हिन्दी दिवस पर विशेष : " वर्तमान परिवेश में हिन्दी का भविष्य" बीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव की कलम से
Praveen Nishee Mon, Sep 14, 2026
वर्तमान परिवेश में हिंदी के भविष्य के बारे में बातचीत करने पर सहसा ही हमें राजभाषा दिवस 14 सितंबर की याद आती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में दर्ज देवनागरी लिपि की हिन्दी को 14 सितंबर 1949 को भारत के राजभाषा का दर्जा प्रदान किया गया, इसलिए 14 सितंबर को भारत में हिंदी दिवस के रूप में हिंदी की समृद्धि के लिए याद किया जाता है।
यह सच है कि हिंदी हमारी राष्ट्रीय चेतना सांस्कृतिक धरोहर और भारतीयता की पहचान है। आज जब विश्व भर में अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश और चीनी भाषा शक्ति का आधार बन रही है ऐसे समय पर विश्व मंच में हिन्दी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है जो इसके अच्छे विकास की संभावनाओं का संकेत है। आज विश्व पटल पर लगभग 60 करोड लोगों के द्वारा हिंदी बोली जाती है या उनकी संपर्क भाषा है। वैश्विक स्तर पर यदि हम चर्चा करें तो विश्व में हिंदी का स्थान तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा के रूप में उपलब्ध है। अंग्रेजी अपने औपनिवेशिक काल के समय से बोली जाने वाली भाषा होने के कारण विश्व में प्रथम स्थान पर आज भी बोली जाती है और विश्व की आपसी बातचीत की भाषा बन चुकी है, किंतु मंदारिन जैसी चीनी भाषा विश्व की दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है, क्योंकि चीन के सभी राज्यों में अकेली भाषा बोली जाती है। विश्व का लगभग 150 करोड़ जनसंख्या का हमारा देश भारत यदि हिन्दी को मन से स्वीकार कर ले तब हम विश्व की नंबर एक भाषा बन सकते हैं। भारत के साथ-साथ विश्व के अन्य देशों में भी भारतीयों की बसाहट के साथ हमने अपनी हिन्दी को वहां तक पहुंचाया है। आज चिंतनीय पक्ष यह है कि राज्य सरकारें अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खोलकर हिंदी के विकास को जहां बाधा पहुंचा रही है वहीं हिंदी भाषा क्षेत्र में हिंदी के प्रति अरुचि पैदा कर रही है। आज अंग्रेजी भाषा विदेशी रोजगार संपर्क की भाषा हो चुकी है लेकिन यह भारत के सांस्कृतिक पहचान की भाषा नहीं बन सकती। इसलिए विदेश में भी अपनी पहचान बनाए रखने के लिए आपको हिंदी भाषा में दक्ष होना होगा। भारत के कुछ राज्यों का हिंदी को थोपी जाने वाली भाषा मानकर विरोध करना चिंतनीय है हालांकि समय के बदलाव के अनुसार हिंदी के रोजगार और व्यापार की राष्ट्रीय भाषा बनने के कारण इस बंधन को कमजोर किया है और अब दक्षिण भारत के राज्यों में भी हिंदी का प्रचलन बढ़ा है लेकिन अभी भी कुछ राजनीतिक पार्टियों द्वारा हिन्दी भाषा को देश की पहचान न समझ कर केवल अपने चुनाव में राजनीतिक चारे की तरह उपयोग करना उचित नहीं है। भारतवर्ष में सभी भाषाओं के साहित्य को सम्मान की दिया जाता है क्योंकि यह भारत की पहचान है लेकिन राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने के लिए निर्धारित सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिन्दी का सम्मान करना हमारी दायित्व है।
वैश्विक धरातल पर मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद, गुयाना जैसे देशों के साथ-साथ अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और खाड़ी देश ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड में बसे भारतीयों द्वारा समाचार पत्र रेडियो और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से हिंदी को मजबूती प्रदान की जा रही है। एक विशाल समुदाय द्वारा हिंदी बोले जाने के कारण हिंदी भारतीय बाजार की मुख्य भाषा बन चुकी है इसलिए अमेरिका, रूस, जापान, के साथ-साथ यूरोप एवं अफ्रीकी देशों के विश्वविद्यालय में हिन्दी को रोजगारपरक भाषा के रूप में शिक्षा का माध्यम बनाया जा रहा है। विश्व भर की समाचार एजेंसियां भी हिंदी का प्रयोग अपने समाचार चैनल के प्रचार प्रसार के लिए कर रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ में भी हिंदी को आधिकारिक भाषा दिलाने का प्रयास हिंदी विकास के लिए एक अच्छा संकेत कहा जा सकता है।
