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आदिवासी विकास को : समाजशास्त्री दृष्टिकोण से देखना आज की आवश्यकता -सतीश जायसवाल

Praveen Nishee Wed, Jul 9, 2025

मनेंद्रगढ़। एमसीबी। आदिवासियों के विकास को समाजशास्त्री दृष्टिकोण से देखना आज की आवश्यकता है आदिवासियों को यदि हम पुरातन परिवेश में आज भी देखना चाहेंगे तब यह उनके साथ अन्याय होगा. समय के अनुसार अब यह बदलाव का दृष्टिकोण धीरे-धीरे आंदोलन का रूप ले रहा है. मैं साहित्यकारों एवं समाज सेवी विद्वानों से भी इस विषय पर सहयोग की अपेक्षा रखता हूँ.

उक्ताशय के विचार देश के ख्याति प्राप्त साहित्यकार एवं छत्तीसगढ़ वनमाली सृजन पीठ  बिलासपुर के अध्यक्ष सतीश जायसवाल ने निदान सभागार मे वनमाली सृजन केंद्र मनेन्द्रगढ़ द्वारा आयोजित परिचर्चा में व्यक्त किये. भाषा पर राजनीति को उन्होंने दुखद बताया. उन्होंने कहा कि भाषा को साहित्य के लिए रहने दिया जाए. प्रेमचंद का साहित्य  भाषा का मोहताज नहीं. उनकी कहानी उर्दू और हिंदी भाषा मे लिखने के बाद भी सभी भाषाओं में सम्मान पा रही है.

 वनमाली सृजन केंद्र कोरिया के संयोजक एवं कार्यक्रम संचालक बीरेन्द्र श्रीवास्तव ने कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए उपस्थित साहित्यकारों से सतीश जायसवाल को पुष्पगुच्छ देकर स्वागत करने का अनुरोध किया. कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए संचालक द्वारा सतीश जायसवाल की जीवन यात्रा एवं उपलब्धियां के बारे में बताया कई पुस्तकों के लेखन के साथ ही बख्शी सृजन पीठ भिलाई के अध्यक्ष एवं छत्तीसगढ़ राज्य के वसुंधरा सम्मान से सम्मानित किए जा चुके हैं          

"सतीश जायसवाल साहित्यकार या पत्रकार"

विषय पर आयोजित परिचर्चा मैं सर्वप्रथम पत्रकार मे प्रशांत तिवारी एवं राजेश सिन्हा ने भागीदारी करते हुए चर्चा मे सतीश जायसवाल के पत्रकारिता एवं जीवन की उपलब्धियों से जुड़े कई प्रश्न उठाए. उनके प्रश्नों का समाधान करते हुए सतीश जयसवाल ने कहा कि पत्रकारिता से प्रारंभ अपने जीवन के बीच मैने अपनी साहित्यिक कलम को हमेशा जिंदा रखा.  तत्कालीन धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, हंस, जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका से प्रारंभ मेरी साहित्य की यात्रा वर्तमान साहित्यिक पत्रिकाएं  वागर्थ, समकालीन भारतीय साहित्य ,जैसी पत्रिकाओं में स्थान पाती रही है.  पत्रकारिता में मैंने कुछ दैनिक अखबारों के संपादन का उच्च दायित्व भी निभाया है.  वहीं राजकमल प्रकाशन सहित कई प्रकाशको ने अब तक मेरी लगभग बारह.चुनिंदा  पुस्तकों को अपने प्रकाशन में स्थान दिया है. वर्तमान में मैंने अपनी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की यात्रा- संस्मरण को "सूर्य का जलावतरण" पुस्तक में व्यक्त करने का प्रयास किया है

 मनेन्द्रगढ़ के साहित्यिक परिवेश को याद करते हुए उन्होंने कहा कि यहां की मिट्टी का अपनत्व मुझे हमेशा खींचता रहा है. 1981- 82 में माता चरण मिश्रा एवं बीरेन्द्र श्रीवास्तव के संपादन में निकलने वाली संबोधन संस्था की साइक्लोस्टाइल  पत्रिका "शुरुआत"  में मेरी एक सवक्तव्य कालम में विशेष  कविता को स्थान मिला था. मनेन्द्रगढ़ एवं बैकुंठपुर के नए सृजनात्मक कार्यो एवं पुस्तकालय सहयोग के कारण 2022 का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय बनमाली सृजन केंद्र का सम्मान मनेन्द्रगढ़/ कोरिया  को दिया गया था. साहित्यकारों को जोड़ने एवं सतत सक्रियता को बल देने का श्रेय मैं अंचल के साहित्यकार बीरेन्द्र श्रीवास्तव को देना चाहूंगा.

परिचर्चा में अपना पक्ष रखते हुए साहित्यकार  सतीश उपाध्याय ने कहा कि मुझे खुशी है कि सतीश जायसवाल की जो कविता हमने छत्तीसगढ़ पाठ पुस्तक चयन समिति के माध्यम से पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए अनुशंसा की थी,  वह आज कक्षा दसवीं की पाठ्यक्रम में शामिल है.  इस चयन  समिति का मैं भी  एक सदस्य था.

"गृह प्रवेश"  कविता उनके साहित्यिक यात्रा की ऊंचाइयों का प्रतिबिंब है. आज उनके साथ मैं इस मंच पर गौरव का अनुभव कर रहा हूं.         

पिपरिया हाई स्कूल के प्राचार्य एवं जिला पुरातत्व एवं पर्यटन प्रभारी डॉ. विनोद पांडे ने कहा की यात्रा संस्मरण लेखन के धनी  सतीश जायसवाल की मनेन्द्रगढ़ में उपस्थिति  उनकी आत्मीयता और यहां की मिट्टी मे बसी रचनात्मक उर्वरा उनकी कहानियों का हिस्सा बनेगी.

देर रात तक संचालित इस चर्चा में सर्व आदिवासी समाज के संरक्षक परमेश्वर सिंह, व्याख्याता टी गोपाल राव, रिटायर्ड कृषि विज्ञानी, पुष्कर तिवारी, डॉ विनोद पांडे, साहित्यकार सतीश उपाध्याय, बनमाली सृजन केंद्र कोरिया के संयोजक बीरेंद्र श्रीवास्तव, आईसेक्ट विद्यालय के प्राचार्य संजीव सिंह, समाज सेवी नरेंद्र श्रीवास्तव, सतीश द्विवेदी, साहित्यकार प्रमोद बंसल एवं डॉक्टर निशांत श्रीवास्तव सहित पत्रकार प्रशांत तिवारी, राजेश सिन्हा ने मुख्य रूप से अपनी सहभागिता दर्ज करते हुए अपने अपने विचार रखें.

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