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25 करोड़ मेहनतकशों के हक छीने—नई संहिताओं पर उमड़ा आक्रोश : ऐ जुल्म के मारों,लब खोलो,चुप रहने वालों चुप कब तक,कुछ हश्र तो इनसे उठ्ठेगा,कुछ दूर तो नाले जायेंगे- अख़्तर जावेद उस्मानी

Praveen Nishee Sun, Nov 23, 2025

मनेंद्रगढ़। एमसीबी। केन्द्र सरकार ने श्रमिक संगठनों की आपत्तियों, विरोध प्रदर्शनों, हड़तालों और आशंकाओं को दरकिनार करते हुए 44 पुराने श्रम कानूनों को समाप्त कर चार नई श्रम संहिताओं को 21 नवंबर 2025 से लागू कर दिया है। इन संहिताओं के लागू होने के साथ ही माइन्स एक्ट 1952, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1948, फैक्ट्री एक्ट 1948, इंडस्ट्रियल एम्प्लॉयमेंट (स्टैंडिंग ऑर्डर्स) एक्ट 1946 सहित कई महत्वपूर्ण कानून निरस्त हो गए हैं।

नए प्रावधानों के तहत, जिन श्रम कानूनों का दायरा पहले 100 श्रमिकों वाले संस्थानों तक था, अब वह बढ़ाकर 300 श्रमिकों पर लागू कर दिया गया है। इससे तालाबंदी की अनुमति, छंटनी की अनुमति, प्राकृतिक न्याय की अनिवार्यता जैसे कानूनी संरक्षण अब देश के लगभग 80% श्रमिकों—यानी लगभग 25 करोड़ श्रमिकों—को प्राप्त नहीं होंगे।

विशेषज्ञों के अनुसार, न्याय के ड्यू प्रोसेस, सेवा शर्तों के निर्धारण, वेतन मानकों और सुरक्षा प्रावधानों तक श्रमिकों की पहुंच सीमित हो जाएगी। 300 से कम श्रमिकों वाले संस्थानों में मालिकों को नियुक्ति और निष्कासन का लगभग पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाएगा और इसमें न्यायालय भी हस्तक्षेप नहीं कर सकेंगे। सामाजिक सुरक्षा के दायरे का भी बड़ा हिस्सा अब बाहर हो जाएगा।

300 से अधिक श्रमिकों वाले संस्थानों में निरीक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों को अब फैसिलिटेटर-कम-इंस्पेक्टर बना दिया गया है। गिग वर्कर्स को न्यूनतम वेतन का अधिकार नहीं होगा। मालिक 12 घंटे तक काम ले सकेंगे और महिलाओं से नाइट शिफ्ट में कार्य कराया जा सकेगा।

ट्रेड यूनियनों ने इन प्रावधानों को पूंजीपतियों के पक्ष में बनाया गया निर्णय बताते हुए इसका जोरदार विरोध दर्ज किया है। काले फीते लगाकर असहमति जताने से लेकर इन “काले श्रम कानूनों” की वापसी तक संघर्ष जारी रखने का ऐलान किया गया है।

इसी क्रम में हिन्द मजदूर सभा के अख़्तर जावेद उस्मानी ने कहा कि संगठन अपने कार्यकर्ताओं के साथ श्रमिकों के इस “करो या मरो” जैसे संघर्ष में अग्रिम पंक्ति में खड़ा है। उन्होंने आह्वान करते हुए कहा:

"ऐ जुल्म के मारों, लब खोलो,

चुप रहने वालों चुप कब तक,

कुछ हश्र तो इनसे उठ्ठेगा,

कुछ दूर तो नाले जायेंगे."

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