पिछले 15 वर्षों के विश्व पटल पर यदि हम देखें तब हमें 2010 से लेकर 2022-23 तक के 10- 12 वर्षों में इंटरनेट पर हिंन्दी की लोकप्रियता 10 गुना बढ़ी है। परिणाम स्वरुप फेसबुक, इंस्टाग्राम,ट्विटर, यु ट्यूब जैसे सोशल मीडिया पर हिंदी सबसे ज्यादा लोकप्रिय भाषा बन चुकी है। करोड़ो यूट्यूब सब्सक्राइबर एवं ब्लॉगर ने युवा उद्यमियों एवं प्रोफेशनल को रोजगार के नए अवसर भी प्रदान किए हैं। वाट्स अप,चैट बोर्ड और आईपैड जैसी तकनीक के साथ-साथ बैंकिंग, शिक्षा और सरकारी सेवा में हिंदी उपयोग को सरल बनाया जाना हिंदी की आवश्यकता को मजबूत करती है जो इसके विकास के नए आयाम इंगित करती है।
सूरदास, कबीर, तुलसी, मीरा, के साथ-साथ हिंदी गद्य के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र, मुंशी प्रेमचंद, रामधारी सिंह दिनकर, भवानी प्रसाद मिश्र, रामचंद्र शुक्ल जैसे हिंदी के मूर्धन्य रचनाकारों ने इसे आगे बढ़ाया है वही वर्तमान समय में नए रचनाकारों की एक लंबी पंक्ति उभर कर सामने आ चुकी है। हिंदी को समृद्ध करने में अभिमन्यु अनंत, भीष्म साहनी,अब्दुल बिस्मिल्लाह, अशोक वाजपेई, भवानी प्रसाद मिश्र, आचार्य चतुरसेन, उर्मिला शिरीष , मृदुला गर्ग, कमलेश्वर, काशीनाथ सिंह, उदय प्रकाश, श्यामसुंदर दुबे, की एक लंबी परंपरा है। छत्तीसगढ़ के वर्तमान साहित्यकारों में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुक्तिबोध, मुकुटधर पांडे पंडित माधवराव सप्रे के साथ-साथ सतीश जायसवाल, गिरीश पंकज, प्रेम जनमेजय, विनोद कुमार शुक्ल, आलोचक जयप्रकाश, विजय सिंह, संजय एलंग, शरद कोकास, नासिर अहमद सिकंदर, त्रिलोक महावर, सुधीर शर्मा, बलदाउ राम साहू एवं आंचलिक साहित्यकारों में अनिरुद्ध नीरव, अजय चतुर्वेदी, श्रवण कुमार उर्मलिया, अनवर सुहैल अंसारी, बीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, डा. मृदुला सिंह सेंगर की लंबी परंपरा हिंदी को समृद्ध कर रही है जो हिंदी विकास के लिए अच्छा संकेत है। हिंदी विकास के संदर्भ में यह प्रश्न उठता है कि बड़ी-बड़ी संस्थाओं के द्वारा दिए जाने वाले सम्मान की परंपरा साहित्यकारों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य दी जाती है लेकिन श्रेष्ठ सम्मान के बीच आज भी सूरदास, तुलसी और कबीर जैसे लोकप्रिय साहित्य की कमी हमें दिखाई पड़ती है जो हर व्यक्ति के मन में ऐसा स्थान बना ले कि आने वाली पीढ़ियां भी उसे याद कर सके। नई पीढ़ी के लेखकों के बीच आज ऐसे हिंदी साहित्य की आवश्यकता है जो आने वाली पीढ़ी तक लोगों के मस्तिष्क और जुबान पर याद रह जाए।
हिंदी आज जब व्यवसाय की भाषा बनकर सशक्त हो रही है वहीं यह रोजगार दिलाने के नए अवसर बनकर उभरी है। विदेशी विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाने के लिए हिंदी विद्वान एवं लेखकों को नियुक्त किया जा रहा है। हिन्दी भाषा के विस्तार के साथ संबंधित पत्र पत्रिकाओं के लिए संपादक, विषय विशेषज्ञ और अनुवादक की आवश्यकता रोजगार के साधन बन रहे हैं। कंप्यूटर में हिंदी का प्रयोग संपर्क एवं प्रकाशन के माध्यम से ज्यादा लोगों के बीच हिंदी को पहुंचाने का कार्य कर रहा है। अखिल भारतीय साहित्य परिषद, साहित्य अकादमी जैसी भारतीय संस्थाएं भी अन्य भाषाओं से हिंदी अनुवाद उपलब्ध करा रही है कुछ हिंदी की पत्र पत्रिकाएं भी अनुवाद के क्षेत्र में आगे आई है, जो हिंदी के विकास और ज्ञान को समृद्ध करने का अच्छा प्रयास है।
भारत सरकार और राज्यों द्वारा हिंदी के प्रोत्साहन के लिए किए जाने वाले आयोजन सम्मान एवं पुरस्कारों की घोषणा हिंदी भाषी नागरिकों को गौरव का एहसास कराती है। आज हिंदी केवल एक भाषा नहीं बल्कि रोजगार, तकनीक, पत्रकारिता और संस्कृति का द्वार बन चुकी है। इसके माध्यम से हम वैश्विक स्तर पर भारतीयता की पहचान प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं। आज हिंदी केवल शब्दों का एक समूह या आपसी बोलचाल की भाषा नहीं बल्कि भारत की आत्मा, संस्कृति और राष्ट्र की पहचान की अभिव्यक्ति है। इसे और आगे बढ़ाने की दायित्व हमारे कंधों पर है।

विज्ञापन