखा था।

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